प्राक्कथन
प्राणायाम साधना के कालान्तर में मेरुदण्ड मध्य ऊर्ध्वगामी प्राणवायु के भूमध्य अवस्थित कूटस्थ रूपी गुफा द्वार में प्रवेश के उपरान्त विलुप्तावस्था में सर्वदा गुँजायमान दिव्य प्रणव ॐ कार निनाद प्रकृतिस्वरूप का श्रवण-दर्शन होता है, जो आत्मनः स्वयंब्रह्मनादप्रकाश है। इस अवस्था में काल की स्थिरगम्यता अनिर्वचनीय योगलब्ध भाव की प्रतीक्षा मात्र ही है। अंतःकरण में आत्मगुरुब्रह्मतत्त्व का स्फुरण संचार होता है। यह एक सिद्धिजन्य, अनुभवगम्य एवं अनुभूतिपरक अविनाशी गुह्यतम कड़ी है। प्राचीन काल से ही योगी इसकी सार्वभौम गोपनीयता की प्रतिज्ञा एवं प्रण लेते देते रहे हैं। सत्यपथगामी साधक इस गुह्य प्राच्यविज्ञान की अन्तर्निहित जटिलताओं के फलस्वरूप प्रायः दिग्भ्रमित हो जाते हैं एवं बाह्य ॐ कार ध्वनि-प्राकट्य में आत्म-निरूपण करते हैं।
इस ग्रन्थ में कूटस्थित भगवान श्री कृष्ण एवं साधक अर्जुन के मध्य ॐ कार रहस्य संवाद का विस्तृत विवरण है। यह कृति इस दिव्य संवाद का सारोपनिषद् एवं ब्रह्मविद्या योगशास्त्र है । प्राच्यकाल में यह अपूर्व विद्या महाकाल के त्रिनेत्र में अन्तर्निहित थी जो महामाया के कालप्रवाह में विलुप्तावस्था में नियोजित हो गई। कालान्तर में अनेक ऋषि-मुनियों ने अपनी योग-तपस्चर्या की स्थिति के अनुसार इसके बहुआयामी खण्डों को प्राप्त किया जोकि श्रीमद्भगवदगीता, अन्य उपनिषदों इत्यादि ग्रन्थों में पृथक भाव से उपलब्ध है।
यह स्थूल शरीर बाह्य ॐकार स्वरुप है।
प्राचीन क्रिया योग संस्थान (कूटस्थिते दिव्यचक्षुदर्शितेन् सं चालितः दिव्यः उपक्रमः) (सिद्धाश्रमे अवस्थितः मठः) के एक मूर्धन्य मनीषि एवं रहस्यवादी गृहस्थ योगी ने अपनी अनन्य योग भक्ति तथा प्राणायाम के सघन अभ्यास से क्रिया योग से उत्पन्न ॐकार गीता के इन अर्थों को पुनः प्राप्त किया । इन्हीं अनुभूतिजन्य एवं अनुभवपरक भावों का इस कृति में विवरण है। यह कृति प्राणायामजन्य सत्य घटनाओं एवं अनुभवों की अद्वितीय साक्ष्य है ।
इस पुस्तक की रचना का आधार अन्तःपुर में ॐकार गीता के गूढ अर्थों एवं अलौकिक अनुभूतियों का रहस्योद्घाटन है। इस पारलौकिक स्पंदन को लेखनी में समाहित करना अति दुष्कर होता अगर ये कार्य सिद्ध साधन निर्देशित न होता। अनिर्वचनीय, अलौकिक एवं अद्भुत आनंद से परिपूर्ण इस साधना यात्रा में ॐकार गीता साख्य भाव दर्शित तथा सम्पूर्ण समर्पण के आभिर्भावभूत लक्षित हुई। इसी विशिष्ट अवस्था की समग्रता का समावेश इस रचना में लेखनीवश समाहित है।
प्राचीन क्रिया योग संस्थान प्राचीन जीवन विज्ञान शैली को सरलता एवं सुगमता से प्रदर्शित एवं पारदर्शित करने हेतु कटिबद्ध है।
इस स्थूल काया का अस्तित्व एकमात्र ध्यान प्रक्रिया के सम्पादन हेतु है। इसके अतिरिक्त जीव नगण्य एवं रिक्त है।
साधनाकाल में साधक अपरिमित चरणों से गुजरता है। किसी भी चरणविशेष के पड़ाव का निर्धारण उसकी विशिष्टता एवं साधक की अंतर्दशा से होता है। इस साधनाक्रम में साधक की बाह्य दशावलोकन से उसकी अन्तर्दशा का स्पष्ट बोध नहीं हो पाता है। बाह्य लक्षण यथा शरीर का भयानक कम्पन एवं उत्तोलन (वायु में तैरना) इत्यादि से दर्शक हत्प्रभ एवं विस्मित हो उठता है। जबकि साधक स्वयं साक्ष्य भाव से इन बाह्य लक्षणों को सरलता एवं सुगमता से स्वीकार करते हुए साधनारत रहता है।
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