पुस्तक परिचय
ज्ञान परम्परा क्या है? विदेशियों ही नहीं, भारतीयों के लिए भी यह जानना बड़ा रोचक है। यह जिज्ञासा बनी रहनी चाहिए क्योंकि वृहदारण्यक उपनिषद् ज्ञान की श्रेणियों के विमर्श में पाठक को विचार एक अवसर देता है। हमें याद रखना चाहिए कि संसार में भारत की भूमि, गगन, सरोवर, नदियां, तीर्थ, खेत, घर, परिवार ... सब के सब ज्ञान के स्रोत है। संसार की समृद्ध सभ्यताओं और संस्कृतियों को इस बात की जानकारी थी और तभी यात्री और यात्रियों के समूह यहां परिक्रमा, पढ़ाई और पूजन के लिए आते थे। कैम्ब्रिज में मैक्समूलर ने जब भारत में प्रशासनिक दायित्वों के निर्वहन के लिए जाने वाले अधिकारियों को सम्बोधित किया तो बताया कि भारत उनको क्या क्या सिखा सकता है? भारतीय ज्ञान कभी निराश नहीं करेगा बल्कि जीवन को ऐसी दिशा देगा जो इसकी मिट्टी के लिए कर्तव्य बोध से भर दे।
मेरा मत है कि भारत ने इष्ट और पूर्त रूप में जिन कर्तव्यों को निर्धारित किया, ज्ञान की ऐसी शाखाओं को भी प्राणवान किया जिनमें जहां रोपण किया जाए, वहां पल्लवन का सामर्थ्य रहा। तब कई रूपों में ज्ञान की पगडंडियां विकसित हुई - लोकोपकारक ज्ञान, राजोपकारक ज्ञान, बालकोपकारक ज्ञान, स्त्रियोपकारक ज्ञान, साधकोपकारक ज्ञान, स्थापत्योचित ज्ञान, व्यापारोपकारक ज्ञान, कर्मात्रियोपकारक ज्ञान, आचरणोपयोगी ज्ञान, लेखकोपयोगी ज्ञान, चिकित्सकोपयोगी ज्ञान...। इस तरह के कई पथ हैं जिनके लिए एक नहीं, अनेकानेक ग्रंथों का प्रणयन और पुनः पुनः लेखन हुआ। ग्रंथों के लिखित रूप (पाण्डुलिपिया) से अधिक अलिखित, वाचिक और व्यावहारिक परम्परा में भी ज्ञान की धाराएं कम नहीं। कई विषय तो खोजों और अनुसंधानों के प्रेरक भी हैं। भारत और यहां के धर्म, संप्रदाय, पंच और उनके दर्शन का ज्ञानात्मक अवदान क्या कम है? अर्थ जैसे पुरुषार्थ पर कितने विचार और विचारोत्तेजक ग्रंथ। धर्म जैसे धारण योग्य पुरुषार्य पर कितने शास्त्र और स्मृतियां। काम जैसे पुरुषार्थ, जिसे वर्जित कह दिया गया हो लेकिन कितने उपयोगी ग्रंथ कश्मीर से लेकर दक्खन तक रचे गए और मोक्ष विषयक कितने शास्त्र रचे गए? हम उनकी सीमाएं और संख्या तक नहीं जानते। अब बताइए ज्ञान गुच्छ में कितनी मंजरियां हैं? यह निथरा हुआ सच है कि ज्ञान का मतलब अध्यात्म और अनुष्ठान से नहीं, बल्कि व्यवहार, प्रयोग और अनुभव से अर्जित वे सूत्र, वे सूचनाएं हैं जो सार्वकालिक और सार्वदेशिक हो सकती हैं। इसीलिए संसारभर का ध्यान उन सूचनाओं पर रहता है, उनके कब्जे, उनके पेटेंट पर रहता है और तब हम कहकर रह जाते हैं अरे! इसमें क्या है, ये तो हमारे अमुक शास्त्र में कहा है।... हमें हमारी जीवनोपयोगी ज्ञान विरासत पर गर्व होना चाहिए। हमारा ध्यान ज्ञान के ऐसे ही सूत्रों और सूचनाओं पर होना चाहिए। हम गणित के लीलावती, इच्छित ज्ञान के मानसोल्लास ही क्या, मेघशास्त्र, रत्नशास्त्र, लिपि, आयुधशास्त्र, धनुर्वेद, आयुर्वेद, ओरा ज्ञान, अंग विद्या, प्रश्न, गांधर्ववेद, आहारवेद, मल्ल क्रीड़ा, खदान और धातुशास्त्र, गुल्म वृक्षायुर्वेद, गणित, रेखागणित, शुल्व सूत्र, मषित, समय, सामुद्रिक, नौकाशास्त्र, काम, अर्थ, नीति, शिल्प, यंत्र, चित्र, पशु, पक्षी, आखेट, चौर्य... को कितना जानते हैं? नाम भी नहीं सुने होंगे। विदेशी इनको देखकर आगे बढ़ रहे हैं वे इसके लिए पांव पर खड़े हैं और हम? हमें गर्व होगा कि इनमें से कई ज्ञान ग्रंथ हाल के वर्षों में हमारे हाथ में आए हैं और तभी यह जरूरी हो गया कि हम अपनी अज्ञात, विस्मृत और निक्षेपित निधि जैसी ज्ञान विरासत के संरक्षण, प्रचार और प्रतिष्ठा के लिए अग्रसर हों...।
लेखक परिचय
दुर्गराज चित्तौड़गढ़ के पास रंगाई-छपाई के लिए मशहूर आकोला गाँव में 2 अक्टूबर, 1964 को जन्मे श्रीकृष्ण 'जुगनू' ने हालांकि नियमित अध्ययन को कम किया लेकिन स्वयंपाठी रूप में स्नातकोत्तर कर विद्यावाचस्पति की उपाधि ली। डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू' डॉ. जुगनू ने भारतीय लिपियों, संस्कृत, प्राकृत और पाली सहित क्षेत्रीय भाषाओं व आदिकालीन कवियों के साहित्य के संपादन का बड़ा काम किया है। इतिहास के क्षेत्र में भी उनका योगदान स्मरणीय है। उनकी रुचि न तो किसी एक विषय पर केन्द्रित रही न ही एक दिशागत रही बल्कि अनेक विषयों में और अनेक दिशाओं में काम किया। संस्कृत ज्ञान-विज्ञान विषयक दर्जनों पाण्डुलिपियों के सम्पादन और अनुवाद का कार्य उनके योगदान को देशव्यापी कर विदेश तक विस्तार देता है। भारतीय ज्ञान परम्परा के युग युगीन पक्षों, लोकोपकारक, वैज्ञानिक और मानवीय सह-अभ्युदय के प्रेरक विषयों पर अपूर्व कार्य किया है। उनकी पुस्तकों का अनेक भाषाओं में अनुवाद और अध्ययन-अध्यापन भी निरन्तर है। देशज भाषा में लिखी संत-वाणियों, लोकगीतों, लोकगाथाओं के शोधपूर्ण अध्ययन उनके लोक व श्लोक की अध्ययन-निष्ठा को पारिभाषित करता है। वास्तु, ज्योतिष, कृषि, उपवेद, संगीत, वनस्पति, पुराण, उपपुराण के अध्ययन और अध्यापन के लिए उनकी सीमाएँ देश के पार रहीं। राजस्थान, गुजरात और पंजाब के राज्यपालों से संस्कृत-शिक्षा और इतिहास के क्षेत्र में अवदान के लिए सम्मानित और राष्ट्रपति से श्रेष्ठ शिक्षक सम्मान प्राप्त ।
Hindu (हिंदू धर्म) (13806)
Tantra (तन्त्र) (1019)
Vedas (वेद) (734)
Ayurveda (आयुर्वेद) (2111)
Chaukhamba | चौखंबा (3227)
Jyotish (ज्योतिष) (1580)
Yoga (योग) (1179)
Ramayana (रामायण) (1320)
Gita Press (गीता प्रेस) (720)
Sahitya (साहित्य) (24937)
History (इतिहास) (9128)
Philosophy (दर्शन) (3649)
Santvani (सन्त वाणी) (2600)
Vedanta (वेदांत) (118)
Send as free online greeting card
Email a Friend
Visual Search
Manage Wishlist