लेखक परिचय
श्रीमती शशिकला परिहार जोधपुर के घांची परिवार में जन्म। जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय (पूर्व में जोधपुर विश्वविद्यालय) से एम.ए. इतिहास की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् इसी विश्वविद्यालय से एम.फिल. की उपाधि प्राप्त की। इतिहास विभाग की छात्रवृत्ति प्राप्त होने पर 'बीसवीं सदी में मारवाड़ राज्य' विषय पर शोध-प्रबन्ध के लिये कार्य किया। लेकिन शीघ्र ही सन् 1995 में राजस्थान लोकसेवा आयोग द्वारा कॉलेज शिक्षा में इतिहास विषय में प्रवक्ता पद पर चयन होने पर राजकीय कॉलेज से शिक्षण का कार्य प्रारम्भकिया। लम्बे समय तक राजकीय बांगड़ स्नातकोत्तर महाविद्यालय, पाली में सह आचार्य (इतिहास) एवं विभागाध्यक्ष पद पर कार्यरत रही। राजस्थान इतिहास कांग्रेस और भारतीय इतिहास कांग्रेस की आजीवन सदस्य। अनेक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों एवं सम्मेलनों में शोध-पत्र का प्रस्तुतीकरण एवं प्रकाशन। वर्ष 2020 में 'बीसवीं सदी में मारवाड़ (1901-49 ईस्वी)' पुस्तक प्रकाशित हुई। समय-समय पर विभिन्न संस्थाओं द्वारा आयोजित कार्यशाला, वेबिनार, विडियो-कांफ्रेंस एवं विचार-गोष्ठियों में सहभागिता निभाई।
पुस्तक परिचय
प्राचीन युगीन भारत आर्थिक दृष्टिकोण से 'सोने की चिड़िया' और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से 'जगद्गुरु' कहलाता था। नालन्दा, तक्षशिला और विक्रमशिला ज्ञान और शिक्षा के पावन केन्द्र थे। भारत की रत्नगर्भा वीरप्रसूता धरती ने अनेक वीर और साहसी रणबांकुरे, समाज-सुधारक तथा धर्म-प्रवर्तक जाज्वल्यमान रत्न उत्पन्न किए, उनमें से एक डॉ. भीमराव अम्बेडकर प्रमुख समाज और धर्म-सुधारक थे। वे अद्भुत प्रतिभावान्, निष्ठावान्, अगाध ज्ञान के आगार, अध्यवसायी, प्रकाण्ड पण्डित, निर्मल स्वभाव, विवेकवान, देशप्रेमी, राष्ट्र-वादी, न्यायशील, धैर्यवान, धार्मिक स्वभावी, सज्जनता की प्रतिमूर्ति, दीन-हीन के प्रति प्रेम करने वाले, युग-प्रवर्तक महामानव थे। वे दलितों के मसीहा और अछूतों के उद्धारक थे। भारतीय समाज व्यवस्था में विद्यमान ब्राह्मणवाद, वर्णवाद और छुआछूत की व्यवस्था के विरुद्ध प्राचीनकाल में महावीर स्वामी और भगवान बुद्ध ने आवाज बुलन्द की। मध्यकाल में रामानन्द, रामानुज, कबीर, चैतन्य महाप्रभु, रविदास आदि ने और आधुनिक युग में ज्योतिबा फूले, राजाराम मोहनराय, स्वामी दयानन्द सरस्वती, स्वामी विवेकानन्द, रानाडे, भण्डारकर, सयाजी राव गायकवाड़ आदि ने अछूतोद्धार के लिए अनेक कार्य किए। डॉ. अम्बेडकर ने जातिवाद और अस्पृश्यता की कटु आलोचना की और आधुनिक संविधान के निर्माता के रूप में अस्पृश्यता निवारण हेतु अस्पृश्यता पर आधारित व्यवहार को दण्डनीय अपराध घोषित करवाया।
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