किसी भी स्त्री के जीवन में वह क्षण बहुत महत्वपूर्ण होता है जब उसे यह पता चलता है कि वह मां बनने वाली है। स्त्री की पूर्णता उसके ममत्व में ही तो है। कितना आनंद और माधुर्य है मां शब्द की ध्वनि में...। किंतु नौ माह तक गर्भ में बच्चे को पालना, उसकी रक्षा करना और फिर प्रसव की असहनीय वेदना को सहकर एक शिशु को जन्म देना-यह थोड़ा कठिन है। पर मां शब्द की मधुरता के आगे यह सारा दर्द दूर हो जाता है। स्त्री को ईश्वर ने विशेष रूप से प्रेममयी, सेवामयी तथा करुणामयी बनाया है। वह सम्पूर्ण जगत में सृष्टि की उत्पत्ति व पालन की विशेष भूमिका निभाने वाली है। गर्भावस्था प्रारम्भ होते ही भावी मां की विशेष देखभाल आवश्यक है-जिससे जच्चा और बच्चा दोनों स्वस्थ रह सकें। इसके लिए स्त्री को प्रसव व गर्भावस्था में होने वाली परेशानियों का ज्ञान होना आवश्यक है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए इस पुस्तक को तैयार किया गया है। प्रस्तुत पुस्तक के लेखन में लखनऊ की मशहूर स्त्री रोग विशेषज्ञा डॉ. सरोज श्रीवास्तव का विशेष योगदान प्राप्त हुआ, हम दोनों भाई-बहन उनके हृदय से आभारी हैं। पुस्तक को अपनी मां श्रीमती राजेश शर्मा के श्री चरणों में समर्पित करते हुए हमें अपार प्रसन्नता हो रही है।
डॉ. राजीव शर्मा देश के प्रतिष्ठित होमियोपैथी, योग, प्राकृतिक व वैकल्पिक चिकित्सा परामर्शदाता हैं। डॉ शर्मा की अभी तक सौ से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। देश के कई ख्यातिलब्ध समाचार पत्र-पत्रिकाओं में भी आपके लेख प्रकाशित होते रहे हैं। आप अब तक हजारों लेख लिख चुके हैं। लेखन आपके लिए एक मिशन है। कई पत्र-पत्रिकाओं के सम्पादकीय सलाहकार होने के साथ ही डॉ. राजीव शर्मा 'आरोग्य उद्घोषक' (पाक्षिक) के संपादक और विश्वविख्यात 'एशियन होमियोपैथिक जरनल' के सम्पादक मंडल के सदस्य हैं। होमियोपैथिक व आयुर्वेदिक कम्पनियों में स्वास्थ्य सलाहकार डॉ. शर्मा की आकाशवाणी से अनेक वार्ताएं प्रसारित हो चुकी हैं। आप राष्ट्रीय स्तर पर 'नशा मुक्ति व एड्स जागृति' अभियान से जुड़े हुए हैं। अनेक राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों से जुड़े डॉ. शर्मा को कई पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। 'साहित्य श्री' पुरस्कार से सम्मानित डॉ. राजीव शर्मा भारतीय जीवन बीमा निगम के स्वास्थ्य पर्यवेक्षक तथा उ.प्र. सरकार के मेडिकल ऑफिसर के रूप में कार्यरत हैं। डॉ. राजीव द्वारा चिकित्सा जैसे क्लिष्ट विषयों पर सरल-सुगम भाषा-शैली में किया गया लेखन कार्य सराहनीय व जनोपयोगी है, फलस्वरूप लाखों पाठक लाभान्वित हुए हैं।
गर्भावस्था प्रसवज्ञान और शिशु पालन क्या आप जानती हैं कि नन्हे-मुन्ने के प्रति बरती गई जरा-सी भी लापरवाही उसके लिए घातक सिद्ध हो सकती है? और यह भी कि बच्चे के संपूर्ण विकास के लिए उसके तन के साथ मन का स्वस्थ होना भी जरूरी है। इस पुस्तक में नवजात शिशु की देखभाल के साथ ही 8 वर्ष तक की उम्र के बच्चे की समस्याओं का खुलासा भी किया गया है, जैसे-बच्चा तनावग्रस्त क्यों रहता है? क्या होता है स्कूल फोबिया ? कैसे पहचानें मुस्कराहट के पीछे छिपे डर को ? ... इत्यादि
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