किसी भी ग्रंथ के सम्पादन और अनुवाद को पूर्ण करने में संपादक और अनुवादक की ही प्रत्यक्ष भूमिका दिखती है किन्तु अपने विशाल अनुभवों से इस ग्रंथ में रह गई न्यूनताओं को अपने सुझावों से दूर करने वालों की परोक्ष रूप से महती भूमिका होती है जिनके प्रति आभार प्रकट करना हमारा परम कर्तव्य ही नहीं अपितु नैतिक दायित्व भी है। इस क्रम में हम काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के गुरुजन प्रो. प्रद्युम्न दुवे, प्रो. हरिशंकर शुक्ल, प्रो. लालजी, प्रो. विमलेन्द्र कुमार, प्रो. सिद्धार्थ सिंह, प्रो. प्रीति दूबे तथा दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. के. टी. एस. सराओ, प्रो. शुभ्रा बरुआ पावागढ़ी, प्रो. इन्द्रनारायण सिंह को प्रणाम निवेदित करते हैं, साथ ही नव नालंदा महाविहार के विभागीय सहयोगियों प्रो. राजेश रंज |
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