मार्च सन् १९५१ ई. में मैंने 'भारतीय विद्या भवन' की "बुक यूनिवर्सिटी" का आयोजन किया था। इस संस्था का ध्येय यह है कि एक-सी सज-धज के साथ, सस्ते मूल्य में ऐसी पुस्तकों का प्रकाशन किया जाय, जिनमें विश्व का उच्च साहित्य आ जाय-खास तौर पर वह साहित्य, जो भारतीय है और जिसमें उन मौलिक तथ्यों का समावेश है जिनका प्रतिनिधित्व भारतीय संस्कृति करती है।
इस दिशा में पहले ही यह तय किया गया है कि "जनरल-एडीटरों" द्वारा चुनी गई १०० पुस्तकें अंग्रेजी में प्रकाशित की जाएँ, और इनमें से ५० पुस्तकों का प्रकाशन-कार्य तुरन्त शुरू कर दिया जाय। ये पुस्तकें लगभग २०० से लेकर २५० पृष्ठों तक की होंगी और इनका मूल्य प्रति पुस्तक २-५० होगा ।
विचार यह भी है कि, इन पुस्तकों को तथा दूसरी किताबों को आठ भिन्न-भिन्न भारतीय भाषाओं में जैसे कि (१) हिन्दी, (२) बंगला, (३) गुजराती, (४) मराठी, (५) तमिल, (६) तेलुगु, (७) कन्नड़ और (८) मलयालम् में प्रकाशित किया जाय । साहित्य के इस समान्यतया व्यापक स्रोत से, पाठक विश्व की और भारतीय साहित्य की विचारधाराओं को हृदयंगम करने में समर्थ होंगे। इस वाङ्मय-वारिधि में भाषारूपिणी महोमियों की विभिन्नता होने पर भी, प्रेरणा और भावना-रूपी अगाध जल समानरूप से भरा होगा ।
इस योजना के अन्तर्गत ९०० ग्रन्थों का मुद्रण-प्रकाशन अपेक्षित है जिसके लिए एक अखिल भारतीय संगठन तथा विशिष्ट साधनों की आवश्यकता है। इस योजना को सुसंगठित और कार्यान्वित करने में 'भवन' विशेष प्रयत्नशील है।
वर्तमान युग की विशेषताओं को सर्वथा दृष्टि में रखते हुए, यह 'भवन' अपने ध्येय के अनुरूप, भारतीय संस्कृति के समन्वय का समर्थक है और उसकी उन मुख्य मौलिक विशेषताओं के पुनरुज्जीवन का भी, जैसे कि:-
(१) मनुष्य को स्वातन्त्र्य की ओर ले जाने वाली स्थितियों के समन्वय के साथ-साथ, मानव जाति की प्रतिष्ठा, जिससे कि वह अपने ही स्वभाव और सामर्थ्य के अनुसार विकासशील बने ।
(२) नैतिक-व्यवस्था के ढाँचे के भीतर ही, मनुष्य के कार्य-कलाप और सामाजिक संबंधों में अनुरूपता
(३) जीवन-संबंधी सर्जनात्मक कला की प्रेरणा-जिसके द्वारा मानवोचित वृत्तियाँ प्रगति करते-करते उत्कृष्टताओं में परिर्वार्तत होती हैं, ताकि मनुष्य, ईश्वर का निमित्त-मात्र बन जाय और 'ईश्वर का विश्व में, एवं विश्व का ईश्वर में, साक्षात्कार करे ।
भारत का प्राचीन एवं नवीन साहित्य, उसकी सभी भाषाओं के माध्यम से, वाङ्मय के ऐसे विशाल भंडार में केन्द्रीयकृत किया जायगा, जो सबके लिए सुलभ हो। इन्हीं सिद्धान्तों का प्रतिपादन करनेवाले अन्य भाषाओं के ग्रंथ भी इस भंडार में शामिल कर लिये जायेंगे । मैंने यह अनुभव किया है कि सांसारिकता अपने अनावृत रूप में हमें बहुत अधिक घेरे हुए हैं। ऐसी परिस्थिति में पुस्तकों द्वारा प्राप्त सौन्दर्य और जाग्रत की गई अभिलाषा, हमें जितना अधिक ऊपर उठायेगी, अनुप्रेरित और समुन्नत करेगी, उतना अधिक और कोई पदार्थ नहीं कर सकता ।
हिन्दी में "भवन ग्रंथपीठ" का यह चतुर्थ ग्रंथ है। मैं आशा करता हूँ कि आप इसका स्वागत करेंगे, जिससे हमें अन्य ग्रंथ भी प्रकाशित करने का उत्साह मिले ।
मैं उन सभी व्यक्तियों को धन्यवाद सर्पित करता हूं जिन्होंने 'भवन' के इस विभाग के कार्य को सफल बनाने में सहायता प्रदान की है और उसके निमित्त कार्य किया है।
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