प्राक्कथन
कूटस्थ उपदिष्ट दशमुखी गूढ महाविद्याओं के अर्जन से साधक, भावविहीन प्राणायामाभ्यास के कारण, रावण पद को प्राप्त हो जाता है। इस अवस्था में साधक को मेरुदण्डरुपी हिमालय मध्यस्थित सुषुम्ना नाड़ी के सूक्ष्माग्र सिरे (यही कैलाश है) में विचित्र अभिकम्पन की अनुभूति होती है। तदनन्तर साधक के कूटस्थ में स्थित अङ्गुष्ठ प्रमाण शिवपुरुष की माया से १०८ मुखी ताण्डव क्रिया का अभ्युदय होता है, जिसके भावपूर्वक दृढ़ प्राणायामाभ्यास से साधक शिव पद को सहज ही प्राप्त हो जाता है।
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