Satya Ghatnakramena Aadharitah Paralaukik Katha Shrinkhala
प्रस्तावना
उन दिनों मेरा अधिकांश समय प्रारब्धानुसार गुप्त प्राणायाम साधना में व्यतीत होता था, लेखनी रुक-सी गयी थी । काल की स्थिरगम्यता मानों अनुभवजन्य किसी योगलब्ध भाव की प्रतीक्षा मात्र थी। दैव भाव से मेरे हाँथों में एक साथ कई कृतियाँ आ गई जिनमें 'तृतीय नेत्र' भी था । कौतूहलवश कतिपय पृष्ठों के अवलोकन मात्र ने योगानन्द कृत एक विशिष्ट पुस्तक की याद दिला दी ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी। लेकिन लेखक "अरुण कुमार शर्मा" एक गृहस्थ अध्यात्म अन्वेषी लगे जिनका योगाभ्यास से दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं था, परन्तु इनकी कृतियाँ प्राणायामजन्य सत्य घटनाओं की अद्वितीय साक्ष्य थी ।
स्वयं लेखक के शब्दों में-
'तृतीय नेत्र' में मैंने जो कुछ लिखा है और जो कुछ व्यक्त किया है, उस पर आप विश्वास करें या न करें यह आपकी अन्तरात्मा पर निर्भर है।
मैंने अपने पाण्डित्य, अध्यात्मिक ज्ञान और अपनी विद्वता को प्रदर्शित करने का कभी भी प्रयास नहीं किया है और न तो ख्यातोपलब्धि के लिए कभी कलम उठाने का ही प्रयन किया है मैंने ।
पृथ्वी विशाल है। काल का प्रवाह अनन्त है। कभी तो कोई काल के प्रवाह में पड़कर इस पृथ्वी पर जन्म लेगा और जन्म लेकर मेरे बौद्धिक श्रम का मूल्य समझेगा। मेरे आध्यात्मिक ज्ञान को हृदयंगम करेगा और महत्व देगा मेरे पाण्डित्य को ।
कालचक्रानुसार इन कृतियों का वैदिक ज्ञान-सागर-प्रचार-प्रसार-कृत्य के अन्तर्गत विश्व के प्रत्येक कण में प्रवाह स्वतः निसृत हो रहा है। इस आध्यात्मिक ज्ञान की किरणें प्राचीन क्रिया योग संस्थान द्वारा परिष्कृत रूप में प्राचीन सनातन वैदिक मठ की अंतरात्मा में स्थापित हो चुकी हैं।
ऐसी ही एक कृति पी० डी० ऑसपेंसकी की टर्शियम ऑरगेनोन थी। प्रकृति की अबूझ पहेलियों का ये भी एक पहलू था ।
प्रस्तुत कथा संग्रह तृतीय नेत्र के अन्तर्गत त्रयोदश कथाओं का संग्रह है। ये अपने आप में विशिष्ट तो हैं ही, रहस्य रोमांच से भरपूर और सनसनी खेज भी हैं। यद्यपि ये अविश्वसनीय लगे किन्तु इनमें अतिशयोक्ति नहीं है। लेखक की भाषा में प्राञ्जलता और भाषा पर अधिकार भी है।
आशा है प्रस्तुत कथा-संग्रह भी अन्य कथा-संग्रहों की भांति पाठकों को प्रीतिकर होगी।
प्राचीन क्रिया योग संस्थान के एक मूर्धन्य मनीषि एवं रहस्यवादी गृहस्थ योगी ने अपनी अनन्य योग भक्ति तथा प्राणायाम के सघन अभ्यास से भूमध्य अवस्थित तृतीय नेत्र को जागृत किया, जिसका विस्तृत विवरण भविष्य में एक ग्रन्थ रूप में साधकों के लिए उपलब्ध होगा ।
प्राचीन क्रिया योग संस्थान प्राचीन जीवन विज्ञान शैली को सरलता एवं सुगमता से प्रदर्शित एवं पारदर्शित करने हेतु कटिबद्ध है।
इस स्थूल काया का अस्तित्व एकमात्र ध्यान प्रक्रिया के सम्पादन हेतु है। इसके अतिरिक्त जीव नगण्य एवं रिक्त है।
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