लेखक परिचय
डॉ. रेवन्त दान थार रेगिस्तान के भींयाड़ गाँव में जन्म हिन्दी-उर्दू ग़ज़ल में डॉक्टरेट 'सूरज को न्योता' प्रथम काव्य संकलन 'समकालीन हिन्दी-उर्दू ग़ज़ल का अंतःसाक्ष्य' आलोचना पुस्तक । सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन
पुस्तक परिचय
भाषा हमारी आत्मा है, हमारा हथियार है, माध्यम है, इसलिए भाषा से ही परम्परा बोध मिलता है और भाषा ही प्रतिरोध को जन्म देती है। हमारी लोकभाषाओं ने इस संबंध में महत्त्वपूर्ण कार्य किया है किन्तु अब गांव भी बदल रहे हैं और वहां अच्छी राजस्थानी, भोजपुरी, मैथिली नहीं रही है। लोकभाषाओं के साहित्यकारों का यह दायित्व है कि लोक की आत्मा लोकभाषा के सार्थक पक्षों को पहचानें और राजनीति की अराजकता के विरुद्ध उसे प्रतिरोध की ताकत के रूप में इस्तेमाल करें। आईदान सिंह भाटी की कविताओं में मुझे लोकभाषा के इसी सार्थक व प्रतिरोधी रूप की झलक मिलती है। वे स्थानिकता, परम्परा और प्रतिरोध के सौन्दर्यबोध के कवि हैं।
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