प्रस्तावना
21वीं शताब्दी में भी जहां चतुर्दिक ज्ञान-विज्ञान का साम्राज्य है, भारत के दूर-दराज आदिवासी क्षेत्रों में, अफ्रीका के दुर्गम वनों में निवास करने वाले विश्वासी जनों में तथा महानगरों के मिशनरी विद्यालयों के सरल-हृदय बालक-बालिकाओं में अत्यंत शांतिपूर्व साधनों व उपायों से उस ईसाई धर्म का प्रचार हो रहा है, जो मध्यकालीन यूरोप में अंधकार युग के लिए उत्तरदायी था। जिसने कला, स्थापत्य, ललित साहित्य के प्राचीन रोमन व यूनानी प्रतीकों को समूल नष्ट कर दिया। प्राचीन ग्रंथों को शैतानी ग्रंथ कह कर जला दिया। विज्ञान पर प्रतिबंध लगा दिया। गैलीलियो जैसे वैज्ञानिकों की हत्याएं भी करवाईं तथा धर्म विरुद्ध एक शब्द भी कहने वालों को जीवित जला देने जैसा भयंकर कुकृत्य सहस्त्रों बार किया। यह अत्यंत आवश्यक है कि हमारा निश्छल आदिवासी समाज तथा नगरों में निवास करने वाला दुर्बोध में डूबा भारतीय जनमानस ईसाई धर्म के नृशंसतम न्यायाधिकरण अथवा इन्विजीशन के विषय में जाने। गोवा इन्क्विजीशन का हिन्दी अनुवाद इसी दिशा में एक प्रयास है। फ्रांस वह प्रथम राष्ट्र था जिसने ईसाई धर्म की नृशंसताओं के विरुद्ध आवाज उठाई। इस राष्ट्र के लोगों ने भारत में ईसाइयों द्वारा किए जा रहे अमानवीय अत्याचारों पर भी लेख लिखे। गोवा के पवित्र न्यायाधिकरण को समाप्त करने में फ्रांसीसी विचारकों का महती योगदान है। वोल्तेयर (François-Marie Arouet with nom de plume Monseigneur de Voltaire) फ्रांस के 18वीं सदी के एक महान दार्शनिक थे। उन्होंने गोवा के पवित्र न्यायाधिकरण की नृशंसता को सटीक शब्दों में व्यक्त किया है "गोवा का पुर्तगाली प्रशासन अपने पवित्र न्यायाधिकरण के लिए घृणित रूप से कुख्यात है। इस तरह की नृशंसता पुर्तगाल के व्यापारिक हितों के विपरीत तो है ही, वरन मानवता की मूल भावना के भी सर्वथा विपरीत है। पुर्तगाली भिक्षुओं ने हमें यह विश्वास दिलाने के लिए बहकाया कि भारतीय जनता शैतान की पूजा कर रही है। जबकि हकीकत यह है कि उन ईसाई भिक्षुओं ने अपने जघन्य कृत्यों के माध्यम से उस शैतान की सेवा की।।
पुस्तक परिचय
ईसाई न्यायाधिकरण, गैर-ईसाइयों तथा नव-ईसाइयों के प्रति क्रूरता के लिए कुख्यात रहे हैं, परंतु इन सबमें गोवा के ईसाई न्यायाधिकरण ने अमानवीयता की सारी हदें पार कर दी थीं। दुर्भाग्यवश हिन्दू जाति में इतिहास लेखन की परम्परा नहीं है। इस कारण गोवा न्यायाधिकरण 1560 में स्थापित होने से लेकर 1812 में इसकी समाप्ति तक के विवरण के लिए हमें पुर्तगाली स्रोतों व अन्य यूरोपीय स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है। पहली बार गोवा के इस कुख्यात ईसाई न्यायाधिकरण के विषय में लिखने का प्रयास स्वर्गीय अनंत काकबा प्रियोलकर ने 1961 में किया था। उनके स्रोत मुख्यतः पुर्तगाल के अभिलेख तथा कुछ प्रबुद्ध पुर्तगाली लेखक थे जो अपनी जाति के लोगों के कार्य से वास्तव में दुखी थे। यह पुस्तक अनंत काकबा जी की उसी पुस्तक "The Goa Inquisition" का हिन्दी रूपांतर है। गोवा के ईसाई न्यायाधिकरण के विषय में फ्रेंच दार्शनिक वोल्टेयर के शब्द उल्लेखनीय हैं: "गोवा का पुर्तगाली प्रशासन अपने ईसाई न्यायाधिकरण के लिए घृणित रूप से कुख्यात है। इस तरह की नृशंसता पुर्तगाल के व्यापारिक हितों के विपरीत तो है ही, वरन मानवता की मूल भावना के भी सर्वथा विपरीत है। पुर्तगाली भिक्षुओं ने हमें यह विश्वास दिलाने के लिए बहकाया कि भारतीय जनता शैतान की पूजा कर रही है, जबकि हकीकत यह है कि उन ईसाई भिक्षुओं ने अपने जघन्य कृत्यों के माध्यम से उस शैतान की सेवा की।" ऐसा नहीं है कि यह सब कुछ एक अपवाद था तथा ईसाई धर्म का इससे कुछ भी लेनादेना नहीं था। वोल्टेयर ईसाई धर्म के विषय में लिखते हैं: "... . ..यह (ईसाई धर्म) अभी तक इस विश्व को संक्रमित करने वाले सभी धर्मों में सबसे अधिक विद्रूप, सबसे अधिक मूर्खतापूर्ण तथा सबसे अधिक रक्त-पिपासु है।" शत्रु बोध से वंचित भारतीयों के लिए यह अत्यंत उपयोगी पुस्तक है।
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