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सोमदेव रचित कथा सरितसागर : Kathasaritsagar of Somaveda

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सोमदेव रचित कथा सरितसागर : Kathasaritsagar of Somaveda
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सोमदेव रचित कथा सरितसागर : Kathasaritsagar of Somaveda

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Item Code: NZA988
Author: विष्णु प्रभाकर (Vishnu Prabhakar)
Publisher: Sasta Sahitya Mandal Prakashan
Language: Hindi
Edition: 2017
ISBN: 9788173094385
Pages: 455
Cover: Paperback
Other Details: 8.5 inch X 5.5 inch
weight of the book: 470 gms

पुस्तक के विषय में

कथा-सरित्सागर संसार भर के कथा-साहित्य का आदिस्त्रोत है। शेक्सपियर, गेटे बोकेशियो आदि ने जाने कितने सुख्यात विदेशी कथाकारों ने इसी की कथा-कहानियों से अपनी कृतियों की मूल प्रेरणा ग्रहण की है।

और 'सागर' की कथावस्तु भी क्या है! सभी तरह की कथा-कहानियों का एक सागर है, जिसमें छोटी-छोटी कथाओं की न जाने कितनी सरिताएँ और धाराएँ मिलती जाती हैं। इसमें लोककथाएँ हैं, ऐतिहासिक गाथाएँ हैं, पौराणिक वार्ताएँ है, शिक्षा की कहानियाँ हैं, नीति की, बुद्धिमानी की, मूर्खता की, प्रेम की, विरह की, स्त्री-चरित्र की, गृहस्थ-जीवन की भाग्य-चक्र की-संक्षेप में जीवन के हर पहलू से संबंध रखनेवाली कहानियाँ हैं और ऐसी रोचक और मनोरंजक, सरस और मधुर कि एक बार आरंभ करने पर पुस्तक बंद करने को मन नहीं करता।

'कथा-सरित्सागर' संस्कृत के महाकवि सोमदेव भट्ट की अमर कृति है।

प्रस्तुत पुस्तक उसी को हिंदी रूपांतर है।

प्रकाशकीय

भारतीय साहित्य में 'कथा-सरित्सागर' का महत्त्वपूर्ण स्थान है। जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, यह कथा-कहानियों का विशाल भडार है और इसकी कहानियाँ भारत के कोने-कोने में फैली हुई हैं, हालाँकि कम ही लोग जानते हैं कि वे कब से प्रचलित हैं और कहाँ से ली गई हैं।

सारी पुस्तक कहानियों से भरी पड़ी हैं और कहानियाँ भी कैसी? एक-से-एक बढ़कर। इतनी रोचक कि एक बार हाथ में उठा लें तो बिना पूरी किए छूटे ही नहीं। कहानियों को पढ़कर मनोरंजन तौ होता ही है, शिक्षाप्रद भी बहुतेरी हैं, साथ ही उनसे तत्कालीन समाज के जन-जीवन कीं-रीति-रिवाजों, प्रथाओं, लोकाचार-तथा किसी हद तक इतिहास की भी, झाँकी मिलती है।

मूल ग्रंथ की रचना ग्यारहवीं शताब्दी में हुई थी । इन नौ सौ वर्षा में अनेक विद्वानों ने इस पर अन्वेषण-कार्य किया है और अंग्रेजी में तो इसका अनुवाद भी दस जिल्दों में कभी का निकल चुका है। प्रसिद्ध साहित्यकार विष्णु प्रभाकर द्वारा संपादित यह धरोहर पुस्तक पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है। आशा है इसके पठन-पाठन से पाठकों में मूल ग्रंथ को पढ़ने की जिज्ञासा उत्पन्न होगी।

भूमिका

भारतीय साहित्य की विश्व को जो देन है, उसमें लोकप्रिय-कथा की देन विशेष महत्त्व की है। भारत कथाओं का देश है। विश्व में कहानी का प्रचार यही से हुआ है। ईरानियों ने यही से इस कला को सीखा, सीखकर अरबों को सिखाया। अरब से यह कला तुर्की और रोम होती हुई संसार-भर में फैल गई। शोर के महान् कथाकारों बोकेशियो, गेटे ला फोते, चौसर और शेक्सपियर के साहित्य की प्रेरणा ये ही कथाएँ रही हैं। न जाने कितनी कथाएँ न जाने किस-किस देश में गई और वहाँ-वहाँ के जीवन में समा गई। 'कथा-सरित्सागर' इसी प्रकार की कथाओं का एक अद्भुत और महत्वपूण ग्रथ है। साधारणतया भारतीय साहित्य में दो प्रकार की कथाएँ मिलती हैं-उपदेशात्मक और मनोरंजक ।उपदेशात्मक कथाएँ ब्राह्मणो' जैनियो और बौद्धों ने समान रूप से लिखी हैं। बौद्धो की 'जातक-कथाओं का इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान है। जैनियों का भंडार तो अक्षय है अभी तक बहुत कुछ अछूता भी है। वेदी, पुराणों और महाभारत में भी अनेको कथाएँ हैं। 'पचतत्र' का मूल्य तो विश्व-विश्रुत है ही। पशु-पक्षियों के माध्यम से उसमें नीति-शास्त्र की विवेचना की गई है। 'कथा-सरित्सागर' मनोरंजक कहानियों की श्रेणी में आता है। इसमें उपदेशात्मक कथाएँ भी हैं-'पंचतंत्र' के अनेक अश इसका प्रमाण हैं, परतु मुख्यतया इसका लक्ष्य मनुष्य और उसके समाज का चित्रण और मनोरजन करना है। इसलिए साहित्यिक कथाओं में यह बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह ग्रंथ मौलिक नहीं है, बल्कि महाकवि गुणाढ्य द्वारा पैशाची 'भाषा' में लिखी गई एक बहुत प्राचीन और लोकप्रसिद्ध पुस्तक 'बृहत्कथा' का संक्षिप्त रूपातर है।

'बृहत्कथा' आज उपलब्ध नही है। उसके और उसके लेखक के संबंध में पूरी जानकारी भी किसी को नहीं है, परतु वे दोनों थे अवश्य, यह निर्विवाद रूप से सिद्ध हो चुका है। स्वय 'कथा-सरित्सागर' इसका प्रमाण है। इसके प्रथम लवक 'कथा-पीठ' में यह कथा दी हुई है। काश्मीरी संस्करणों में गुणाद्य को गोदावरी तट पर बसे प्रतिष्ठान का निवासी माना है और किसी सातवाहन राजा का कृपा-पात्र बताया है। नेपाली-संस्करण के अनुसार उनका जन्म मथुरा में हुआ और वह उज्जैन के राजा मदन के अश्रित थे। अधिकतर विद्वान् पहली बात को ठीक मानते है। 'बृहत्कथा' के तीन अनुवाद या रूपांतर आज उपलब्ध है।

 

अनुक्रम

 
 

पहला खंड

 

1

वत्सराज

23

2

वररुचि और काणभूति

24

3

पाटलिपुत्र की कहानी

26

4

पाणिनी और राजा नंद

28

5

शकटाल और चाणक्य

30

6

गुणाढ्य

33

7

नाम का रहस्य

36

8

कथाओं की रक्षा

39

 

दूसरा खंड

 

9

सहस्रानीक और मृगावती

40

10

श्रीदत्त की कहानी

42

11

राजा उदयन

47

12

चंडमहासेन और वासवदत्ता

49

13

उदयन की मुक्ति

53

14

उदयन और वासवदत्ता

58

 

तीसरा खंड

 

15

लावणक की कहानी

61

16

अवंतिका की कहानी

65

17

उर्वशी और अहिल्या की कहानी

68

18

विदूषक की कथा

72

19

दिग्विजय की यात्रा

79

20

कार्तिकेय और मंत्र सिद्ध करने की कथा

82

 

चौथा खंड

 

21

देवदत्त की कहानी

89

22

जीमूतवाहन और गरुड़ की कथा

92

23

नरवाहनदत्त का जन्म

96

 

पाँचवाँ खंड

 

24

दो भूतों की कहानी

98

25

कनकपुरी और शक्तिदेव

101

26

विद्याधर शक्तिदेव

104

 

छठा खंड

 

27

मदनमंचुका

109

28

कलिंगसेना

112

29

सोमप्रभा

114

30

मदनवेग और कलिंगसेना

116

31

कलिंगसेना और उदयन

118

32

कदलीगर्भा की कहानी

119

33

कलिंगसेना का विवाह

121

34

नरवाहनदत्त और मदनमंचुका

124

 

सातवाँ खंड

 

35

रत्नप्रभा की कहानी

128

36

सती-धर्म की कहानी

130

37

स्त्री-चरित्र

132

38

शीलवती वेश्या की कथा

1326

39

गुणवरा और रूपशिखा

139

40

पूर्वजन्म का संस्कार

142

41

चिरायु और नागार्जुन

144

42

नरवाहनदत्त की आखेट-यात्रा

146

43

राजकुमारी कर्पूरिका

149

 

आठवाँ खंड

 

44

सूर्यप्रभ की कथा

153

45

असुर और देवता

154

46

युद्ध की तैयारी

159

47

युद्ध का आरंभ

166

48

विजय के लक्षण

167

49

गुणशर्मा की कथा

168

50

चक्रवर्ती-पद की प्राप्ति

173

 

नवाँ खंड

 

51

अलंकारवती

177

52

दिव्य नारियों का दुराचरण

 

53

स्वामिभक्त सेवक

188

54

सुकर्म और पुरुषार्थ की महिमा

191

55

राजा कनकवर्ष की कथा

196

56

नल-दमयंती की कथा

199

 

दसवाँ खंड

 

57

शक्तियशा

208

58

स्त्री-चरित्र

212

59

शास्त्रगंज तोते की कथा

216

60

बुद्धिमानों की कथाएँ

222

61

मूर्खों की कथाएँ

231

62

बुद्धिमानी की कथाएँ

234

63

मूर्खों की कुछ और कथाएँ

238

64

बुद्धिमान पक्षी और मूर्ख मनुष्य

245

65

मनोविनोद की कथाएँ

254

66

और मनोरंजनकारी कथाएँ

260

67

कुछ और कथाएँ

262

68

शक्तियशा का विवाह

270

 

ग्यारहवाँ खंड

 

69

बेला

276

 

बारहवाँ खंड

 

70

ललितलोचना

279

72

अनगवती और विनयवती

281

74

मृगांकदत्त का देश-निकाला

287

76

भीम पराक्रम की मुक्ति

291

78

विनीतमति की कथा

299

80

मंत्री विचित्रकथ का वृत्तांत

309

82

शीलधर की कथा

317

84

बेताल-पच्चीसी : पहला बेताल

323

86

दूसरा बेताल

327

88

तीसरा बेताल

329

90

चौथा बेताल

331

92

पाँचवाँ बेताल

332

94

छठा बेताल

334

96

सातवाँ बेताल

335

98

आठवाँ बेताल

337

100

नवाँ बेताल

339

102

दसवाँ बेताल

339

104

ग्यारहवाँ बेताल

341

106

बारहवाँ बेताल

342

108

तेरहवाँ बेताल

345

110

चौदहवाँ बेताल

346

112

पंद्रहवाँ बेताल

348

114

सोलहवाँ बेताल

351

116

सत्रहवाँ बेताल

351

118

अठारहवाँ बेताल

352

120

उन्नीसवाँ बेताल

354

122

बीसवाँ बेताल

356

124

इक्कीसवाँ बेताल

358

126

बाईसवाँ बेताल

360

128

तेईसवाँ बेताल

361

130

चौबीसवाँ बेताल

362

132

पच्चीसवाँ बेताल

364

134

मंत्रियों से मिलन

365

136

व्याघ्रसेन की कथा

366

138

दूत-कार्य

371

140

युद्ध और विवाह

373

 

तेरहवाँ खंड

 

141

मदिरावती

377

 

चौदहवाँ खंड

 

142

वेगवती

381

143

मानसवेग से युद्ध

383

144

शिव का वरदान

386

145

मानसवेग और गौरिमुंड की पराजय

388

 

पंद्रहवाँ खंड

 

146

महाभिषेक

394

 

सोलहवाँ खंड

 

147

सुरतमंजरी

399

148

सुरतमंजरी का हरण

401

149

तारावलोक

406

 

सत्रहवाँ खंड

 

150

पद्यावती

409

151

मुक्ताफलकेतु

412

152

विद्युद्ध्वज की मृत्यु

415

153

मुक्ताफललकेतु को शाप

417

154

मुक्ताफलकेतु मनुष्य-रूप में

419

155

शाप-मुकिा

421

 

अठारहवाँ खंड

 

156

विषमशील

426

157

मदनमंजरी की कथा

428

158

मलयवती का विवाह

435

159

धनदत्त वैश्य की कथा

438

160

पूर्णाहुति

447














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