भूमिका
भारतेंदु हरिश्चंद्र युग निर्माता साहित्यकार कहे जाते हैं तो इसका अभिप्राय है कि उन्होंने भाषा और साहित्य के लिए अकेले जितना उद्योग किया उसके साथ ही अपने दौर के अन्य लेखकों को इसके लिए प्रोत्साहित भी किया। दुर्भाग्यवश भारतेंदु अल्पायु में ही चल बसे तब एकाएक यह स्थिति उत्पन्न हो गई थी कि खड़ी बोली हिंदी के लिए साहित्य के क्षेत्र में जैसा परिश्रम हुआ है कहीं वह व्यर्थ न चला जाए। ऐसी स्थिति में प्रताप नारायण मिश्र ने अपनी लेखनी और पत्रिका से जो कार्य किया उसके कारण उन्हें भारतेंदु का सच्चा उत्तराधिकारी कहना अनुचित न होगा। यह और बात है कि मिश्र को भी भारतेंदु की तरह लंबी आयु नहीं मिली थी और वे भी भारतेंदु के निधन के मात्र नौ वर्ष बाद ही दिवंगत हो गए। उनका लेखन तथा संपादन भारतेंदु के सामने प्रारंभ हो चुका था। वे भारतेंदु मंडल के प्रमुख लेखक माने जाते हैं। भारतेंदु मंडल का विस्तार काशी से दिल्ली अर्थात् हिंदी क्षेत्र के लगभग पूरे भू भाग तक था। भारतेंदु मंडल के सदस्य निम्न साहित्यकार माने जाते हैं- स्वयं भारतेंदु हरिश्चंद्र (काशी), केशवराम भट्ट (पटना), प्रताप नारायण मिश्र (कानपुर), गोस्वामी राधा चरण (वृंदावन), लाला श्रीनिवास दास (दिल्ली), लाला सीताराम (इलाहाबाद), दामोदर शास्त्री सप्रे (काशी), कार्तिक प्रसाद खत्री (काशी), ठाकुर जगमोहन सिंह (काशी), अंबिका दत्त व्यास (काशी), रामकृष्ण वर्मा (काशी), राधा कृष्ण दास (काशी)। बालकृष्ण भट्ट ने लिखा है, "प्रातः स्मरणीय बाबू हरिश्चंद्र को जो हिंदी का जन्मदाता कहें तो प्रताप नारायण मिश्र को निस्संदेह उस स्तनंधया दुधमुँहीं बालिका का पालन-पोषणकर्ता कहना ही पड़ेगा, क्योंकि हरिश्चंद्र के उपरांत उसे अनेक रोग-दोष से सर्वदा नष्ट हो जाने से बचा रखने वाले यही देख पड़े हैं।" कवि, गद्यकार और संपादक प्रतापनारायण मिश्र का जन्म 24 सितंबर 1856 को उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले के एक गाँव बैजनाथ (बैथर) में हुआ। वे बचपन में ही अपने पिता के साथ कानपुर आ गए थे जो जीवन पर्यंत उनका निवास बना रहा। उन्हें अच्छी शिक्षा के लिए कानपुर के एस. पी. जी. स्कूल में पढ़ाया गया और फिर वे क्राइस्ट वर्च स्कूल से भी पड़े लेकिन 1877 में बिना कोई परीक्षा दिए डी उन्होंने औपचारिक शिक्षा छोड़ दी। विद्यार्थी जीवन से ही वे भारतेंद्र की पत्रिका 'कविवचनस्था' के नियमित पाठक हो गए थे और फिर स्वयं भी लेखन का अभ्यास करने लगे। स्वाध्याय से ही उन्होंने संस्कृत, उर्दू, फारसी, बँगला और अंग्रेजी भाषाओं का ज्ञान भी लिया। अपने युग के महान लेखक भारतेंदु का प्रभाव उन पर पड़ना स्वाभाविक ही था और भारतेंदु सरीखी साहित्यिक प्रवृत्तियों के चलते उन्हें 'प्रतिभारतेंदु' और 'द्वितीयचंद्र' भी कहा जाने लगा। बालमुकुंद गुप्त ने लिखा है, "पंडित प्रताप नारायण मिश्र में बहुत बातें हरिश्चंद्र की सी थीं। कितनी ही बातों में कम थे, पर एकाध में बढ़कर भी थे।" उनकी पहली काव्य-कृति 'प्रेम पुष्पांजलि' 1883 में प्रकाशित हुई। 1883 में ही होली के दिन उन्होंने 'ब्राह्मण' नामक मासिक पत्र का संपादन प्रकाशन प्रारंभ किया जो भारतेंदु युग के प्रतिनिधि पत्रों में से एक माना जाता है। वे लेखन के साथ-साथ सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक कार्यों में भी गहरी रुचि लेते थे। भाषा और समाज की उन्नति के उद्देश्यों को ध्यान में रखकर उन्होंने कानपुर में 'रसिक समाज' की स्थापना की थी और कांग्रेस के कार्यक्रमों में भाग लेते थे। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने लिखा है, "भारतेंदु के समय से ही निबंधों की परंपरा हमारी भाषा में चल पड़ी थी जो उनके सहयोगी लेखकों में कुछ दिनों तक जारी रहीं। पर, जैसा कि पहले कहा जा चुका है, स्थायी विषयों पर निबंध लिखने की परंपरा बहुत जल्दी बंद हो गई। उसके साथ ही वर्णनात्मक निबंध-पद्धति पर सामयिक घटनाओं, देश और समाज जीवनचर्या, ऋतुचर्या आदि का चित्रण भी बहुत कम हो गया। इस द्वितीय उत्थान के भीतर उत्तरोत्तर उच्च कोटि के स्थायी गद्य साहित्य का निर्माण जैसा होना चाहिए था, न हुआ। अधिकांश लेखक ऐसे ही कामों में लगे जिनमें बुद्धि को श्रम कम पड़े। फल यह हुआ कि विश्वविद्यालयों में हिंदी की उँची शिक्षा का विधान हो जाने पर उच्च कोटि के गद्य की पुस्तकों की कमी का अनुभव चारों ओर हुआ। भारतेंदु के सहयोगी लेखक स्थायी विषयों के साथ-साथ समाज की जीवनचर्या, ऋतुचर्या, पर्व-त्योहार आदि पर भी साहित्यिक निबंध लिखते आ रहे थे। उनके लेखों में देश की परंपरागत भावनाओं और उमंगों का प्रतिबिंब रहा करता था। होली, विजयादशमी, दीपावली, रामलीला इत्यादि पर उनके लिखे प्रबंधों में जनता के जीवन का रंग पूरा-पूरा रहता था। इसके लिए वे वर्णनात्मक और भावात्मक दोनों विधानों का बड़ा सुंदर मेल करते थे। देश-प्रेम का प्रसार, समाज-सुधार, नैतिकता का पाठ, भाषा का प्रसार एवं विकास और जनसामान्य का मनोरंजन था।
लेखक परिचय
डॉ. पल्लव जन्म: राजस्थान के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिवार में 2 अक्टूबर को। शिक्षा: पीएच. डी, एम.ए. हिंदी। रुचि: गद्य आलोचना में विशेष रुचि । लेखन : 'कहानी का लोकतंत्र' और 'लेखकों का समार' शीर्षक से दो पुस्तकें प्रकाशिता साहित्य अकादेमी के लिए कवि नन्द चतुर्वेदी पर मोनोग्राफ लेखन । संपादन : नंद चतुर्वेदी रचनावली (चार खंड), असगर वजाहत तथा स्वयं प्रकाश के रचना संचयनों का संपादन। 'मैं और मेरी कहानियों' शीर्षक से हिंदी के दस प्रतिनिधि युवा कथाकारों के दस कहानी संग्रहों का चयन और संपादन। साहित्य-संस्कृति के विशिष्ट संचयन 'बनास जन' का 2008 से निरंतर संपादन-प्रकाशन । लेख : प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में आलेख, आलोचना और समीक्षा लेखों का लगभग ढाई दशक से निरंतर प्रकाशन । पुरस्कार एवं सम्मान : भारतीय भाषा परिषद्, कोलकाता का 'युवा साहित्य पुरस्कार', 'वनमाली सम्मान', 'आचार्य निरंजननाथ सम्मान', 'राजस्थान पत्रिका सृजन पुरस्कार', 'पाखी आलोचना सम्मान' । सम्प्रति : दिल्ली के हिंदू कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर ।
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