प्राक्कथन
उन दिनों मेरा अधिकांश समय प्रारब्धानुसार गुप्त प्राणायाम साधना में व्यतीत होता था, लेखनी रुक-सी गयी थी। काल की स्थिरगम्यता मानों अनुभवजन्य किसी योगलब्ध भाव की प्रतीक्षा मात्र थी। मैं दिव्य भाव से त्राटक प्रक्रिया में संलग्न रहा । ३ दिवस कैसे व्यतीत हुए ये ज्ञात ही नहीं हुआ। अपने आप ही लेखनी उठ गयी एवं अनवरत लिखाई चलती रही। अंतःकरण में आत्मगुरुब्रह्मतत्त्व का स्फुरण संचार हो रहा था। इन्हीं अनुभूतिजन्य एवं अनुभवपरक भावों का अवधूत गीता के इन दो अध्यायों में विवरण है। यह कृति प्राणायामजन्य सत्य घटनाओं एवं अनुभवों की अद्वितीय साक्ष्य है ।
प्राचीन क्रिया योग संस्थान के एक मूर्धन्य मनीषि एवं रहस्यवादी गृहस्थ योगी ने अपनी अनन्य योग भक्ति तथा प्राणायाम के सघन अभ्यास से क्रिया योग से उत्पन्न अवधूत गीता के इन अर्थों को पुनः प्राप्त किया ।
प्राचीन क्रिया योग संस्थान प्राचीन जीवन विज्ञान शैली को सरलता एवं सुगमता से प्रदर्शित एवं पारदर्शित करने हेतु कटिबद्ध है।
इस स्थूल काया का अस्तित्व एकमात्र ध्यान प्रक्रिया के सम्पादन हेतु है। इसके अतिरिक्त जीव नगण्य एवं रिक्त है।
Hindu (हिंदू धर्म) (14009)
Tantra (तन्त्र) (1038)
Vedas (वेद) (731)
Ayurveda (आयुर्वेद) (2139)
Chaukhamba | चौखंबा (3467)
Jyotish (ज्योतिष) (1630)
Yoga (योग) (1213)
Ramayana (रामायण) (1313)
Gita Press (गीता प्रेस) (716)
Sahitya (साहित्य) (25326)
History (इतिहास) (9365)
Philosophy (दर्शन) (3709)
Santvani (सन्त वाणी) (2600)
Vedanta (वेदांत) (120)
Send as free online greeting card
Email a Friend
Visual Search
Manage Wishlist