Subscribe for Newsletters and Discounts
Be the first to receive our thoughtfully written
religious articles and product discounts.
Your interests (Optional)
This will help us make recommendations and send discounts and sale information at times.
By registering, you may receive account related information, our email newsletters and product updates, no more than twice a month. Please read our Privacy Policy for details.
.
By subscribing, you will receive our email newsletters and product updates, no more than twice a month. All emails will be sent by Exotic India using the email address info@exoticindia.com.

Please read our Privacy Policy for details.
|6
Sign In  |  Sign up
Your Cart (0)
Best Deals
Share our website with your friends.
Email this page to a friend
Books > Hindi > सन्त वाणी > गोपीनाथ कविराज > सनातन-साधना की गुप्तधारा: The Secret Flow of Eternal Sadhana
Subscribe to our newsletter and discounts
सनातन-साधना की गुप्तधारा: The Secret Flow of Eternal Sadhana
सनातन-साधना की गुप्तधारा: The Secret Flow of Eternal Sadhana
Description

प्राक्कथन

पंडित गोपीनाथ कविराज इस युग के अलौकिक प्रतिभाशाली मनीषी थे। उनका अध्ययन जितना विस्तृत था, उतनी उनकी मेधा-शक्ति प्रबल थी। जीवन के अन्तिम दिनों तक वे अध्ययन करते रहे और अपनी ज्ञान राशियाँ जिज्ञासुओं में वितरण करते रहे।

अपनी शान पिपासा को शान्त कराने के लिए उनके निकट बड़े-बड़े योगी, महापुरुष, साधक, ज्ञानी, विद्वान से लेकर सामान्य जन तक आते थे। वेद, वेदान्त, सांख्य, उपनिषद्, दर्शन, अध्यात्म, योग, पुराण आदि ग्रंथों का उद्धरण देकर वे जिज्ञासुओं की जिज्ञासा शान्त करते थे। योगियों को पातंजल योग, गोरखपंथी योग, बौद्धों का हीनयानी, महायानी योग, पाशुपत योग, शैव योग, तांत्रिक योग के बारे में कहा करते थे और साधारण जन को गुरु के महत्व की व्याख्या करते हुए कहते थे- ''अचर का मतलब अचित्, चर का मतलब चित् एवं विष्णु का मतलब परमेश्वर या ईश्वर एवं तत्पद का अर्थ ब्रह्मस्वरूप है। श्रीगुरु इन चारों तत्त्वों से उच्त्तर तत्व हैं '' 'नास्ति तत्त्व गुरो: परम' इस प्रसिद्ध वाक्य में भी गुरुभाव की श्रेष्ठता सूचित करती है।

परम श्रद्धेय कविराजजी का यह ग्रंथ उनके अन्य ग्रंथों से भिन्न है। वस्तुत: इस ग्रंथ में जिज्ञासुओं द्वारा पूछे गये महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर व्याख्या के साथ दिये गये हैं। अन्य ग्रंथों में प्रतिपाद्य विषयों पर व्यापक रूप से चर्चा है, फिर भी जिज्ञासुओं के मन में अपनी निजी जिज्ञासाएँ रहती हैं, उनका निरसन कविराज ने पत्रों के माध्यम से तथा मौखिक रूप से किया है। इस संकलन में उन्हीं पत्रों तथा उत्तरों का संग्रह किया गया है जिन लोगों को उनके निकट बैठकर इन प्रवचनों को सुनने का अवसर मिला है, उन्हें उसका आस्वाद मिला है और वे तृप्त हुए हैं।

इस संकलन में श्रद्धेय कविराजजी ने नादानुसंधान के सम्बन्ध में जैसी चर्चा की है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। इसी प्रकार जप-विज्ञान, गुरुशक्ति, चित्शक्ति, चिदाकाश, समाधि आदि विभिन्न विषयों पर अपने विचार प्रकट किये हैं तो ब्रह्मदर्शन, आत्मदर्शन, भगवत् दर्शन की व्याख्या की है।

कविराजजी की प्रतिभा पर विस्मय इसलिए होता है कि तंत्र, अध्यात्म, योग दर्शन के एक विद्वान ने विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर के काव्य ग्रंथ की जिस ढंग से आलोचना की है, वह अद्भुत है।

रवीन्द्र-साहित्य के आलोचकों की कमी नहीं है, 'वलाका' ग्रंथ में कवि की कैसी भावना थी और किस दृष्टि से इसकी रचना हुई है, इसका सर्वप्रथम उद्घाटन श्रद्धेय कविराज ने किया है लेख के प्रारंभ में जिस भाषा का प्रयोग किया गया है, जैसी शैली है, वह अनेक साहित्यकारों की कलम से प्रकट नहीं होती। साहित्य की यह छटा केवल रवि बाबू की रचनाओं में दिखाई देती है। यद्यपि कविराजजी ने अन्त में इस आलोचना को अध्यात्म का रूप दिया है, फिर भी यह स्वीकार करना पड़ेगा कि रचना अपूर्व है।

इस ग्रंथ के प्रकाशन में सर्वापेक्षा उत्साही आदरणीय श्री जगदीश्वर पाल हैं जिनकी सहायता के बिना यह संकलन तैयार होता। इसके लिए वे साधुवाद के पात्र हैं मुझे विश्वास है अध्यात्म, तंत्र, योग, समाधि, विभूति आदि के बारे में जिन लोगों को उत्सुकता रहती है, उन्हें इस ग्रंथ से सहायता प्राप्त होगी।

 

विषय-सूची

1

नाद

1

2

नाद-विन्दु

5

3

नाद-ध्वनि ()

9

4

नाद-ध्वनि ()

10

5

महानाद

14

6

काल और क्षण

16

7

जप ()

20

8

जप ()

22

9

जप-रहस्य ()

24

10

जप-रहस्य ()

27

11

कृत्रिम-अकृत्रिम वैन्दव देह

29

12

त्याग और भोग

31

13

परमतत्त्व की अनुभूति

33

14

भगवत्-प्राप्ति

37

15

प्रकृति-धर्म

38

16

हृदयाकाश

41

17

ब्रह्मभाव

43

18

ब्रह्म-दर्शन

45

19

पुरुषोत्तम भाव

47

20

भाव

48

21

भोग्य वस्तु

51

22

शब्द ब्रह्म

54

23

नित्यलीला

59

24

मानस-वृन्दावन

60

25

काल तत्त्व

61

26

चिदाकाश

62

27

परमपद

66

28

कर्त्ता और कर्म

67

29

आत्मदर्शन

68

30

चार प्रश्नों के उत्तर

71

31

चित्शक्ति

73

32

सद्गुरु

74

33

गुरु-महात्म्य

75

34

विन्दु-र्शन का रहस्य

77

35

साधना

80

36

विन्दु

80

37

पूर्णमिदं

81

38

द्रष्टा-रूप

84

39

आत्मदर्शन

86

40

चैतन्यावस्था

88

41

विरह

91

42

पराशक्ति

92

43

चित्तशुद्धि

99

44

आत्मज्ञान

100

45

प्रकाश और ज्योति

103

46

स्तम्भवृत्ति

105

47

वाच्य और वाचक

108

48

कर्मकाण्ड

110

49

सविकल्प-निर्विकल्प

111

50

आत्मोन्नति

112

51

जन्म-जन्मान्तर

112

52

अमर देह

116

53

जीवोद्धार

118

54

प्रेम

122

55

संभोगकाय

123

56

सात प्रश्नों के उत्तर

124

57

योगी की परीक्षा

126

58

इष्टदेवी के रूप

136

59

ज्ञान और अज्ञान

138

60

समाधि

141

61

अध्यात्म का विकास

145

62

गायत्री

147

63

तीन जन्मों का विचार

150

64

आत्मा का पूर्ण जागरण और उसकी परिणति

152

65

आध्यात्मिक उत्कर्ष का क्रम-विकास

164

66

जीव का आविर्भाव और पूर्णत्व लाभ-एक दृष्टि

167

67

मानस-पूजा

180

68

रवीन्द्रनाथ की वलाका

188

69

सनातन-साधना की गुप्तधारा

198

70

फुटकर

201

सनातन-साधना की गुप्तधारा: The Secret Flow of Eternal Sadhana

Item Code:
NZA785
Cover:
Paperback
Edition:
2008
ISBN:
9788171246106
Language:
Hindi
Size:
8.5 inch X 5.5 inch
Pages:
202
Other Details:
Weight of the Book:190 gms
Price:
$15.00   Shipping Free
Add to Wishlist
Send as e-card
Send as free online greeting card
सनातन-साधना की गुप्तधारा: The Secret Flow of Eternal Sadhana

Verify the characters on the left

From:
Edit     
You will be informed as and when your card is viewed. Please note that your card will be active in the system for 30 days.

Viewed 4331 times since 30th Oct, 2018

प्राक्कथन

पंडित गोपीनाथ कविराज इस युग के अलौकिक प्रतिभाशाली मनीषी थे। उनका अध्ययन जितना विस्तृत था, उतनी उनकी मेधा-शक्ति प्रबल थी। जीवन के अन्तिम दिनों तक वे अध्ययन करते रहे और अपनी ज्ञान राशियाँ जिज्ञासुओं में वितरण करते रहे।

अपनी शान पिपासा को शान्त कराने के लिए उनके निकट बड़े-बड़े योगी, महापुरुष, साधक, ज्ञानी, विद्वान से लेकर सामान्य जन तक आते थे। वेद, वेदान्त, सांख्य, उपनिषद्, दर्शन, अध्यात्म, योग, पुराण आदि ग्रंथों का उद्धरण देकर वे जिज्ञासुओं की जिज्ञासा शान्त करते थे। योगियों को पातंजल योग, गोरखपंथी योग, बौद्धों का हीनयानी, महायानी योग, पाशुपत योग, शैव योग, तांत्रिक योग के बारे में कहा करते थे और साधारण जन को गुरु के महत्व की व्याख्या करते हुए कहते थे- ''अचर का मतलब अचित्, चर का मतलब चित् एवं विष्णु का मतलब परमेश्वर या ईश्वर एवं तत्पद का अर्थ ब्रह्मस्वरूप है। श्रीगुरु इन चारों तत्त्वों से उच्त्तर तत्व हैं '' 'नास्ति तत्त्व गुरो: परम' इस प्रसिद्ध वाक्य में भी गुरुभाव की श्रेष्ठता सूचित करती है।

परम श्रद्धेय कविराजजी का यह ग्रंथ उनके अन्य ग्रंथों से भिन्न है। वस्तुत: इस ग्रंथ में जिज्ञासुओं द्वारा पूछे गये महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर व्याख्या के साथ दिये गये हैं। अन्य ग्रंथों में प्रतिपाद्य विषयों पर व्यापक रूप से चर्चा है, फिर भी जिज्ञासुओं के मन में अपनी निजी जिज्ञासाएँ रहती हैं, उनका निरसन कविराज ने पत्रों के माध्यम से तथा मौखिक रूप से किया है। इस संकलन में उन्हीं पत्रों तथा उत्तरों का संग्रह किया गया है जिन लोगों को उनके निकट बैठकर इन प्रवचनों को सुनने का अवसर मिला है, उन्हें उसका आस्वाद मिला है और वे तृप्त हुए हैं।

इस संकलन में श्रद्धेय कविराजजी ने नादानुसंधान के सम्बन्ध में जैसी चर्चा की है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। इसी प्रकार जप-विज्ञान, गुरुशक्ति, चित्शक्ति, चिदाकाश, समाधि आदि विभिन्न विषयों पर अपने विचार प्रकट किये हैं तो ब्रह्मदर्शन, आत्मदर्शन, भगवत् दर्शन की व्याख्या की है।

कविराजजी की प्रतिभा पर विस्मय इसलिए होता है कि तंत्र, अध्यात्म, योग दर्शन के एक विद्वान ने विश्वकवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर के काव्य ग्रंथ की जिस ढंग से आलोचना की है, वह अद्भुत है।

रवीन्द्र-साहित्य के आलोचकों की कमी नहीं है, 'वलाका' ग्रंथ में कवि की कैसी भावना थी और किस दृष्टि से इसकी रचना हुई है, इसका सर्वप्रथम उद्घाटन श्रद्धेय कविराज ने किया है लेख के प्रारंभ में जिस भाषा का प्रयोग किया गया है, जैसी शैली है, वह अनेक साहित्यकारों की कलम से प्रकट नहीं होती। साहित्य की यह छटा केवल रवि बाबू की रचनाओं में दिखाई देती है। यद्यपि कविराजजी ने अन्त में इस आलोचना को अध्यात्म का रूप दिया है, फिर भी यह स्वीकार करना पड़ेगा कि रचना अपूर्व है।

इस ग्रंथ के प्रकाशन में सर्वापेक्षा उत्साही आदरणीय श्री जगदीश्वर पाल हैं जिनकी सहायता के बिना यह संकलन तैयार होता। इसके लिए वे साधुवाद के पात्र हैं मुझे विश्वास है अध्यात्म, तंत्र, योग, समाधि, विभूति आदि के बारे में जिन लोगों को उत्सुकता रहती है, उन्हें इस ग्रंथ से सहायता प्राप्त होगी।

 

विषय-सूची

1

नाद

1

2

नाद-विन्दु

5

3

नाद-ध्वनि ()

9

4

नाद-ध्वनि ()

10

5

महानाद

14

6

काल और क्षण

16

7

जप ()

20

8

जप ()

22

9

जप-रहस्य ()

24

10

जप-रहस्य ()

27

11

कृत्रिम-अकृत्रिम वैन्दव देह

29

12

त्याग और भोग

31

13

परमतत्त्व की अनुभूति

33

14

भगवत्-प्राप्ति

37

15

प्रकृति-धर्म

38

16

हृदयाकाश

41

17

ब्रह्मभाव

43

18

ब्रह्म-दर्शन

45

19

पुरुषोत्तम भाव

47

20

भाव

48

21

भोग्य वस्तु

51

22

शब्द ब्रह्म

54

23

नित्यलीला

59

24

मानस-वृन्दावन

60

25

काल तत्त्व

61

26

चिदाकाश

62

27

परमपद

66

28

कर्त्ता और कर्म

67

29

आत्मदर्शन

68

30

चार प्रश्नों के उत्तर

71

31

चित्शक्ति

73

32

सद्गुरु

74

33

गुरु-महात्म्य

75

34

विन्दु-र्शन का रहस्य

77

35

साधना

80

36

विन्दु

80

37

पूर्णमिदं

81

38

द्रष्टा-रूप

84

39

आत्मदर्शन

86

40

चैतन्यावस्था

88

41

विरह

91

42

पराशक्ति

92

43

चित्तशुद्धि

99

44

आत्मज्ञान

100

45

प्रकाश और ज्योति

103

46

स्तम्भवृत्ति

105

47

वाच्य और वाचक

108

48

कर्मकाण्ड

110

49

सविकल्प-निर्विकल्प

111

50

आत्मोन्नति

112

51

जन्म-जन्मान्तर

112

52

अमर देह

116

53

जीवोद्धार

118

54

प्रेम

122

55

संभोगकाय

123

56

सात प्रश्नों के उत्तर

124

57

योगी की परीक्षा

126

58

इष्टदेवी के रूप

136

59

ज्ञान और अज्ञान

138

60

समाधि

141

61

अध्यात्म का विकास

145

62

गायत्री

147

63

तीन जन्मों का विचार

150

64

आत्मा का पूर्ण जागरण और उसकी परिणति

152

65

आध्यात्मिक उत्कर्ष का क्रम-विकास

164

66

जीव का आविर्भाव और पूर्णत्व लाभ-एक दृष्टि

167

67

मानस-पूजा

180

68

रवीन्द्रनाथ की वलाका

188

69

सनातन-साधना की गुप्तधारा

198

70

फुटकर

201

Post a Comment
 
Post Review
Post a Query
For privacy concerns, please view our Privacy Policy
Based on your browsing history
Loading... Please wait

Items Related to सनातन-साधना की गुप्तधारा:... (Hindi | Books)

Kavya Chintan by Gopinath Kaviraj (Hindi only)
Item Code: NZA040
$18.00
Add to Cart
Buy Now
Testimonials
Kailash Raj’s art, as always, is marvelous. We are so grateful to you for allowing your team to do these special canvases for us. Rarely do we see this caliber of art in modern times. Kailash Ji has taken the Swaminaryan monks’ suggestions to heart and executed each one with accuracy and a spiritual touch.
Sadasivanathaswami, Hawaii
Good selections. and ease of ordering. Thank you
Kris, USA
Thank you for having books on such rare topics as Samudrika Vidya, keep up the good work of finding these treasures and making them available.
Tulsi, USA
Received awesome customer service from Raje. Thank You very much.
Victor, USA
Just wanted to let you know the books arrived on Friday February 22nd. I could not believe how quickly my order arrived, 4 days from India. Wow! Seeing the post mark, touching and smelling the books made me long for your country. Reminded me it is time to visit again. Thank you again.
Patricia, Canada
Thank you for beautiful, devotional pieces.
Ms. Shantida, USA
Received doll safely and gift pack was a pleasant surprise. Keep up the good job.
Vidya, India
Thank you very much. Such a beautiful selection! I am very pleased with my chosen piece. I love just looking at the picture. Praise Mother Kali! I'm excited to see it in person
Michael, USA
Hello! I just wanted to say that I received my statues of Krishna and Shiva Nataraja today, which I have been eagerly awaiting, and they are FANTASTIC! Thank you so much, I am so happy with them and the service you have provided. I am sure I will place more orders in the future!
Nick, USA
Excellent products and efficient delivery.
R. Maharaj, Trinidad and Tobago
Language:
Currency:
All rights reserved. Copyright 2019 © Exotic India