प्राक्कथन
हर व्यक्ति के जीवन में कुछ इच्छाएँ, आकांक्षाएँ होती हैं और वह उनकी पूर्ति के लिए सतत् प्रयत्नशील रहता है। अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति हेतु कई सपने संजोया करता है। मैं और मेरा जीवन भी इसका अपवाद नहीं हो सकता। मरुस्थल के पश्चिमी भाग में जन्म लेकर मैंने भी संघर्ष करना सीखा और अच्छे जीवन के सपने संजोने सीखा। यह सही है कि अपने अध्ययन के प्रारम्भिक वर्षों में मैं नहीं जानता था कि मुझे जीवनयापन हेतु कौनसा व्यवसाय चुनना है, परन्तु जब से कुछ समझ आई एवं उच्च अध्ययन करने में लीन हुआ, तभी से एक ही प्रबल इच्छा मन में घर कर गई कि एम.ए., पी-एच.डी. करके अध्यापन को अपने व्यवसाय के रूप में चुनूंगा। परिस्थितियों से मुझे अत्यधिक संघर्ष करना पड़ा पर उन सारी विपत्तियों का दुःख आज इस क्षण सुखद अनुभूति के रूप में प्रतीत हो रहा है, जब मैं अपना शोध-प्रबन्ध मूल्यांकन हेतु प्रस्तुत कर रहा हूँ। मेघवंशी समाज में समय-समय पर होने वाले अनुष्ठानों में रात-रात भर जाग कर भाग लेता रहा हूँ। मैं स्वयं मेघवंशी समाज से सम्बन्ध रखता हूँ। वहीं इस समाज की वास्तविक स्थिति से अच्छी तरह से अवगत हूँ। मेघवंशी समाज में समय-समय पर होने वाले जन्म संस्कार विषयक अनुष्ठान, विवाह संस्कार विषयक अनुष्ठान, व्रतोत्सवों सम्बन्धी अनुष्ठान एवं रात्रि जागरण पर गाये जाने वाले लोकगीत एवं लोक भजनों की जानकारी प्राप्त करने का मैंने भरसक प्रयास किया तथा इनमें व्यक्त संस्कृति को उजागर करने का निश्चय किया। परिवार जनों ने मेरे मन में दृढ़ विश्वास उत्पन्न किया। अपने जीवन के प्रारम्भिक समय में कुछ परेशानियों का मुझे सामना करना पड़ा। मेरा बचपन बीमारी में व्यतीत हुआ, वहीं प्रारम्भिक शिक्षा में भी कई बाधाएँ आई। मेरे पिताजी दूर-संचार विभाग में कार्यरत होने के कारण उन्हें यायावर जिन्दगी जीनी पड़ी। पिताजी के सान्निध्य में रहते हुए उच्च शिक्षा ग्रहण की। पिताजी ने मेरा हौसला बुलन्द करते हुए कहा-"बेटा अगर अच्छे पढ़ लिख गये तो एक दिन बुलन्दियों को अवश्य प्राप्त करोगे।" जीवन में हौसला बढ़ाने वाले पिताजी का साया भी नसीब में ज्यादा नहीं लिखा हुआ था। इस कारण उनका आकस्मिक दुर्घटना में स्वर्गवास हो गया। ऐसे में पारिवारिक परिस्थितियाँ आर्थिक रूप से विपन्न हो गई, लेकिन जो सम्बल एवं प्रेरणा उन्होंने प्रदान की उसे मैंने अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। जिस वर्ष उनका स्वर्गवास हुआ उस वर्ष मैं मानसिक परेशानियों का शिकार हो गया। उन दिनों अनिंद्रा के रोग से ग्रसित रहने लगा, फिर भी दृढ़ विश्वास कायम रखा। मैंने एम.ए. अन्तिम वर्ष का अध्ययन करते हुए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा आयोजित यू.जी.सी नेट परीक्षा में आवेदन किया। मैंने पूर्ण निष्ठा के साथ परीक्षा दी। इसी सत्र में राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित स्लैट (SLET) परीक्षा में भी आवेदन किया। सत्र समाप्ति के अवसर पर एम.ए. उत्तरार्द्ध हिन्दी की परीक्षा दी। यह सत्र मेरे लिए विशेष कर शुभ भी रहा क्योंकि वर्ष 1996-1997 में एम.ए., नेट व स्लैट तीनों परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं। जब मेरे परिश्रम का परिणाम सामने आ गया, तब मैंने अपने गुरुजनों को सूचना दी। उन्होंने मुझे बधाई दी, वहीं आगे अध्ययन जारी रखने को भी कहा। मैंने एक दुःखद वातावरण से निकलकर राहत की साँस ली। मेरे गुरुजनों से परामर्श कर मैंने शोध कार्य प्रारम्भ करने के लिए पंजीयन करवाया। पंजीयन से लेकर अद्यावधि डॉ. चेतनप्रकाशजी पाटनी, डॉ. नन्दलालजी कल्ला, डॉ. देवेन्द्रकुमार सिंह 'गौतम', डॉ. किशोरीलाल रेगर, डॉ. श्रवणकुमार मीणा, डॉ. कृष्णा मोहनोत एवं विभागाध्यक्ष डॉ. सूरज पालीवाल ने हमेशा मेरा उत्साह वर्द्धन किया है। अतः मैं इन सबके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ। डॉ. सोहनदानजी चारण का विशेष रूप से आभारी हूँ। उनका किन शब्दों में आभार व्यक्त करूँ, मेरे पास ऐसे शब्द नहीं है जिनसे उनका आभार व्यक्त कर सकूं। मैं उनका हृदय से सदा ऋणी रहूँगा। आपने समय-समय पर मेरा मार्ग-निर्देशन किया व इनके सक्रिय सहयोग से ही यह शोध कार्य पूर्ण हो सका। ऐसे में उन्हें कैसे भूल सकता हूँ? जिन्होंने मुझे इस संसार की हर कठिनाई में मेरा हौसला बुलंद किया। मैं अपने पूज्य पिता स्वर्गीय श्री जोगारामजी को बार-बार नमन करता हूँ, जिन्होंने इस स्थान पर पहुँचने के लिए हर दृष्टि से सक्रिय सहयोग दिया था। अपनी माताजी श्रीमती कबुदेवी ने मेरा सदा उत्साह वर्द्धन किया। उनके वात्सल्यपूर्ण व्यवहार के कारण मैं सदा प्रगति पथ पर आगे बढ़ सका हूँ, क्योंकि उन्होंने मुझे कभी आर्थिक तंगी नहीं प्रतीत होने दी। मेरे भाइयों ने भी समय-समय पर मेरा उत्साह बढ़ाया एवं उन्होंने कर्त्तव्य-पथ पर बढ़ने का सन्देश दिया। मेरे शोध-प्रबन्ध की सामग्री संकलन में बहिन अर्चना जयपाल ने विशेष सहयोग प्रदान किया। ऐसे अनेक स्थलों पर जाकर लोकगीतों का संकलन करवाया, जहाँ पर मेरा जाना असम्भव था। ग्रामीण व्यवस्था में पर्दा प्रथा के कारण उसका सहयोग अवश्यम्भावी था। जिसको मैं कभी नहीं भूल सकता। जीजाजी बिरमारामजी ने लोक देवी-देवता विषयक लोकगीतों को संकलित करवाने में पूर्ण सहयोग किया अतः उनका भी आभारी हूँ। श्रीमती सजनी पत्नी नरसिंगाराम का आभार व्यक्त किये बिना नहीं रह सकता, क्योंकि व्रतोत्सवों सम्बन्धी लोकगीत उन्होंने ही गाकर लिखवाए। मैं सभी के प्रति भी आभार व्यक्त करता हूँ जिन्होंने मेरे शोध-प्रबन्ध में प्रत्यक्षतः या परोक्षतः सहयोग किया और मैं शोध-प्रबंध को पुस्तक का रूप दे सका।
लेखक परिचय
डॉ. गिरधारीलाल जयपाल जन्म : 12 अगस्त, 1974 ई. मातवाली नाडी (शिवपुरी), लोहावट, जिला-जोधपुर शिक्षा : • एम.ए., पीएच.डी. (जयनारायण विश्वविद्यालय, जोधपुर लोक साहित्य, काव्य, शोध एवं आलोचना साहित्य में गहरी रुचि। प्रकाशन : देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में विविध पक्षों पर शोध आलोख प्रकाशित। राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय संस्कृत-पत्रिकाओं में विविध शोध-आलेख प्रकाशित । प्रकाश्य : माँ ! तेरे बिना जग सूना (काव्य-संग्रह) भक्तिकाल में लोकधर्म और अन्य निबन्ध (निबन्ध-संग्रह) सम्प्रति : विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग, श्री राजेन्द्र सूरि कुन्दन जैन राजकीय महिला महाविद्यालय, जालोर
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