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मौलाना जलालुद्दीन रूमी: Maulana Jalaluddin Rumi

मौलाना जलालुद्दीन रूमी: Maulana Jalaluddin Rumi
$13.00
Item Code: NZD148
Author: त्रिनाथ मिश्र (Trinath Mishra)
Publisher: Publications Division, Government of India
Language: Hindi
Edition: 2007
ISBN: 8123014694
Pages: 136
Cover: Paperback
Other Details: 8.5 inch X 5.5 inch
weight of the book: 220 gms

पुस्तक के विषय में

निर्मल प्रेम की तन्मयता के साथ ईश्वर से एकरूपता की अनुभूति तसव्वुफ या सूफ़ी मत का आधार है। पश्चिम-मध्य एशिया में जन्मी सूफ़ी विचारधारा वेदांत दर्शन और भक्ति-मार्ग के भी बहुत करीब है । भारत में सूफ़ी साधना के प्रति सदा ही आदर और आकर्षण का भाव रहा है ।

मौलाना जलालुद्दीन रूमी सूफी साधना और फारसी काव्य के सबसे चमकते सितारों में एक हैं । इरा पुस्तक में रूमी के प्रेरणामय जीवन तथा प्रेममय कृतित्व के साथ-साथ, सूफ़ी सिद्धांतों और साधना- पद्धति का भी संक्षिप्त परिचय रोचक तथा प्रवाहपूर्ण शैली में दिया गया है । लेखक डॉ. त्रिनाथ मिश्र हिंदी, संस्कृत और फारसी भाषा-साहित्य के मर्मज्ञ अध्येता हैं । भारतीय पुलिस सेवा के पूर्व-अधिकारी डॉ. मिश्र ने केन्द्रीय आरक्षी बल और केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल के महानिदेशक जैसे अनेक वरिष्ठ पदों का कार्यभार निभाया है ।

भूमिका

सभ्यता के प्रारंभिक काल से ही चिंतनशील व्यक्ति सृष्टि, स्रष्टा, सृष्टि का कारण, स्रष्टा एवं सर्जित प्राणियों का संबंध सदृश विषयों पर चिंतन-मनन करते रहे हैं। विभिन्न धर्मों के प्रवर्त्तकों ने इन प्रश्नों के उत्तर समाज के समक्ष रखे। उनके अनुसार उनके हृदय में ये उत्तर भगवद्कृपा से उद्भूत हुए थे अत: इनके संबंध में तर्क-वितर्क नहीं किया जा सकता था । मानव-समाज का अधिकांश भाग इन प्रवर्त्तित धर्मों का अनुयायी बन गया। लेकिन हर देश एवं समाज में कतिपय ऐसे व्यक्ति हर काल में रहे जिन्होंने स्वतंत्र रूप से स्वयं इन रहस्यों का उत्तर ढूंढने की चेष्टा की । उनकी चिंतन- धारा कभी प्रचलित धार्मिक आस्थाओं से जुड़ी रही और कभी अलग रही । अपने स्वतंत्र चिंतन के कारण इन मनीषियों को तत्कालीन रूढ़िवादी धर्माचार्यों एवं उनके अनुयायी शासकों की यातना एवं प्रताड़ना भी सहनी पड़ी । इन विभीषिकाओं के बावजूद इस धारा का प्रवाह रुका नहीं क्योंकि स्वतंत्र चिंतन बुद्धिवान व्यक्तियों का नैसर्गिक स्वभाव है ।

भारत में इस प्रक्रिया का प्रारंभ ऋग्वैदिक काल में ही हो गया था । 'नासदीय सूक्त' इस का प्रमाण है । उपनिषदों तथा सूत्र-ग्रंथों में इस चिंतन- धारा का व्यापक रूप देखा जा सकता है । उपनिषदों में धर्म के सामाजिक एवं वैधानिक स्वरूप के स्थान पर परम दैवी तत्व के साथ जिज्ञासु व्यक्ति के संबंधों की चर्चा उन्मुक्त रूप से की गई है । इस चिंतन-प्रक्रिया की परिणति वेदांत-दर्शन में हुई जिसके अनुसार पूरी सृष्टि-व्यष्टि एवं समष्टि-दोनों को परम-तत्त्व का दर्शित रूप माना गया और इसी परम-तत्त्व (ब्रह्म) के चिंतन, मनन, ध्यान एवं पूजन को ही मनुष्य-जीवन का चरम लक्ष्य माना गया । परवर्ती कालों में भक्ति-संप्रदाय के विचारकों ने प्रेम को आराधना का प्रमुख आधार घोषित किया । शरीरी एवं अशरीरी, दोनों प्रकार की प्रेम-मूलक उपासना-पद्धति इन्हें ग्राह्य थी । इस चिंतन-धारा ने साहित्य, विशेषत: काव्य एवं दृश्य तथा श्रव्य ललित कलाओं के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई । अन्य देशों में भी इस प्रकार के स्वतंत्र चिंतन की परंपरा रही है । यूनान में इस प्रक्रिया ने नव-अफलातूनी दर्शन का प्रवर्त्तन किया और मध्य-पूर्व-तुर्की, अरब, ईरान एवं अफगानिस्तान में 'तसव्वुफ़ ' या सूफ़ी मत का । भारत एवं मध्य तथा पश्चिम एशियाई देशों के बीच प्राचीन काल से ही घनिष्ठ संबंध रहे हैं । मध्य-एशियाई भू- भाग तो आठवीं शताब्दी तक बौद्ध- धर्म का प्रमुख केंद्र था । दोनों क्षेत्रों में पारस्परिक व्यापार के साथ-साथ सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विचारों का भी आदान-प्रदान चलता रहा । भारत में अफगान एवं मुगल सल्तनतों की स्थापना ने इस प्रक्रिया को और अधिक गति प्रदान की । भारत के विभिन्न भू- भागों में सूफ़ी विचारक. संत एवं कवि अपने विचारों का प्रचार-प्रसार करने लगे । उदारचेता भारतीय संस्कृति ने इन विचारकों का स्वागत किया । इनके विचारों का व्यापक प्रभाव भारतीय मानस पर पड़ा जिसकी स्पष्ट छाप मध्ययुगीन भक्ति- आदोलन पर देखी जा सकती है ।

तसव्वुफ़ की दुनिया में मौलाना जलालुद्दीन रूमी का स्थान शीर्षस्थ है । रूमी के विचारों ने परवर्ती सूफी एवं भक्ति-मत के विचारकों एवं साहित्यकारों को बड़ा प्रभावित किया है । परंपरागत धार्मिक रूढ़ियों एवं रीति-रिवाजों के स्थान पर उत्कट व्यक्तिगत प्रेम को ईश-आराधना के आधार के रूप में रूमी ने प्रतिष्ठित किया । इस्लामी उपासना-पद्धति द्वारा उपेक्षित संगीत एवं नृत्य को उन्होंने ईशोपासना का सहज एवं सरल साधन माना । इस क्षेत्र में महाप्रभु चैतन्यदेव ओंर उनके विचारों तथा उपासना-पद्धति में अद्भुत साम्य परिलक्षित होता है । रूमी की रचना-शैली में भी उक्त सांस्कृतिक आदान-प्रदान की झलक स्पष्ट दीखती है । 'मसनवी' का शिल्प महाभारत, कथा-सरित्सागर एवं पंचतंत्र का समरूप है । कालांतर में मलिक मोहम्मद जायसी एवं गोस्वामी तुलसीदास ने अपने महाकाव्यों में यही शैली अपनाई ।

हिंदी साहित्य जगत में जो स्थान तुलसी और सूरदास को प्राप्त है, वही स्थान फारसी काव्य-जगत में रूमी और हाफ़िज़ को हासिल है । ये दोनों फारसी- काव्य-गगन के सूरज और चांद हैं । रूमी प्रसिद्ध हैं अपनी भाव-प्रवणता, नीति-परकता एवं दार्शनिक दृष्टि के लिए और हाफिज की ख्याति है काव्य-लालित्य एवं अभिव्यक्ति की कमनीयता के लिए । रूमी भारतीय सुधी पाठकों के प्रिय कवि रहे हैं । इनकी सूक्तियां लिखित एवं मौखिक रूप से बहुधा उद्धृत होती रहती है । हिंदी पाठकों को इस कालजयी विचारक तथा कवि के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का परिचय देने के उद्देश्य से इस पुस्तक की रचना की गई है ।

 

अनुक्रम

1

सूफ़ी मत : सिद्धांत और साधना

1

2

रूमी का युग

17

3

जीवन-वृत तथा परिवेश

21

4

दीवान-ए-शम्स : प्रेम-निर्झरिणी

57

5

मसनवी- ओ-मानवी : समग्र जीवन-दृष्टि

79

6

मसनवी के कुछ रोचक आख्यान

97

7

रूमी और भारत

117

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