Subscribe for Newsletters and Discounts
Be the first to receive our thoughtfully written
religious articles and product discounts.
Your interests (Optional)
This will help us make recommendations and send discounts and sale information at times.
By registering, you may receive account related information, our email newsletters and product updates, no more than twice a month. Please read our Privacy Policy for details.
.
By subscribing, you will receive our email newsletters and product updates, no more than twice a month. All emails will be sent by Exotic India using the email address info@exoticindia.com.

Please read our Privacy Policy for details.
|6
Sign In  |  Sign up
Your Cart (0)
Best Deals
Share our website with your friends.
Email this page to a friend
Books > Hindu > Puranas > Bhagavata Purana > श्रीमद् एकनाथी भागवत: Commentary by Shri Eknath on the Eleventh Canto of the Bhagavata Purana
Subscribe to our newsletter and discounts
श्रीमद् एकनाथी भागवत: Commentary by Shri Eknath on the Eleventh Canto of the Bhagavata Purana
Pages from the book
श्रीमद् एकनाथी भागवत: Commentary by Shri Eknath on the Eleventh Canto of the Bhagavata Purana
Look Inside the Book
Description

पुस्तक परिचय

 

एकनाथ का जन्म संत परिवार में हुआ था । उनके परदादा भानुदास महाराष्ट्र के महान् संत थे । उनके पुत्र थे चक्रपाणि और उनके पुत्र थे सूर्यनारायण । एकनाथ ने सूर्यनारायण के घर में शक १४५० में पैठण में जन्म लिया । एकनाथ को ज्ञानेश्वर का अवतार कहा जाता है क्योंकि उन्होंने ज्ञानेश्वर के कार्य को पूरा किया । तेरहवीं सदी के अन्तिम दशक में ज्ञानेश्वर ने अपनी इहलीला समाप्त की ।

एकनाथ का जन्म मूल नक्षत्र में हुआ था । उनके जन्म के कुछ ही महीने बाद उनके माता पिता की मृत्यु हो गयी । वे अकेले रह गये तो उनके दादा दादी लाड़ न्यार से उन्हें एका कहकर पुकारने लगे । छठवें वर्ष ही उनका जनेऊ हो गया और उन्हें घर में ही ब्रह्मकर्म की शिक्षा दी जाने लगी । घर में जो गुरु पढ़ाने आते थे वे उनकी बुद्धि की तीव्रता से परेशान थे । एक दिन उन्होंने चक्रपाणीजी से कह ही दिया, मैंने तो पेट के लिये ऊ था कहना सीखा था किन्तु आपका पुत्र ऐसे जटिल प्रश्न करता है कि मैं उसका समाधान नहीं कर पाता । बारह वर्ष की आयु तक आते आते उसने रामायण, महाभारत आदि पौराणिक ग्रन्यों का अध्ययन पूरा कर लिया था । दैनिक कृत्य के उपरान्त वे भगवद्भजन में लग जाते । एक रात वे अकेले ही शिवालय में बैठकर राम कृष्ण हरि का मंत्र जप रहे थे कि तभी उन्हें आत्मिक प्रेरणा हुई कि देवगढ़ जाकर जनार्दन स्वामी के चरणों में गिरना है । वे दादा दादी से बिना कुछ कहे ही देवगढ़ के लिये चल पड़े । तीसरे दिन प्रातःकाल वे देवगढ़ पहुँचे । गुरु के दर्शन होते ही वे मानों गदगद हो गये । उन्होंने स्वयं को उनके चरणों में सौंप दिया । यह शक संवत् १४६७ की घटना है । देवगढ़ में एकनाथ को दत्तात्रेय के दर्शन हुए ।

एकनाथजी ने विपुल ग्रन्ध रचना की जिसमें प्रमुख हैं स्वात्मबोध, चिरंजीव पद, आनन्द लहरी, आदि । नाथभागवत आपका सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है । भावार्थ रामायण भी आपका महत्वपूर्ण ग्रन्थ है।

वेद में जो नहीं कहा गया गीता ने पूरा किया । गीता की कमी की आपूर्ति ज्ञानेश्वरी ने की । उसी प्रकार ज्ञानेश्वरी की कमी को एकनाथी भागवत ने पूरा किया । दत्तात्रेय भगवान के आदेश से सर १५७३ में एकनाथ महाराज ने भागवत के ग्यारहवें स्कंध पर विस्तृत और प्रौढ़ टीका लिखी । यदि ज्ञानेश्वरी श्रीमद्धागवत की भावार्थ टीका है तो नाथ भागवत श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें स्कंध पर सर्वांगपूर्ण टीका है । इसकी रचना पैठण में शूरू हुई और समापन वाराणसी में हुआ । विद्वानों का मत है कि यदि ज्ञानेश्वरी को ठीक तरह से समझना है तो एकनाथी भागवत के अनेक पारायण करने चाहिये । तुकाराम महाराज ने भण्डारा पर्वत पर बैठकर एकनाथी भागवत का एक सहस्र पारायण किये । पैठण में आरम्भ एकनाथी भागवत् मुक्तिक्षेत्र वाराणसी में मणिकर्णिका महातट पर पंचमुद्रा नामक पीठ में कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को पूर्ण हुई । इस ग्रन्थ में भागवत धर्म की परम्परा, स्वरूप विशेषताएँ, ध्येय, साधन आदि भागवत के आधार पर निरूपित हुआ है । 

 

 

 

Sample Pages

























श्रीमद् एकनाथी भागवत: Commentary by Shri Eknath on the Eleventh Canto of the Bhagavata Purana

Item Code:
NZA272
Cover:
Hardcover
Edition:
2011
ISBN:
9788171244027
Language:
Sanskrit Text With Hindi Translation
Size:
10 inch x 7.5 inch
Pages:
852
Other Details:
Weight of the Book: 1.515 kg
Price:
$40.00   Shipping Free
Look Inside the Book
Add to Wishlist
Send as e-card
Send as free online greeting card
श्रीमद् एकनाथी भागवत: Commentary by Shri Eknath on the Eleventh Canto of the Bhagavata Purana

Verify the characters on the left

From:
Edit     
You will be informed as and when your card is viewed. Please note that your card will be active in the system for 30 days.

Viewed 7917 times since 28th Oct, 2018

पुस्तक परिचय

 

एकनाथ का जन्म संत परिवार में हुआ था । उनके परदादा भानुदास महाराष्ट्र के महान् संत थे । उनके पुत्र थे चक्रपाणि और उनके पुत्र थे सूर्यनारायण । एकनाथ ने सूर्यनारायण के घर में शक १४५० में पैठण में जन्म लिया । एकनाथ को ज्ञानेश्वर का अवतार कहा जाता है क्योंकि उन्होंने ज्ञानेश्वर के कार्य को पूरा किया । तेरहवीं सदी के अन्तिम दशक में ज्ञानेश्वर ने अपनी इहलीला समाप्त की ।

एकनाथ का जन्म मूल नक्षत्र में हुआ था । उनके जन्म के कुछ ही महीने बाद उनके माता पिता की मृत्यु हो गयी । वे अकेले रह गये तो उनके दादा दादी लाड़ न्यार से उन्हें एका कहकर पुकारने लगे । छठवें वर्ष ही उनका जनेऊ हो गया और उन्हें घर में ही ब्रह्मकर्म की शिक्षा दी जाने लगी । घर में जो गुरु पढ़ाने आते थे वे उनकी बुद्धि की तीव्रता से परेशान थे । एक दिन उन्होंने चक्रपाणीजी से कह ही दिया, मैंने तो पेट के लिये ऊ था कहना सीखा था किन्तु आपका पुत्र ऐसे जटिल प्रश्न करता है कि मैं उसका समाधान नहीं कर पाता । बारह वर्ष की आयु तक आते आते उसने रामायण, महाभारत आदि पौराणिक ग्रन्यों का अध्ययन पूरा कर लिया था । दैनिक कृत्य के उपरान्त वे भगवद्भजन में लग जाते । एक रात वे अकेले ही शिवालय में बैठकर राम कृष्ण हरि का मंत्र जप रहे थे कि तभी उन्हें आत्मिक प्रेरणा हुई कि देवगढ़ जाकर जनार्दन स्वामी के चरणों में गिरना है । वे दादा दादी से बिना कुछ कहे ही देवगढ़ के लिये चल पड़े । तीसरे दिन प्रातःकाल वे देवगढ़ पहुँचे । गुरु के दर्शन होते ही वे मानों गदगद हो गये । उन्होंने स्वयं को उनके चरणों में सौंप दिया । यह शक संवत् १४६७ की घटना है । देवगढ़ में एकनाथ को दत्तात्रेय के दर्शन हुए ।

एकनाथजी ने विपुल ग्रन्ध रचना की जिसमें प्रमुख हैं स्वात्मबोध, चिरंजीव पद, आनन्द लहरी, आदि । नाथभागवत आपका सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है । भावार्थ रामायण भी आपका महत्वपूर्ण ग्रन्थ है।

वेद में जो नहीं कहा गया गीता ने पूरा किया । गीता की कमी की आपूर्ति ज्ञानेश्वरी ने की । उसी प्रकार ज्ञानेश्वरी की कमी को एकनाथी भागवत ने पूरा किया । दत्तात्रेय भगवान के आदेश से सर १५७३ में एकनाथ महाराज ने भागवत के ग्यारहवें स्कंध पर विस्तृत और प्रौढ़ टीका लिखी । यदि ज्ञानेश्वरी श्रीमद्धागवत की भावार्थ टीका है तो नाथ भागवत श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें स्कंध पर सर्वांगपूर्ण टीका है । इसकी रचना पैठण में शूरू हुई और समापन वाराणसी में हुआ । विद्वानों का मत है कि यदि ज्ञानेश्वरी को ठीक तरह से समझना है तो एकनाथी भागवत के अनेक पारायण करने चाहिये । तुकाराम महाराज ने भण्डारा पर्वत पर बैठकर एकनाथी भागवत का एक सहस्र पारायण किये । पैठण में आरम्भ एकनाथी भागवत् मुक्तिक्षेत्र वाराणसी में मणिकर्णिका महातट पर पंचमुद्रा नामक पीठ में कार्तिक शुक्ल पूर्णिमा को पूर्ण हुई । इस ग्रन्थ में भागवत धर्म की परम्परा, स्वरूप विशेषताएँ, ध्येय, साधन आदि भागवत के आधार पर निरूपित हुआ है । 

 

 

 

Sample Pages

























Post a Comment
 
Post Review
Post a Query
For privacy concerns, please view our Privacy Policy
Based on your browsing history
Loading... Please wait

Items Related to श्रीमद् एकनाथी भागवत: Commentary... (Hindu | Books)

Testimonials
Received doll safely and gift pack was a pleasant surprise. Keep up the good job.
Vidya, India
Thank you very much. Such a beautiful selection! I am very pleased with my chosen piece. I love just looking at the picture. Praise Mother Kali! I'm excited to see it in person
Michael, USA
Hello! I just wanted to say that I received my statues of Krishna and Shiva Nataraja today, which I have been eagerly awaiting, and they are FANTASTIC! Thank you so much, I am so happy with them and the service you have provided. I am sure I will place more orders in the future!
Nick, USA
Excellent products and efficient delivery.
R. Maharaj, Trinidad and Tobago
Aloha Vipin, The books arrived today in Hawaii -- so fast! Thank you very much for your efficient service. I'll tell my friends about your company.
Linda, Hawaii
Thank you for all of your continued great service. We love doing business with your company especially because of its amazing selections of books to study. Thank you again.
M. Perry, USA
Kali arrived safely—And She’s amazing! Thank you so much.
D. Grenn, USA
A wonderful Thangka arrived. I am looking forward to trade with your store again.
Hideo Waseda, Japan
Thanks. Finally I could find that wonderful book. I love India , it's Yoga, it's culture. Thanks
Ana, USA
Good to be back! Timeless classics available only here, indeed.
Allison, USA
Language:
Currency:
All rights reserved. Copyright 2019 © Exotic India