प्राक्कथन
डी. लिट. के लिये विषय के चयन हेतु कई विद्वानों से सलाह-मशविरा करने के बाद एक लंबे समय तक इस पर गहन मनन और चिंतन हुआ है। आर.डी.सी. के समय भी जो छः-सात वर्ष पूर्व मध्यप्रदेश के बाहर से तमाजशास्त्र के विद्वान इन्दौर विश्वविद्यालय में आये थे उन्होंने मेरे दूरदर्शन संबंधी विषय को निरस्त करते हुए कहा कि इस पर बहुत काम हो चुका है अतः कोई दूसरा विषय हो तो बतलाये । एतद् मैंने अपने पात सुरक्षित एक और शोध अनुक्रमणिका पश्चिमी मध्यप्रदेश के जनजातियों की बनाकर रखी थी, उसी को मेरे आदरणीय विद्वानद्वय ने आवश्यक संसोधन कर मुझसे कहा, आप इसे ही विश्वविद्यालय में जमा कर दीजिये और तब मैंने सात प्रतियों में संशोधित अनुक्रमणिका विश्वविद्यालय के आचार्य से हस्ताक्षर करबाकर जमा कर दी। इस बीच और भी अनेक बाधाएं आयी है और फिर पुनः एक और आर.डी.सी. होने के बाद इस विषय की तीन बार आर.डी.सी. हो चुकी है। वैसे मैं 1997 से डी.लिट्. के लिये संघर्ष करते हुए वर्तमान में इस कार्य को पूर्ण करने में सफल हुआ हूँ। इसे मैं अपने प्रारब्ध या भाग्य की लकीरों से नहीं जोड़ना चाहता क्योंकि किसी भी बड़े कार्य को करने में बाधाएं तो आती ही है। शोधार्थी के इस शोध का विषय 'अन्तर्जनजातीय असमानताएं (पश्चिमी मध्यप्रदेश के भील, भिलाला, बारेला, ठाकरिया, दरबारिया और तड़वी जनजातीय समुदायों के विशिष्ट संदर्भ में) एक विशेष बात यह भी है कि इसे मैं स्पष्ट करना चाहूंगा। सर्वप्रथम करीब एक माह तक एक पर्यटक की तरह खरगोन, बड़वानी, झाबुआ, धार और रतलाम जिले के जनजातीय क्षेत्रों का भ्रमण किया है और समस्त उपजातियों के संबंध में जानकारी भी प्राप्त की है। इस संबंध में लगभग छः माह तक मैं इन्हीं जनजातियों के बारे में चिंतन करता रहा हूं और संबंधित विद्वानों की पुस्तकों का अध्ययन भी निश्वित किया है और तब शोधार्थी इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि इस कार्य को किस तरह गति प्रदान की जाए। सर्वप्रथम प्रश्नावली को एक आकार दिया गया और समस्त अध्यायों के आंतरिक स्वरूप को इस प्रश्नावली में स्थान दिया गया जिससे शोच की वस्तुनिष्ठता स्पष्ट हो सके। यहीं से इस शोध प्रबंध को पूर्ण करने के प्रति एक प्रक्रिया निश्चित हुई है। यह अध्ययन कुल 11 अध्यायों में पूर्णता की कसौटी पर संपूर्ण आकार में वन पाया है। एतद् प्रथम अध्याय में पश्चिमी मध्यप्रदेश का क्षेत्र परिचय प्रस्तुत हुआ है। इसे भी दो खंडों में बांटा गया है। प्रथम खण्ड 'अ' में रतलाम, धार, झाबुआ, खरगोन एवं बड़वानी जिलों के भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक स्थिति का विश्लेषण किया गया है। इसी अध्याय के 'ब' खण्ड में पश्चिमी मध्यप्रदेश की जनसंख्यात्मक स्थिति दर्शायी गयी है। चूंकि रतलाम जिला काफी बड़ा है और यहां रेलवे लाईन भी है। यहीं से आदिवासी रोजगार की तलाश में अहमदाबाद, बड़ौदा या दाहोद की और अपना आवागमन सरल बना पाते हैं। रतलाम जिले में ठाकरिया और भीलों के समुदाय अधिक निवास करते हैं किन्तु जनसंख्यात्मक स्थिति में उनकी संख्या संपूर्ण जिले में बहुत कम आंकलित हुई है। धार जिला तो आदिवासियों के नाम से ही अपनी पहचान बनाता है। यहां के अधिकांश कृषक जो भिलाला और ठाकरिया हैं तथा कुछ दरबारिया भी है, कि संख्या लगभग समानुपात में है। भील समुदाय के परिवार भी यहां पर निवास करते हैं। सर्वेक्षण से यह जानकारी प्राप्त हुई है कि यहां भिलालाओं का वर्चस्व दरबारिया और ठाकरियाओं की तरह ही है। यहां का भील समुदाय उपेक्षित समुदाय के रूप में अपनी पहचान बनाये हुए है। इनके पास कृषि भूमि का भी अभाव है। प्रायः पहाड़ी स्थानों पर इनके झोंपड़े या आवास देखे गये हैं। झाबुआ जिला आदिवासियों के नाम पर संपूर्ण एशिया में अपनी विशेषताओं के कारण जाना जाता है। यहां पहले अपराध बहुत अधिक होते थे। यह जिला बहुत अधिक पिछड़ा हुआ है। शासन की योजनाएं भी इस जिले में सबसे अधिक चलायी जा रही है किन्तु वे उतनी सफल नहीं हो पायी है और इसीलिये आज पश्चिमी मध्यप्रदेश में यह जिला पिछड़े हुए जिलों में अपना स्थान एक चर्चा में बनाये हुए है।
लेखक परिचय
नाम : डॉ. एम.एल.वर्मा, पत्र-पत्रिकाओं में 'निकुंज' नाम से चर्चित। जन्म सन् 1945 में, मध्यप्रदेश के बड़वानी शहर में। शिक्षा: एम.ए. (हिन्दी, समाज शास्त्र), साहित्य रत्न, पी-एच.डी. तथा डी.लिट् । प्रकाशन: अब तक लगभग 50 कहानियां, 60 आलेख और 30 शोध-पत्र देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित । उपाधि सम्मान : डॉ. अम्बेडकर राष्ट्रीय अस्मितादर्शी साहित्य अकादमी, उज्जैन द्वारा 'गुरूनारायण स्वामी विद्या वरिधि' से सम्मानित । प्रकाशन अनुदान भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद्, नई दिल्ली द्वारा शोध प्रकाशन के लिये। पाठक मंच: म.प्र. साहित्य परिषद् भोपाल द्वारा पाठक मंच बड़वानी के लिए संयोजक के रूप में मनोनयन । नामांकित समाज वैज्ञानिक भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो), भारत सरकार, अहमदाबाद के नामांकित समाज वैज्ञानिक । पुरस्कार एवं सम्मान : म.प्र. दलित साहित्य अकादमी द्वारा 'सतपुड़ा के आंसू' उपन्यास को दलित साहित्य अकादमी का पुरस्कार । निमाड़ लोक संस्कृति न्यास खंडवा द्वारा 'सिंगाजी सम्मान-2008' मध्य प्रदेश स्वराज संस्थान, भोपाल द्वारा वर्ष 2004 की नेशनल फेलोशिप । सम्प्रति : उत्कर्ष अनुसंधान परिषद बड़वानी के सचिव एवं संपादक अनेक शोध जर्नल्स का संपादन। सेवानिवृत: विभागाध्यक्ष समाजशास्त्र विभाग, शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, बड़वानी (म.प्र.)।
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