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दसबोधिसत्तुप्पत्तिकथा- Dasabodhisattuppattikatha (The Birth Stories of the Ten Bodhisattvas)

$34
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Specifications
Publisher: Nava Nalanda Mahavihara, Bihar
Author Arun Kumar Yadav
Language: PALI AND HINDI
Pages: 164
Cover: HARDCOVER
9.5x6.5 inch
Weight 510 gm
Edition: 2023
ISBN: 9789383205530
HCC951
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Book Description
पुस्तक परिचय
ग्रंथ परिचयः 'दसबोधिसत्तुप्पत्तिकथा' ग्रंथ मुख्य रूप से भविष्य में बुद्धत्व को प्राप्त करने वाले दस बोधिसत्त्वों की कथाओं को प्रकाशित करता है। इस ग्रन्थ में दस बोधिसत्त्वों के नाम से दस कथायें उपलब्ध होती हैं। इस ग्रंथ के रचनाकार का नाम उपलब्ध नहीं होता है, विद्वानों का मत है कि यह ग्रन्थ 14वीं शताब्दी के आस-पास का है। इस ग्रंथ में प्रत्यक्ष रूप से 'भक्ति' शाखा का प्रभाव दिख पड़ता है जो संभवतः महायान और हिन्दू धर्म के प्रभाव के कारण हुआ होगा। भविष्य में होने वाले दस बुद्धों के कथानक का पालि साहित्य में एक प्रमुख स्रोत होने के कारण ही इस रचना का महत्व बढ़ जाता है। इस ग्रन्थ से दक्षिण भारत तथा दक्षिण-पूर्व एशिया के उस काल की धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, नैतिक और आर्थिक स्थिति पर प्रकाश पड़ता है जो उस समय पालि साहित्य में हो रहे भाषायी और विषयगत उतार-चढ़ाव को भी दर्शाता है, जो कि अध्ययन की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

लेखक परिचय
18 नालन्दा महाविहार में एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं। डॉ. अरुण की शिक्षा-दीक्षा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से पालि भाषा में हुई है। डॉ. कुमार ने भारत-चीन सरकार के द्वारा प्रदत्त की जाने वाली छात्रवृत्ति पर चीन में चीनी भाषा का अध्ययन भी किया है। संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार ने डॉ. कुमार को बौद्ध प्रदर्शनी हेतु विषय विशेषज्ञ के रूप में चीन, कंबोडिया, लाओस, इंडोनेशिया में नियुक्त किया था। डॉ. अरुण ने देश-विदेश के कई विश्वविद्यालयों में अतिथि व्याख्यान के साथ-साथ कई राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों में भाग लिया है, संप्रति डॉ. कुमार चीन के क्वाङ्ङ्घौउ ललित कला अकादमी में बौद्ध अध्ययन विषय के मानद अतिथि एसोसिएट प्रोफेसर के पद पर भी नियुक्त हैं।

आभार
परम कारुणिक भगवान् बुद्ध ने जगत् कल्याण हेतु भारत-भूमि में जन्म लेकर इस धरा को धन्य ही नहीं किया अपितु संसार के असंख्य मनुष्यों को भव सागर से मुक्ति दिलाने में एक कल्याणमित्र की भूमिका भी निभाई। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से देखें तो भगवान् बुद्ध का कार्यक्षेत्र मध्यमण्डल ही रहा किन्तु उनके कल्याणकारी वचनों ने सारी सीमाओं को तोड़ते हुए पृथ्वी के एक विशाल भूभाग पर अपना प्रभाव डाला जिसके कारण उनके महापरिनिर्वाण के उपरांत भारत के अंदर और बाहर एक विशाल बौद्ध साहित्य का सृजन हुआ। इनमें कुछ साहित्य के विषय दार्शनिक थे, वहीं कुछ गौतम बुद्ध के पूर्वजन्म तथा भविष्य के जन्म से संबद्धता रखने वाले हुए, इन्हीं साहित्यों में 'दसबोधिसत्तुष्पत्तिकथा' का नाम प्रमुख है जिसका देवनागरी सम्पादन और हिन्दी अनुवाद आपके समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है।

किसी भी ग्रंथ के सम्पादन और अनुवाद को पूर्ण करने में संपादक और अनुवादक की ही प्रत्यक्ष भूमिका दिखती है किन्तु अपने विशाल अनुभवों से इस ग्रंथ में रह गई न्यूनताओं को अपने सुझावों से दूर करने वालों की परोक्ष रूप से महती भूमिका होती है जिनके प्रति आभार प्रकट करना हमारा परम कर्तव्य ही नहीं अपितु नैतिक दायित्व भी है। इस क्रम में हम काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के गुरुजन प्रो. प्रद्युम्न दुवे, प्रो. हरिशंकर शुक्ल, प्रो. लालजी, प्रो. विमलेन्द्र कुमार, प्रो. सिद्धार्थ सिंह, प्रो. प्रीति दूबे तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. के. टी. एस. सराओ, प्रो. शुभ्रा बरुआ पावागढ़ी, प्रो. इन्द्रनारायण सिंह को प्रणाम निवेदित करते हैं, साथ ही नव नालंदा महाविहार के विभागीय सहयोगियों प्रो. राजेश रंज |

भूमिका
इस वसुधा के श्रेष्ठतम पुरुष सिद्धार्थ गौतम ने असंख्य जन्मों के सम्यक् प्रयनों एवं पारमिताओं के परिपाचन करने के उपरान्त उरुवेला (वर्तमान बोधगया) नामक स्थान पर बोधिवृक्ष के नीचे अलौकिक सम्यक् सम्बोधि ज्ञान की प्राप्ति की थी। भगवान् बुद्ध का प्रादुर्भाव इस जगत् के कल्याण हेतु ही हुआ था। सम्यक् सम्बुद्ध ने लगभग पैतालीस वर्षों तक अपने परम कल्याणकारी धर्मामृतरूपी वृष्टि से जम्बुद्वीप में मध्यदेश के जनमानस को सराबोर किया था। भगवान् बुद्ध के महापरिनिर्वाण के उपरान्त उनके अर्हत् शिष्यों ने सम्पूर्ण बुद्धवचनों की रक्षा के लिए मगध साम्राज्य के अंतर्गत राजगृह में प्रथम बौद्ध संगीतिः का ऐतिहासिक आयोजन किया था। बौद्ध धर्म की प्रायः सभी शाखाओं ने परंपरानुसार प्रथम बौद्ध संगीति के अवसर पर ही सम्पूर्ण बुद्धवचनों के संगायन को त्रिपिटक के स्वरूप में स्वीकार किया है। उस ऐतिहासिक संगीति के उपरान्त बुद्धवचनों की आवृत्ति का विवरण हमें क्रमशः वैशाली में आयोजित द्वितीय संगीतिः तथा पाटलिपुत्र की तृतीय संगीति के रूप में प्राप्त होता है।

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