प्राक्कथन
शरीर के अग्र (पूर्व) भाग में चलायमान श्वास-निःश्वास का स्वतः अदृश्य होना एक प्रयासरहित अनुभव है जो साक्षी भाव से व्युत्पन्न होता है। यहीं से क्रिया के सप्त चरण से आत्म दर्शन की स्वयात्रा आरम्भ होती है।
लाहिड़ी महाशय के गुरु (प्राचीन क्रिया योगी) ने १०८ क्रिया प्रदान की, जिसमें ११ का चयन कर लाहिड़ी जी ने कतिपय योग्य शिष्यों के समक्ष प्रस्तुत किया। प्रथम क्रिया में पञ्च क्रिया है जिसके सूक्ष्म आयाम का विस्तार द्वितीय, तृतीय, चतुर्थ, पञ्चम, षष्ठी व सप्तम क्रिया में है।
प्राचीन क्रिया योगी चन्द्रशेखर ने इन क्रिया सूत्रों का कूटस्थ दर्शन श्रवण कर इस प्राचीन क्रिया ग्रन्थ में लिपिबद्ध किया है। सन्निहित गूढ अर्थों की त्रिनेत्रस्थ स्वानुभव व्याख्या की गयी है।
यह ग्रन्थ प्राचीन क्रिया योगी द्वारा प्राचीन क्रिया योगी को समर्पित है।
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