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डॉ.सी.आर.रेड्डी (भारतीय साहित्य के निर्माता): Dr. C.R. Reddy (Makers of Indian Literature)

डॉ.सी.आर.रेड्डी (भारतीय साहित्य के निर्माता):   Dr. C.R. Reddy (Makers of Indian Literature)
$9.60$12.00  [ 20% off ]
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Item Code: NZA509
Author: डी. आंजनेयुलु : (D.Anjaneyalu's)
Publisher: Sahitya Akademi, Delhi
Language: Hindi
Edition: 1992
ISBN: 8172012845
Pages: 62
Cover: Paperback
Other Details: 8.5 inch X 5.5 inch
weight of the books:25 gms

पुस्तक के विषय में

कट्टमंचि रामलिंगा रेड्डी (1880-1951) शिक्षाविद्, राजनीतिज्ञ, निबंधकार, अर्थशास्त्री, कवि एवं आलोचक थे; सभी विशेषताओं से परिपूर्ण एक व्यक्तित्व । उन्होंने तेस्त और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में रचनाएँ कीं जो उन के प्राचीन साहित्य के अध्ययन और उन के प्रति अनुराग के साथ ही उन के आधुनिकता-बोध को उद्घाटित करती हैं । डॉ. रेड्डी को साहित्य के द्रविड स्कूल के आधुनिकता प्रवक्ता ठीक ही कहा जा सकता है । वे तेलुगु साहित्य में विद्यमान द्रविड तत्वों के मूल्यों और तमिलों के साथ उस के घनिष्ट संबंधों को प्रकाश में लाये । कवि के रूप में या आलोचक के रूप में रेड्डी जी की रचनाएँ परिमाण में थोड़ी होने पर भी, प्रभाव की दृष्टि से जानदार और महत्त्वपूर्ण हैं ।

इस पुस्तक के लेखक डॉ. डी. आंजनेयुलु ने तेलुगु साहित्य के बारे में अंग्रेजी में विस्तार से लिखा है । यात्रा विवरण से संबंधित इन की पुस्तक विंडो आन दि वेस्टअधिक प्रशंसित हुई । आप अनुभवी पत्रकार हैं तथा आप ने भारत सरकार के प्रकाशन विभाग में तथा अन्य संस्थाओं में संपादक के रूप में कार्य किया ।

 

प्रस्तावना

तेलुगु मूलत : द्रविड परिवार की भाषा है, बाल रूप से देखने पर भते ही उस में प्रचुर मात्रा में, संकृत के शब्द प्रयुक्त किये जाते हो । तुलनात्मक भाषाविज्ञान के विदेशी और भारतीय विद्वानों ने जो निष्कर्ष निकाले हैं, उनको यदि हम स्वीकार करते हैं तो हमें इस तथ्य को स्वीकार करना होगा कि तेलुगु द्रविड परिवार की भाषा है । उन विद्वानों की वस्तुनिष्ठ एवं वैज्ञानिक अनुशीलता की पद्धतियाँ ही ऐसी हैं कि हमें इस में संदेह करने की कोई गुंजाइश ही नहीं रहती । हमें यह भी महसूस होगा कि वे ऐसे विचारों से परे हैं जो ऐतिहासिक तथ्यों को अकसर तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करते हुए संकुचित प्रांतीयतावाद को फैलाते हैं ।

तेलुगु के लिखित साहित्य का इतिहास यदि एक हजार वर्ष पुराना है तो उस के आधुनिक साहित्य का इतिहास एक सौ साल से कुछ अधिक पुराना है । तेग साहित्य में आधुनिक युग का प्रारंभ उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से माना जाता है । अपने समय के तथा भावी पीढ़ियों के साहित्यकारों को प्रभावित करनेवाले आधुनिकों में तीन-चार लोगों के नाम आदर के साथ लिये जा सकते हैं ।

ब्रिटिश राज्य के प्रशासनिक अधिकारी सी. पी. डाउन तथा उन के समय के पाश्वात्य विद्वानों ने, और उन के द्वारा निर्मित शब्द कोश एवं व्याकरण ग्रंथों ने तेलुगु की शब्दावली के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया में सहयोग प्रदान किया । बाद में इस प्रक्रिया को दूसरे स्तर पर गिडुगु राममूर्ति पय ने आगे बढ़ाया । पंतुलु जी सामान्य बोलचाल की भाषा को साहित्य के माध्यम के रूप में स्वीकार कराने में आजीवन संघर्ष करते रहे ।

संभव है कि आज का लेखक परवस्तु चित्रय सूरी’ (1806-62) को आधुनिक युग के अग्रदूत न माने । कुछ लोग यह भी दलील दे सकते हैं कि उन्होंने तेलुगु भाषा की प्रगति में रोड़े अटकाये । लेकिन वैयाकरण एवं गद्य लेखक के रूप में उन की भूमिका को नजरंदाज नहीं किया जा सकता । उन के पथ से हटकर भिन्न मार्ग को तय करने के संदर्भ में तो उन की प्रमुखता को स्वीकार करना होगा । कंदुकूरि वीरेशलिंगम् पञ्च ने प्रथमत: उन्हें आदर्श के रूप में स्वीकार किया और बाद में उन के मार्ग से अपने को वे संभवत : सचेत रखने लगे । अन्यथा वीरेशलिगम् जी आधुनिक साहित्यिक विधाओ में अग्रणी, एवं बहु जन सुलभ सरल तेलुगु गद्य लेखक के रूप में अपने को स्थापित नहीं कर पाते । यहाँ यह भी स्वीकार करना होगा कि अंग्रेजी के उत्कृट ग्रंथों से भी वे प्रभावित रहे हैं ।

डॉ. सी. आर. रेड्डी (डॉ. कट्टमंचि रामलिंगा रेड्डी) दोनों से प्रगाढ़ रूप से प्रभावित हुए । कंदुकूरि वीरे शलिंगम् तथा चित्रय सूरी के गुणों के कुछ समान लक्षण डॉ. खोई में परिलक्षित होते हैं । वीरेलिंगम् के सामाजिक दृष्टिकोण तथा नवीन रचना प्रवर्तन और चित्रय सूरी की क्लासिकी अमिमुखता तथा परंपरा के प्रति अनुराग, इन सब के सुंदर समन्वय को हम डॉ.रेड्डी में देखते हैं । डी. रेड्डी की गद्य रचना में जो मधुरिमा स्थान पा रही थी, उस से यह प्रमाणित हो जाता है कि चित्रय सूरी उनके वरेण्य गद्य लेखक थे और वीरे शलिंगम् आदर्श साहित्य-स्रष्टा ।

अतीत एवं वर्तमान में डॉ. रेड्डी जैसे भारतीय विद्वान कदाचित नहीं मिलते जिन्होंने देशीय पद्धतियों को छोड़े बिना समकालीन पाश्वात्य चिंतन धारा से अपने आप को बराबर संबद्ध रखा हो । सामान्यतया ऐसे मेधावी विद्वान मिलते हैं जो निज परंपरा से कम अभिज्ञ रहते हुए पाश्वात्य ज्ञान-विज्ञान में अधिक विद्धत्ता हासिल कर चुके होते हैं, भले ही उन में निज भाषा के प्रति अभिमान रहता हो । इस के विपरीत ऐसे भी विद्वान भी मिलते हैं जो निज भाषा व परंपराओं पर पूर्ण अधिकार रखते हैं, लेकिन पाश्वात्य परंपरा से उन का वास्ता वहुत सीमित रहता है ।

रेड्डी जी बहुमुख प्रतिभा संपन्न व्यक्ति के रूप में हमारे सामने प्रकट होते हैं । कई दृष्टियों से कन्नड के सै. एम. श्रीकंठय्या, तमिल के बी. आर. राजन् अन्दर, हिंदी के रामचंद्र शुक्ल और बंगला के माइकेल मधुसूदन दत्त आदि आधुनिकता के अग्रगामी साहित्यकारों से डॉ. रेड्डी की तुलना की जा सकती है । डॉ. रेड्डी को समग्र रूप से समझने का तात्पर्य यही होगा कि एक स्तर पर यूरोपीय-भारतीय परंपराओं और दूसरे स्तर पर आर्य-द्रविड परंपराओं के संभावित सार्थक संगमन को समझना ।

 

विषय सूची

1

प्रस्तावना

2

प्रारंभिक जीवन

3

3

मद्रास और कैम्ब्रिज

5

4

बड़ौदा और मैसूर

9

5

राजनीति में प्रवेश

12

6

उपकुलपति

15

7

कवि

19

8

आलोचक

27

9

निबंधकार

38

10

समाजशास्त्री

43

11

युग प्रवर्तक

46

रेड्डी जी के जीवन की मुख्य घटनाएँ

51

परिशिष्ट - साहित्य. कार्य संपादन के उपकरण के रूप में

53

संदर्भ ग्रंथ सूची

57

 

 

 

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