लेखक परिचय
डॉ. सुनील कुमार तिवारी जन्मतिथि: 15 जुलाई 1970 जन्मस्थान: कानपुर (उ.प्र.) : प्रातः स्मरणीय पं. मन्नालाल जी तिवारी बाबा : श्री जगदम्बा प्रसाद तिवारी पिता माता : श्रीमती प्रेमा देवी शिक्षा : एम.एस.सी. (रसायन विज्ञान) एम.ए. (गणित, हिन्दी, राजनीति विज्ञान) एम.एड., पी-एच.डी. छत्रपति साहू जी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर (उ.प्र.), डिप्लोमा इन कम्प्यूटर सम्प्रति उपसम्पादक शिक्षा चिन्तन प्रकाशन: वैदिक गणित माड्यूल, गणित शब्दकोश, एन.सी.ई.आर.टी. की कक्षा-1 (हिन्दी, अंग्रेजी एवं गणित) की पाठ्यपुस्तकों पर आधारित शिक्षक प्रशिक्षण माड्यूल (प्रकाशक राज्य शैक्षिक अनुसंधान प्रशिक्षण परिषद् (उ.प्र.) लखनऊ), गणितशब्द कोश, अंतरक्षि झलक शोधपत्र 15 प्रकाशित पुरस्कार : उत्कृष्ट शिक्षक प्रशिक्षक राज्य शिक्षा संस्थान प्रयागराज, सर्वोत्तम शिक्षक (जिलाधिकारी महोदय, फतेहपुर)
प्रस्तावना
आज देश की प्रगति में सबसे अधिक बाधक समस्या निरक्षरता है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के उपरान्त से शिक्षा पर ध्यान दिये जाने व धन व्यय किये जाने के बाद भी देश की कुल जनसंख्या के 50 प्रतिशत लोग मतदान की पर्ची पर सही निशान नहीं लगा पाते हैं। सन् 1971 में निरक्षर लोगों की संख्या 37.73 करोड़ थी, जो कि 1981 में बढ़कर 42.23 करोड़ हो गयी। आज भी देश की कुल जनसँख्या का बहुत बड़ा भाग निरक्षरता एवं अशिक्षा के कारण शिक्षा के उद्देश्यों से अनभिज्ञ है। अन्धविश्वास, भाग्यवाद तथा सामाजिक कुरीतियों आदि विचारों से ग्रसित है। परिणामस्वरूप आपेक्षित प्रगति के अभाव में देश के विकास का मार्ग अवरूद्ध है। अस्तु लोगों की कठिनाईयों के निवारण हेतु सामाजिक कुरीतियों के समापन हेतु यह आवश्यक है कि ऐसे दृष्टिकोण का विकास किया जाये जिससे लोग अपने परिवार तथा समाज की बेहतरी के लिये उचित निर्णय ले सकें। भूतपूर्व प्रधानमन्त्री स्व. श्रीमती इन्दिरा गाँधी ने कहा था कि "विकास का अर्थ केवल आर्थिक व भौतिक विकास ही नहीं होता, अपितु इसमें लोगों का चिन्तन व उनके व्यक्तित्व का विकास करना भी है।" अतः शिक्षा समानुकूल, लोचदार एवं व्यवहारिक होनी चाहिये, जिससे सभी को सुलभ हो सके। जिससे विकास सम्बन्धी कार्य किये जा सकें और समुचित लाभ भी प्राप्त हो सके। इसके लिये निरक्षर व अशिक्षित लोगों को न केवल साक्षर बनाना अपितु उनके सर्वांगीण विकास हेतु शिक्षा प्रदान करना आवश्यक है। सरकार ने अनौपचारिक शिक्षा केन्द्र खोलकर वर्तमान समस्या पर नियंत्रण पाने के लिये प्रयास किये हैं। में प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं। वे शिक्षा विभाग में कार्य करने हेतु उत्सुक एवं कटिबद्ध है। यह लोग अधिकांशतयः ऐसे परिवार से आते हैं जिनमें पठन पाठन के प्रति विशेष रुचि होती है अथवा बहुत ऐसे भी लोग आते हैं जो कहीं न कहीं अध्यापन कार्य कर रहे होते हैं। स्वतन्त्रता प्राप्ति के पूर्व भारत देश की शिक्षा की प्रगति का अवलोकन करने पर स्पष्ट होता है कि जो भी विदेशी शासक सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत देश में आये उनका प्रमुख उद्देश्य व्यापार के नाम पर यहाँ से अधिक से अधिक धन को हड़पना था। अतः उन्होंने भारतीयों की शिक्षा के प्रगति हेतु विशेष कार्य नहीं किया। भारत में अशिक्षितों व निरक्षरों की भीड़ को नियंत्रित करने की दृष्टि से शिक्षाशास्त्री के रूप में महात्मा गाँधी ने बिहार के चम्पारण जिले में एक नारा दिया था "हर एक पढ़ाये एक" (Each one teach one) उनका उद्देश्य भारतीयों की शिक्षा में सुधार और अशिक्षितों की भरमार को कम करना था। यही नहीं तत्कालीन शिक्षाशास्त्रियों ने यहाँ तक लिखा कि "विश्व के मानचित्र में यदि निरक्षर इलाकों को काले रंग से दर्शाया जाय तो भारत एक अंधकारपूर्ण द्वीप सा दिखाई देता है।" गैर पढ़े-लिखे लोग अपने अधिकारों का प्रयोग करके मतदान की पर्ची पर आज भी सही निशान नहीं लगा पाते हैं। इस पर एक शिक्षाशास्त्री ने लिखा है कि "More than fifty percent illiterate of the world are present in India". विश्व के सम्पूर्ण निरक्षरों की संख्या से अधिक केवल भारत में विद्यमान है।
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