भूमिका
इसे नेता युग कहें या जनशोषण युग कहें या वर्गवादी युग कहें या लोकतंत्र की भूलभुलईयां युग कहें, या कुछ और कहें इस समय भारत का इतिहास ही सबसे अधिक विवाद का विषय बना हुआ है। जितने राजनीतिक दल हैं, उतनी ही उनके नेताओं की इतिहास सम्बन्धी अलग-अलग व्याख्यायें हैं। और कालेजों में, विश्वविद्यालयों में पढ़ाने वाले प्राध्यापकों में भी दलबन्दी है, इस कारण उनकी भी अलग मान्यतायें और व्याख्यायें हैं। अब देखो आज के इतिहास में अनेक राजनैतिक, बोट दिलाने में सहायक हो सकने बाले भगवान निकल कर आ रहे हैं। क्रिकेट खेल में से कई भगवान निकल कर सामने आ चुके है। यह अलग बात है, की क्रिकेट के उन भगवानों ने करोड़ों रुपये देश से छिपाकर विदेशों में जमा कर रखे हों। और आज के युग में क्रिकेट का फटाफट खेल ही सट्टे-व्यवसाय का सबसे बड़ा जरिया माना जाता है। खिलाड़ी, नेता, ठेकेदार, अपराधी सभी की अहम भूमिका इसमें बताई जाती हैं और अब विदेशी सरकारें भी भारतीय क्रिकेट के खेल में अपनी पूंजी लगाने लगी हैं। सिनेमा क्षेत्र में भी अनेकों भगवान प्रकट हो चुके हैं, उन भगवानों ने पैसा कैसे कमाया है और उनका पैसा देश के किसी काम में नहीं आ पाता है, यह विषय भगवान की अवधारणा को खड़े करने वाले जानते हुये भी अनजान बने हुये हैं। इलाज भी ये भगवान विदेश में करवाते हैं, बच्चों को भी ये भगवान विदेश में पढ़ाते हैं, और घरवालिया भी प्रायः ये भगवान विदेश से लाते हैं। पर भगवान का दर्जा उन्हें केवल इसी देश में मिला है, विदेशी सरकारें यह जानती है, कि इनके माध्यम से हमारी सरकार और हमारी जनता समृद्धी, सुख की ओर जाती हैं। इसलिये हमें (विदेशी सरकार) केवल उसी नियम-व्यवस्था पर चलना चाहिये, जिससे हमारे देश को लाभ पहुँचे। इस देश में प्रमुख सटोरियों, प्रमुख राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तर के बदमाशों की भी पूजा होती है और हमारे अनेक नेता उनकी तारीफ करते नहीं थकते। आज तो पेटर्न ही चल निकला है, कि इतिहास की उपेक्षा कर वर्गवाद, जातिवाद, फिरकायाद, उन्मादवाद फैलाकर बोटों का पुत्रीकरण करो। पुत्रीकरण की राजनीति वर्तमान में तुष्टीकरण की पुरानी नीति पर आज भारी पड़ती हुई दिख रही है। इन देश के नेताओं की इन नीतियों को अंग्रेजों की तरह "डिवाइड एन्ड रूल" की नीति भी कहा जा सकता है। ये भी कहा जा सकता है, कि नेता और अपराधी दोनों वर्तमान में सगे भाई नजर आते हैं। रामचरितमानस में सुन्दरकान्ड के एक प्रसंग में लिखा है-
सचिव वैद गुर तीन जौ प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीनि कर होई बेगहीं नास।।
"अर्थात मंत्री, वैद्य और गुरून्ये तीन यदि भय या अप्रसन्नता से ठकुरसुहाती करने लगें, तो राज्य, शरीर और धर्म इन तीन का शीघ्र नाश हो जाता है"। ये तीनों बीमारियां इस देश में आजकल अधिक देखने में आ रही हैं। इसके अपवाद लालटेन लेकर दूड़ने पर भी नहीं मिलेगे। प्राईवेट अस्पतालों के नाम पर गरीब रोगी, दुखी जीवन की पूरी जुटाई पूंजी गमां देते हैं। फिर भी चिकित्सक पेट में कभी कैंची व अन्य औजार छोड़ देते हैं, किडनी निकाल लेते हैं, अंग बेच देते हैं, आदि, ऐसे अनेकों उदाहरण प्रतिदिन सामने आते हैं। अभी मध्यप्रदेश की राजधानी के सरकारी अस्पताल में अनेक बच्चे जलकर काल के ग्रास बन गये हैं। हमारे देश में चिकित्सक को भी भगवान माना जाता है। गुरू अर्थात शिक्षक विद्यालय में नहीं, अब कोचिंग में पढ़ाकर अपनी पूरी उर्जा का दोहन करवा कर फिर विद्यालय की सरकारी जागीर में जाकर आराम करते हैं। इस देश में मंत्री को भी भगवान का दर्जा मिला हैं, लोग उनके बड़े चाव से पैर छूते हैं, वे उन्हें आशीर्वाद भी देते है, पर मीडिया से निगाह बचाकर, क्योंकि मीडिया के सामने वे तपस्वी जनसेवक नजर आना चाहते हैं। यह सब इतिहास के उलट काम हैं, अब ऐसे भगवान यदि यह कहें कि हमारा इतिहास तोड़ा-मरोड़ा गया है, गलत लिखा गया है, तो इन अवसरवादी असत्यवादी लोगों पर विश्वास कैसे किया जा सकता है।
लेखक परिचय
डॉ. रामस्वरूप ढेंगुला एम. ए., पी-एच. डी. इतिहास, बैचलर आफ लायब्रेरी सांइस, सेवानिवृत, ग्रन्थपाल । प्रकाशन - 1. बुन्देलखन्ड का राजनैतिक सांस्कृतिक अनुशीलन। 2. बुन्देलखन्ड के परमार। 3. धंघेरखन्ड का इतिहास और उसकी 1857 में भूमिका। 4. कल्याण कृत लक्ष्मीबाई रायसी का ऐतिहासिक विवेचन। 5. समझे लायब्रेरियनजी (कहानी संग्रह)। 6. हैलीकुट्ीजान (कहानी संग्रह)। 7. दतिया राज्य में 1857 का स्वतंत्रता संग्राम, (स्वराज संस्थान भोपाल, फैलोशिप अंतर्गत प्रकाशाधीन)। 8. बुन्देलखन्ड इतिहास के सांस्कृतिक और सामाजिक प्रसंग, । 9. मध्यप्रदेश का इतिहास भाग दो, में भागीदारी, हिन्दी ग्रन्थ अकादमी भोपाल। शोध-पत्र- देश के प्रतिष्ठित नटनागर शोध संस्थान सीतामऊ से प्रकाशित शोध साधना में लगातार प्रकाशन, भोपाल की चौमासा में प्रकाशन, बुन्देली बसन्त, और छत्रसाल दर्पण छतरपुर में प्रकाशन, प्रदेश के कई महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों की पत्रिकाओं में प्रकाशन, इतिहास संकलन योजना के अंतर्गत प्रकाशन, लगभग 100 शोध-पत्रों का वाचन व प्रकाशन। स्थानीय पत्रिकाओं, अखवारों में सामाजिक-सांस्कृकि सरोकारों के लेख आदि। वर्तमान में लगातार शोध कार्य और लेखन जारी।
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