संगठित प्राचीन पंजाब, अगस्त 1947 के भारत और पाकिस्तान के रुप में विभाजन के पहले, पांच प्रसिद्ध नदियों अर्थात् सतलज, ब्यास, रावी, चेनाब और झेलम से घिरा और आप्लावित था। वह 15 अगस्त 1947 में दो टुकडों में पूर्व पंजाब (भारत) और पश्चिम पंजाब (पाकिस्तान) में विभाजित हुआ। 1 नवम्बर, 1966 को पूर्व पंजाब को भाषाई आधार पर फिर पुनर्गठित किये जाने के परिणाम स्वरुप, तीन राज्यों- पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में विभक्त किया गया। यह पुस्तक इन राज्यों में बौद्ध धर्म के उत्थान, पतन और पुनरोज्जीवन की कहानी प्रस्तुत करती है। बौद्ध धम्म स्वयं बुद्ध के द्वारा ही पंजाब में आया था। और इ. पू. 483 में बुद्ध के महापरिनिर्वाण के 300 वर्षों के भीतर उसने पांच नदियों वाली धरती में बहुत अच्छी पकड़ प्राप्त की थी। उसके बाद, लगभग 1000 वर्षों तक, बौद्ध धर्म इस क्षेत्र में लोगों का प्रभावशाली धम्म रहा। इस वैभवशाली युग के दौरान, संतो, विद्वानों, कवियों और दार्शनिकों की आकाशगंगा ने पंजाब की संस्कृति को और समृद्ध बनाया। इतना ही नही, बल्कि पंजाब के बौद्धों ने बौद्ध धम्म की मंजिल को इस देश के अन्य भागों में भी प्रभावित और पुनर्निर्मित किया था। इ. पू. दूसरी शताब्दी में पंजाब के सियालकोट में आयोजित ग्रीक नरेश मिलिंद अथवा मिनान्डर और पूज्य भदंत नागसेन के बीच हुई धम्म-चर्चा का एक दस्तावेज सबसे अधिक लोकप्रिय पिटकोत्तर पालि बौद्ध ग्रथ मिलिंदप (मिलिंद नरेश के प्रश्न) है। इसके उपरांत, जलंधर में लगभग इ. स. 100 में चौथी बौद्ध संगीति को कुशान नरेश कनिष्क के राज्य के दौरान आयोजित किये जाने का उल्लेख है। इस प्राचीन पंजाब में ही बौद्ध धम्म के दो महान उपदेशक और दार्शनिक असंग और वसुबध भी प्रगल्भ हुए थे। आगे भी, भारत के बौद्ध धम्म के राजनीतिक इतिहास में चार बौद्ध नरेशों के नाम अर्थात् सम्राट अशोक (तीसरी शताब्दी इ. पू.). सम्राट मिलिन्द (दूसरी शताब्दी इ. पू.), सम्राट कनिष्क (इ. स. 1 ली शताब्दी) और सम्राट हर्षवर्धन (इ. स. 7वीं शताब्दी) सर्वोपरी चमकते हैं। उनमें से तीन पराक्रमी नरेश पंजाब में प्रगल्भ हुए, और चौथे यानी महान अशोक ने भी अपनी चर्या मगध के सिंहासन पर विराजमान होने के पहले पंजाब में ही शुरु की थी, जब वह तक्षशिला के मौर्य राज के प्रतिनिधि (क्षत्रप) के रुप में कुछ समय रहे थे। भारत के अन्य सब स्थानों की तरह, पंजाब में भी बौद्ध धम्म इ. स. 7 वीं सदी तक अच्छे से प्रसारित हो रहा था। परंतु, बाद में राजनीतिक और धार्मिक उतार-चढ़ाव के दबाव में बुद्ध धम्म पंजाब के मैदान से लुप्त हुआ परंतु वह पहाडी क्षेत्रों में आक्रमण से बच पाया और आज भी बुद्ध धम्म हिमाचल प्रदेश में लाहूल, स्पिती और किन्नोर की दरियाओं में जीवित धम्म है। समस्त उपलब्ध साहित्य और पुरातात्विक स्रोतों पर आधारित यह ग्रंथ नौ अध्यायों में पंजाब, हरियाना और हिमाचल प्रदेश में बुद्ध धम्म के उत्थान, पतन और पुनरोज्जीवन की कहानी प्रस्तुत करता है। 'बुद्ध धम्म और सिख धर्म का एक ग्यारहवाँ अध्याय यह दर्शाने के लिए जोड़ा गया कि बुद्ध के 2000 वर्षों के पश्चात् गुरु नानक द्वारा संस्थापित सिक्ख धर्म पर बुद्ध धम्म का प्रभाव है। बुद्ध धम्म का पंजाब, हरियाना और हिमाचल प्रदेश का यह ऐतिहासिक सर्वेक्षण प्रथम बार 1971 में प्रकाशित हुआ था। उसके बाद यद्यपि वह अग्रेजी में पुनः मुद्रित नहीं हुआ था, परंतु इसकी पंजाब में लोकप्रियता के कारण, वह पंजाबी में दो बार अनुदित होकर 1991 और 2002 में दो बार प्रकाशित किया गया था। तब से 1971 के पश्चात् कई बौद्ध साइटों और तीर्थों का शोध लग गया था, और विशेषतः पंजाब .
भारत में महाराष्ट्र राज्य के नागपुर जिले में गोंडबोरी नामक गांव में 22 जून 1956 को माता सुगंधा और पिता दाजीबा नाईक के कुल में जन्मे बालक का नाम चंद्रशेखर रखा गया था। वह सोलहवे वर्ष में ही गुरुवर डॉ. भदन्त आनन्द कौसल्यायन के आचार्यत्व और संरक्षण में श्रामणेर सुमतिपाल बने। बीस वर्ष की आयु पूर्ण होने पर आचार्य कौसल्यायनजी ने उनको थाई बुद्ध विहार, बुद्ध गया के महाविहार के प्रतिष्ठित आदरणीय महास्थविर फ्राखूधम्ममहाविरानुवत्र प्रमुख भिक्खु संघ द्वारा अप्रैल 1974 में उपसंपदा दिलवाई। तब उनका नाम चंद्रबोधि हुआ। आचार्यजी ने भिक्षु चंद्रबोधि को कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र आदि भारतीय राज्यों में ही नहीं बल्कि इंग्लैंडादि परदेशों में भी धम्मप्रचारार्थ सन् 1978 में वहाँ के भारतीय बौद्धों द्वारा स्थापित डॉ. आंबेडकर मेमोरियल कमेटी ऑफ ग्रेट ब्रिटन के तत्वावधान में संचालित आंबेडकर बुद्ध विहार ट्रस्ट के पदाधिकारियों द्वारा निर्मित वुल्वरहैम्प्टन बुद्ध विहार के प्रमुख की हैसियत से निमंत्रित करने पर बौद्ध धम्म सेवा हेतु वहाँ नियुक्त किया था। तब से वह वर्ष 2000 तक धम्म प्रचारार्थ इंग्लैंड, अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, नीदरलैंड, नेपाल, श्रीलंका, थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर, बर्मा (म्यानमार) आदि देशों में भ्रमण, देशना और निवास करते रहे।
इस ग्रंथ के मूल अंग्रेजी लेखक माननीय की. सी. अहीर साहेब है। मूल लेखक के दिवंगत हो जाने पर उनके पुत्र कॅपटन निर्मल कुमार और पुत्री सुनीता राए ने इस पुस्तक का अनुवाद हिन्दी और अना भाषाओं में करने की अनुमति नवचेतना प्रकाशन के संस्थापक आयुष्मान वरिंदर पुंजा को प्राप्त हुई थी। उन्होंने यह पुस्तक आज से लगभग एक साल पहले हिन्दी में अनुवाद करने हेतु अनुवादक के पते पर प्रेषित की। इसके बाद अनुवादक ने अन्य उच्च स्तरीय पाठकों के लाभार्थ इस पुस्तक को जल्दी से जल्दी प्रकाश में लाने के लिए प्रस्तुत प्रकाशक को सौंप दी और इसके माध्यम से जैसा कि अनुक्रमणिका में दर्शाया गया है. इसके प्रकाशन, पठन और अनुशीलन से अधिक से अधिक मानवसेवा और विश्व कल्याण की चेतना सवर्धित करने के लिए तथागत का पंजाब दौरा, सम्राट अशोक के शिलालेख और स्तंभ की देशनायें, मिलिंद, कनिष्क, म्युऊकस, हर्षवर्धन की बुद्ध धम्म को देन; रट्ठपाल, सारीपुत्र, मीदगल्लयायन, असंग, वसुबंधू, नागसेन, अश्वघोष, वसुमित्र, पार्श्व जैसे बीद्ध विद्वानों, दार्शनिकों, प्रचारकों और साहित्यकारों के व्यक्तित्वों की झलक प्रस्तुत की गई हैं। इसके अलावा चीनी बौद्ध यात्री हियून-त्संग और फाईयान की पंजाब में यात्रा, सर अलेक्झांडर कनिंगधम जैसे पुरातत्ववेत्ताओं बीद्ध ऐतिहासिक खंडहरों का शोध, सिक्ख धर्म और बुद्ध धम्म की समानतायें, पंजाबी और पालि भाषा के शब्द-साम्य, रटठपाल सूत्र, मिलिंद प्रश्न, और वर्तमान में मौजूद बुद्ध विहारों के निर्माण इत्यादी कई पहलू हैं, जो हर सुधी पाठक को बुद्धधर्म और प्राचीन पंजाब के सम्बंध में ऐतिहासिक जानकारी के साथ साथ स्वयंवर्धनकारी कल्याणमई लोकविदू की देशना जीवन में सदा सहायक और प्रेरणादायी सिद्ध होगी
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