center>लेखक परिचय-1 डॉ. पूनम कुशवाहा का जन्म 23 अप्रैल 1990 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के गाँव भीमापार में हुआ। उनके पिता श्री मुनिराम कुशवाहा और माता श्रीमती गीता देवी हैं। उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा में एम.ए. (गृह विज्ञान), एम.ए. (समाजशास्त्र), एम.एड. तथा पीएच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त की हैं। उन्होंने अपने अध्यापन जीवन की शुरुआत सहायक अध्यापिका के रूप में मुखराम महाविद्यालय, गाजीपुर, उत्तर प्रदेश से की। वर्तमान में उनका स्थायी पता गाँव भीमापार, पोस्ट भीमापार, जिला गाजीपुर, उत्तर प्रदेश है। डॉ. पूनम कुशवाहा का दृष्टिकोण व्यावहारिक और प्रेरक है। वे लेखन को केवल विचारों के आदान-प्रदान का माध्यम नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का सशक्त साधन मानती हैं। उनके विचारों और अनुभवों की प्रासंगिकता शैक्षिक तथा सामाजिक दोनों ही क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। उनके योगदान से पाठकों में ज्ञान, संवेदनशीलता और चिंतन की क्षमता विकसित होती है, जो उनकी लेखनी को विशिष्ट और प्रभावशाली बनाती है। वे 'मनोविज्ञान के तत्व : अर्भ से कुमार तक' पुस्तक की सह-लेखिका भी हैं, जिसे उन्होंने डॉ. अजय कुमार मौर्य के साथ संयुक्त रूप से लिखा है। संपर्क सूत्र : मोबाइल नं.- 9838993918, ईमेल-poonamkushwaha613@gmail.com
लेखक परिचय-2
डॉ. जयनारायण त्रिपाठी एक प्रतिष्ठित, अनुभवी एवं कर्मठ शिक्षाविद् हैं। उनका जन्म 9 जुलाई 1977 को जनपद मेरठ के कंकर खेरा में एक सुसंस्कृत एवं शिक्षाप्रेमी परिवार में हुआ। उनके पिता श्री राजेंद्र प्रसाद त्रिपाठी हैं, जिनसे उन्हें अनुशासन, परिश्रम और नैतिक मूल्यों की प्रेरणा प्राप्त हुई। डॉ. त्रिपाठी ने अपनी उच्च शिक्षा हिंदी साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में प्राप्त की। उन्होंने हिंदी साहित्य में एम.ए. तथा शिक्षा विषय में एम.एड. की उपाधि अर्जित की। इसके उपरांत उन्होंने शिक्षा विषय में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त कर शैक्षणिक शोध के क्षेत्र में अपनी दक्षता सिद्ध की। शैक्षणिक सेवा के क्षेत्र में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा है। उनकी प्रथम नियुक्ति जयश्री कॉलेज, मेरठ में विभागाध्यक्ष (एच.ओ.डी.) के पद पर हुई, जहाँ उन्होंने शिक्षण के साथ-साथ विभागीय शैक्षणिक गतिविधियों को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वर्तमान में बसुंधरा टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज (स्वशासी), मुजफ्फरपुर में विभागाध्यक्ष (एच.ओ.डी.) के रूप कार्यरत हैं। डॉ. जयनारायण त्रिपाठी शिक्षा के क्षेत्र में सतत नवाचार, मूल्यपरक शिक्षण एवं भावी शिक्षकों के निर्माण के प्रति निरंतर समर्पित रहे हैं। संपर्क सूत्र : मोबाइल नं.-9870663156, ईमेल-jainaraintripathi@gmail.com
लेखक परिचय-3
डॉ. अजय कुमार मौर्य का जन्म 10 सितम्बर 1987 को उत्तर प्रदेश के जनपद जौनपुर के ग्राम बड़ेरी (पोस्ट - बड़ेरी) में हुआ। उनके पिता श्री रामशंकर मौर्य एवं माता श्रीमती राजकुमारी मौर्या हैं। बचपन से ही उनमें अध्ययन, चिंतन और सृजनशील कार्यों के प्रति गहरी रुचि रही है। उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त करते हुए एम.ए. (मनोविज्ञान), एम.ए. (प्राचीन इतिहास), एम.एड., एन.ई.टी. एवं पी.एच.डी. की उपाधियाँ अर्जित कीं। शिक्षण क्षेत्र में डॉ. मौर्य का योगदान उल्लेखनीय रहा है। उनकी प्रथम नियुक्ति रॉयल प्रूडेंस कॉलेज, लखीमपुर खीरी के इतिहास विभाग (बी.एड.) में सहायक अध्यापक के रूप में हुई, जहाँ उन्होंने शिक्षक-प्रशिक्षण के क्षेत्र में समर्पण, अनुशासन और उत्कृष्टता का परिचय दिया। तत्पश्चात् उनकी द्वितीय नियुक्ति बी.टी.टी.सी. (स्वशासी), मुजफ्फरपुर (बिहार) में हुई, जहाँ वे वर्तमान में शिक्षा के आदर्शों और नैतिक मूल्यों के प्रसार हेतु सक्रिय हैं। वे 'मनोविज्ञान के तत्व: अर्भ से कुमार तक' पुस्तक के सह-लेखक भी हैं, जिसे उन्होंने डॉ. पूनम कुशवाहा के साथ लिखा है। डॉ. अजय कुमार मौर्य का जीवन शैक्षणिक अनुशासन, विनम्रता और सामाजिक दायित्वबोध का सुंदर उदाहरण है। वे शिक्षा को केवल ज्ञानार्जन का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की आधारशिला मानते हैं। संपर्क सूत्र : मोबाइल नं.- 7977598629, ईमेल- Ajaymaurya44037@gmail.com
भूमिका
मनोविज्ञान मानव व्यवहार, मानसिक प्रक्रियाओं तथा अनुभवों का वैज्ञानिक अध्ययन है। शिक्षा, समाज, संस्कृति और व्यक्तिगत विकास- इन सभी क्षेत्रों में मनोविज्ञान की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। अधिगम (Learning) और प्रेरणा /मोटिवेशन (Motivation) मनोविज्ञान के ऐसे केन्द्रीय विषय हैं, जिनके माध्यम से मानव व्यवहार को समझने, दिशा देने और सकारात्मक रूप से परिवर्तित करने का प्रयास किया जाता है। इनके साथ-साथ स्मृति, ध्यान, बुद्धि, संवेग, अभिप्रेरणा, व्यक्तित्व, मानसिक स्वास्थ्य, विकासात्मक अवस्थाएँ, सामाजिक व्यवहार, परीक्षण एवं मापन जैसे लगभग सभी मनोवैज्ञानिक विषय आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं। अधिगम वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा व्यक्ति अनुभव, अभ्यास एवं प्रशिक्षण के माध्यम से अपने व्यवहार में अपेक्षाकृत स्थायी परिवर्तन लाता है। शिक्षा मनोविज्ञान में अधिगम का अध्ययन इसलिए आवश्यक है क्योंकि शिक्षण की सफलता सीधे-सीधे अधिगम की गुणवत्ता पर निर्भर करती है। व्यवहारवादी, संज्ञानात्मक, गेस्टाल्ट तथा रचनावादी सिद्धांतों ने अधिगम की प्रक्रिया को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इन सिद्धांतों के माध्यम से यह स्पष्ट होता है अधिगम केवल बाह्य उद्दीपनों की प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि एक जटिल मानसिक प्रक्रिया है जिसमें चिंतन, समस्या समाधान, अंतर्दृष्टि और अनुभव की प्रमुख भूमिका होती है। प्रेरणा या मोटिवेशन अधिगम की आत्मा मानी जाती है।
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