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पुरवाई कथा माला- Purvai Katha Mala (A Collection of Selected Stories Published in Purvai in 2022)

$25
Includes any tariffs and taxes
Specifications
Publisher: India Netbooks Private Limited, Noida
Edited By Piyush Kumar Dubey
Language: Hindi Text
Pages: 128
Cover: Paperback
8.50x5.50 inch
Weight 190 gm
Edition: 2025
ISBN: 9789349810518
BA1535
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Book Description

 

 

भूमिका


"पुरवाई कथा माला 2022" नामक पुरवाई का यह कथा-संग्रह अबकी बहुत विलंब से आ रहा है। हम 2025 में हैं, तब 2022 की कहानियों का संकलन ला रहे हैं। किंतु, यह विलंब अकारण नहीं है; अपितु, इसके पीछे कारणों की लंबी श्रृंखला है, जिसमें पुरवाई पर साइबर अटैक होने, उसके अव्यवस्थित हो जाने, पुनर्निर्मित होकर सुचारू होने सहित हमारे संपादन मण्डल सदस्यों के व्यक्तिगत जीवन की व्यस्तताएँ भी कारक रही हैं। वस्तुतः सीमित लोगों और सीमित संसाधनों के साथ चल रही आपकी अपनी पत्रिका 'पुरवाई' की कठिनाइयाँ हमारे पाठक समझेंगे, ऐसी अपेक्षा है।


जैसा कि 'पुरवाई कथा माला' में होता आया है, इस संग्रह में भी हमने 2022 में प्रकाशित सभी कहानियों में से 12 कहानियाँ सम्मिलित की हैं। ये कहानियाँ मानवीय संबंधों, सामाजिक यथार्थ, ऐतिहासिक संदर्भों और जीवन की विविध परिस्थितियों को उजागर करती हैं। पुरवाई के संपादक आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी के मार्गदर्शन में बहुत चर्चा-चिंतन के उपरांत इन कहानियों का चयन किया गया है।


वरिष्ठ साहित्यकार प्रबोध कुमार गोविल की कहानी "चपरकनाती" एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से समृद्ध कहानी है, जो मलमल के वस्त्रों के माध्यम से औपनिवेशिक शोषण की त्रासदी बयान करती है। यह भारतीय समाज की उस पीड़ा को उभारती है, जिसे औपनिवेशिक शोषण और स्थानीय सामाजिक जटिलताओं ने गहराया। मलमल के वस्त्र, जो कभी भारतीय गौरव का प्रतीक हुआ करते थे, औपनिवेशिक सत्ता की नीतियों के कारण विलुप्ति के कगार पर आ गए। इसके माध्यम से लेखक ने यह भी दिखाया है कि कैसे आर्थिक और सांस्कृतिक शोषण एक साथ चलते हैं और किस प्रकार एक समृद्ध परंपरा धीरे-धीरे मिटती चली जाती है। "चपरकनाती" केवल इतिहास का दस्तावेज नहीं है, बल्कि वर्तमान संदर्भों में भी यह हमें सोचने पर मजबूर करती है कि किस प्रकार बाहरी ताकतों और आंतरिक सामाजिक विसंगतियों के कारण हमारी सांस्कृतिक धरोहर नष्ट हो रही है।


वरिष्ठ लेखिका ज़किया जुबैरी की "ग़रीब तो कई बार मरता है" कहानी समाज में महिलाओं की स्थिति और उनकी कठिनाइयों को सामने रखती है। एक मुस्लिम परिवार को केंद्र में रखकर बुनी गई यह कहानी समाज की उस सच्चाई को उजागर करती है, जिसमें निर्धनता, सामाजिक अन्याय और महिलाओं की दुर्दशा को प्रमुखता से उभारा गया है। कहानी की नायिका सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि उस समाज का प्रतिबिंब है, जहाँ गरीबों को बार-बार मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक रूप से मरना पड़ता है। आर्थिक तंगी, सामाजिक भेदभाव और निरंतर उपेक्षा के कारण वे जीवन की हर चुनौती को झेलते हैं, फिर भी उनकी दुर्दशा को देखने और समझने वाला कोई नहीं होता।


वरिष्ठ कथाकार महेंद्र भीष्म की कहानी "हलाला" एक बेहद संवेदनशील और प्रासंगिक मुद्दे को उठाती है, जिसमें मज़हबी क़ायदों के बीच पिसती एक औरत की त्रासदी को दर्शाया गया है। तीन तलाक और हलाला जैसी कु-प्रथाएँ किस तरह एक महिला के जीवन को कठिन बना देती हैं, यह इस कथा के केंद्र में है। लेखक ने बड़ी संजीदगी से इस विषय को प्रस्तुत किया है, जिससे पाठक को न केवल स्त्री-पीड़ा का अनुभव होता है, बल्कि वह सामाजिक व्यवस्था पर भी गंभीरता से विचार करने को मजबूर होता है।


ललिता यादव की कहानी "कौतुक क्रीड़ा" अपनी कथावस्तु में बहुत नई भले न हो, किंतु इसका शिल्प-विधान अत्यंत रोचक है। एक लड़की की जीवन-यात्रा को केंद्र में रखकर बढ़ती यह कहानी, जिस-जिस तरह के घटनाक्रमों को दर्ज करती चलती है, वो न केवल इसको पाठ की दृष्टि से रोचक बनाते हैं, अपितु इसके कथा-शिल्प में भी बहुत कुछ जोड़ते हैं। यह कहानी सिद्ध करती है कि प्रस्तुति में नयापन हो, तो एक बहुलिखित-बहुपठित विषय पर भी रोचक कहानी लिखी जा सकती है।


सुधा जुगरान द्वारा रचित "इक्कीसवीं सदी की नायिका" कहानी आधुनिक नारी की आत्मनिर्भरता और संघर्ष को केंद्र में रखकर कथा का तानाबाना बुनती है। यह समाज में व्याप्त पारंपरिक धारणाओं को चुनौती देने वाली एक ऐसी लड़की की कहानी है, जो अपनी शर्तों पर जीवन जीती है। पारंपरिक दृष्टि की माँ और आधुनिक दृष्टि की पुत्री का वैचारिक द्वंद्व इस कहानी का मुख्य 'प्लॉट पॉइंट' है, जो पाठक को लगातार कहानी से बाँधे रखता है। कहीं माँ जीतती दिखती है, तो कहीं पुत्री का पक्ष मजबूत लगता है। यह द्वंद्व कहानी के अंत तक चलता रहता है और फिर अंत भी ऐसा होता है कि कौन जीता कौन हारा का निर्णय सहज नहीं रह जाता।


डॉ. गरिमा संजय दुबे की कलम से निकली कहानी "पर छवि कहाँ समाय" एक गहन संवेदना के धागों से कथा का वितान बुनती है। एक कलाकार के लिए कला का उद्देश्य क्या होता है? यह प्रश्न शताब्दियों से कला-चिंतकों के मध्य मंथन का विषय रहा है। 'कला के लिए कला' का विचार भी इस मंथन से ही उपजा है। इसका प्रतिवाद भी हुआ है। यह कहानी इस द्वंद्व को बहुत धीमे-धीमे, कहानी के कहानीपन को बनाए रखते हुए, रोचक घटनाक्रमों के साथ खोलती है। इस कहानी की विषयवस्तु और प्रस्तुति-विधान दोनों ही इतने मोहक हैं कि पाठक एकबार पढ़ना शुरू करे तो फिर इसके विस्तार से ऊबे बिना कब अंत तक पहुँच जाता है, पता ही नहीं चलता। कहानी का अंत जो कहता है, वो कोई नई बात नहीं है; किंतु, उसमें जो संवेदना निहित है, उसका मर्म कभी भी पुराना या उपेक्षणीय नहीं हो सकता।


सुधा आदेश की कहानी "अपराजिता" स्त्री की आत्मशक्ति, आत्मनिर्भरता और अदम्य साहस को उजागर करती है। यह कहानी स्नेहा नामक एक ऐसी स्त्री के इर्द-गिर्द घूमती है, जो चुनौतियों का सामना करते हुए हार नहीं मानती, बल्कि जूझकर परिस्थितियों को अपने अनुकूल बनाने का प्रयास करती है। समाज द्वारा लगाए गए बंधनों और रूढ़ियों को तोड़ते हुए, वह अपने आत्मसम्मान और अस्तित्व की रक्षा करती है। कहानी इस विचार को बल देती है कि एक स्त्री केवल सहनशीलता और त्याग का प्रतीक नहीं है, बल्कि अपने अधिकारों और सपनों के लिए लड़ने वाली एक मजबूत व्यक्तित्व भी है। कहानी में संघर्ष नायिका के साथ सहचर बनकर चला है और जब लगता है कि अब कहानी एक सुखांत मोड़ पर है, तभी एक नए संघर्ष का आगमन हो जाता है। कहानी का अंत विशेष है, जहाँ जीवन के दोराहे पर खड़ी नायिका सुविधा को छोड़ पुनः संघर्ष का मार्ग चुनकर कहानी के शीर्षक को सार्थक बना देती है।


डॉ. हंसा दीप की कहानी 'शून्य के भीतर' मानवीय संवेदनाओं, अकेलेपन, आत्मीयता और पशु-पक्षियों के प्रति प्रेम की गहरी भावनाओं को उकेरती है। कुमुडी एक समर्पित डॉक्टर है, जिसने अपने जीवन का अधिकांश भाग दूसरों की सेवा में लगा दिया, लेकिन अंततः वह खुद अकेली पड़ गई। जीवनभर परिवार और जिम्मेदारियों में उलझी कुमुडी को अपने व्यक्तिगत जीवन के लिए सोचने का अवसर ही नहीं मिला। जब अपनों ने उसे अनदेखा किया, तब उसने पशु-पक्षियों में अपनेपन और स्नेह की भावना को पाया। कहानी का संदेश है कि प्रेम और अपनापन केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों में भी यह संवेदना गहरी होती है।

 

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