अलंकार रस्तोगी पेशे से अंग्रजी के शिक्षक और हरकतों से हिंदी के व्यंग्यकार हैं। लखनऊ के नफासत भरे माहौल में भी जनाब बिना मुरव्वत के व्यंग्य की तलवारें चलाकर विसंगतियों का क़त्ल किया करते हैं। लखनऊ की व्यंग्य रवायत को आगे ले जाने की मुहीम में लगे हुए अलंकार रस्तोगी पद्म श्री के पी सक्सेना, हरिशंकर परसाई, शरद जोशी से प्रेरित होकर और गोपाल चतुर्वेदी से व्यंग्य की बारीकियां समझकर व्यंग्यबाज़ी की मुहीम जारी रखे हैं। लगभग बीस साल के व्यंग्य सफ़र में इनकी अब तक छह किताबे लोगों के सामने आ चुकी है। खुदा झूठ न लिखवाये, सभी विकल्प खुले हैं, दो टूक, डंके की चोट पर, जूते की अभिलाषा, अलंकार रस्तोगी के चयनित व्यंग्य और अब मन नहीं भरा तो आपके हाथों में इन्होने अपनी सांतवी किताब 'घातक कथाएं' के रूप में थमा दी है। इसके अलावा जनाब के बीस संयुक्त व्यंग्य संग्रह भी आफत ढा चुके हैं। देश के लगभग सभी समाचार पत्र-पत्रिकाओं में जनाब का बराबर दखल रहता है। न्यूज़ चैनल, दूरदर्शन, आकाशवाणी के अलावा ये जनाब अपने यूट्यूब चैनल 'व्यंग्यबाजी' से भी लगातार अपने व्यंग्य का मुजाहरा किया करते हैं। अपने व्यंग्य लेखन के लिए इनको उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का शरद जोशी सम्मान, केपी सक्सेना युवा व्यंग्यकार सम्मान, रविन्द्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान, उत्तर प्रदेश साहित्य सभा का 'अपनी हिंदी-अपना भारत' सम्मान, नेपाल सरकार का युवा साहित्यकार सम्मान, उत्तर प्रदेश भाषा संस्थान का युवा व्यंग्यकार सम्मान, उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान का साहित्य गौरव सम्मान, माध्यम साहित्य संस्थान का 'अट्टहास युवा सम्मान' समेत अनेक सम्मानों से इन्हें नवाजा जा चुका है। जल्द ही इनका एक व्यंग्य उपन्यास भी आप लोगों पर कहर ढाने के लिए आने वाला है।
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