जंग: चन्द्रकिशोर जायसवाल का यह नया कथा संग्रह उनके रचनात्मक वैविध्य, उनकी संवेदना एवं भाषा शैली के नए गवाक्ष खोलता है। जो लोग चन्द्रकिशोर जायसवाल को विचार सचेतन कथाकार के बजाय केवल किस्सागोई और संवेदन क्षमता के लिए याद करते हैं, उनके लिए संग्रह की शीर्षक कहानी 'जंग' चुनौती की तरह है, जिसमें आजादी के इतने वर्षों के बाद व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई का औचित्य बताया गया है। इस कहानी के नायक भूनो बाबू का यह कहना कि पिस्तौल की जंग छुड़ाऊँगा, वस्तुतः दोहरा अर्थ देता है। उनकी मुराद फकत पिस्तौल में लगी जंग छुड़ाना नहीं है, बल्कि संवेदनहीन और निरंकुश व्यवस्था के खिलाफ जंग लड़ना भी है। संग्रह की सबसे लम्बी कहानी 'टेढे गाछ की छाया' और 'ग्रहण' प्रेमचन्द की परंपरा की याद दिलाती है। जबकि 'ना सखी पैसा' और 'कोट' कथाकार की परिचित शैली की कहानियाँ हैं, जहाँ समकालीन जीवनबोध के प्रति निर्मम व्यंग्य देखते ही बनता है। इसी तरह 'एक वृत्त का अंत' जैसी ढर्रे से हटी कहानी साबित करती है कि चन्द्रकिशोर जायसवाल एक खास सीमा में बंधे हुए कथाकार नहीं हैं। हिन्दी कहानी के मुश्किल समय में चन्द्रकिशोर जायसवाल के पास अपनी भाषा, अपनी शैली और अपने मुहावरे हैं, तो यही समकालीन हिन्दी कहानी में उनका पृथक् और उल्लेखनीय स्थान बताने के लिए काफी है।
चन्द्रकिशोर जायसवाल जन्स : 1940, बिहारीगंज (मधेपुरा) शिक्षा : एम.ए. (अर्थशास्त्र) कृतियाँ उपन्यास : गवाह गैरहाजिर, जीबछ का बेटा बुद्ध शीर्षक। कहानी-संग्रह: मैं नहिं माखन खायो, मर गया दीपनाथ, हिंगवा घाट में पानी रे!, नाटक : सिंहासन, श्रृंगार । फिल्म : राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम द्वारा निर्मित फिल्म रूई का बोझ (प्रथम उपन्यास 'गवाह गैरहाजिर' पर आधारित)।
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