प्राक्कथन
भारतीय संस्कृति के उद्गम और विकास में आधुनिक मध्य प्रदेश क्षेत्र का बहुत बड़ा योगदान हैं प्राक् ऐतिहासिक युग से लेकर अर्वाचीन समय तक यहां के विभिन्न भागों में धर्म, भाषा-साहित्य, ललित कलाओं तथा लोक जीवन की बहुमुखी प्रगति हुई। इस क्षेत्र के विविध धर्मावलंबियों में सहिष्णुता की भावना को बढ़ाकर भारतीय भावनात्मक एकता को दृढता प्रदान की। मध्य प्रदेश में पर्वतों, वनों तथा नदी, सरोवरों का वाहुल्य है। प्राकृतिक सौंदर्य के साथ यहां खनिजों का प्रचुर भण्डार हैं इस भूभाग के भौगोलिक रूप ने यहां पुष्पित फलित होने वाली संस्कृतियों को संरक्षण प्रदान किया भारत के किसी अन्य क्षेत्र में संस्कृति के आविर्भाव काल से लेकर उत्तर मध्य काल के अंत तक का इतिहास उस रूप में सुरक्षित नहीं है जैसा कि मध्य प्रदेश में है। प्रारंभिक युगों में सभ्यता का उदय नदी घाटियों में हुआ। इस क्षेत्र में नर्मदा, ताप्ती, चंबल, बेतवा, महानदी तथा सोननदी की उपत्यकाओं में आदि मानव तथा उसके बाद परवर्ती जन निवास करते थें उनकी सभ्यता के चिन्ह चित्रित शिलागृहों तथा लोगों के द्वारा प्रयुक्त उपकरणों के रूप में आज भी सुरक्षित है। प्राचीन ग्रंथो - रामायण, महाभारत, पुराणादि में उन जनों के आवास, आमोद-प्रमोद, वेशभूषा आदि के उल्लेख मिलते है। भारत की नदियों में नर्मदा का विशेष स्थान है। देश की मुख्य सरिताओं में उसकी गणना हैं प्राचीन भारत में तथा श्याम, जावा, सुमात्रा, बाली आदि में इस देश की मुख्य नदियों की स्तुति करते समय नर्मदा का स्मरण विशेष रूप से किया जाता था। मध्य प्रदेश का वर्तमान मंडला नगर नर्मदा द्वारा अत्यंत आकर्षक रूप से आवेष्टित है। इससे इस नगर को विशेष गौरव प्राप्त हुआ। प्राचीन पुरालेखों में मंडला के प्राचीन रूप का वर्णन उपलब्ध है। मंडला तथा उसके समीववर्ती भू-भाग से प्राचीन हस्तलिखित साहित्य, शिलालेख, ताम्रपत्र, सिक्कें आदि मिले हैं। उनसे ऐतिहासिक काल के इतिहास तथा संस्कृति पर प्रभूत प्रकाश पड़ा है। यहां के विभिन्न राजवंशो के शासको ने प्राचीन भारतीय राजनय के उदात्त सिद्धांतों को अपनाया कलचुरि वंश तथा गोंड़ वंश ने इस ओर विशेष ध्यान दिया इन दोनों राजवेशों ने भारतीय राजधर्म का पालन करते हुए मंडला क्षेत्र के गौरव को बढ़ाया जनपद की स्वतंत्रता, आर्थिक समृद्धि, सभी वर्गों को न्याय तथा ज्ञान-विज्ञान की वृद्धि ये चार मुख्य सिद्धांत थे जिनका इन दोनों राजवंशो ने पालन किया। इसके फलस्वरूप मंडला जनपद की श्रीवृद्धि हुई और मधुर संबंध आस-पास के क्षेत्रों के साथ स्थापित हुए, जो बहुत समय तक कायम रहे। प्रस्तुत ग्रंथ के लेखक डॉ. नरेश ज्योतिषी ने बड़े परिश्रम से मंडला के इतिवृत्त कालक्रमिक रूप में प्रदर्शित किया है। उन्होंने साहित्यिक तथा पुरातात्विक प्रमाणों के आधार पर तथ्यों का निरूपण किया है। इस पुस्तक में प्राक् तथा आद्य इतिहास के पश्चात् ऐतिहासिक काल का विवेचन किया गया है। जिले का पुरातात्विक सर्वेक्षण करने के फलस्वरूप लेखक को नयी सामग्री भी मिली है जिसका युक्तिसंगत ढंग से समावेश किया गया है। मंडला के प्रमाणित इतिहास की जानकारी के लिए यह ग्रंथ बहुत उपयोगी सिद्ध होगा। इस रचना के लिए डॉ. ज्योतिषी साधुवाद के अधिकारी हैं.
लेखक परिचय
डॉ. नरेश ज्योतिषी एम.ए., पी-एच.डी., विधावाचस्पति, गीतालंकार, मानसरल जन्मः 18 अक्टूबर 1943 ग्राम दिवारा-मण्डला (म.प्र.) सैकड़ों लेख, कवितायें, शोधपत्र प्रकाशित, आकाशवाणी से 21 वार्ताओं का प्रसारण मध्यप्रदेश इतिहास परिषद के जरनल में अनेक शोधपत्र प्रकाशित रंग (मुंबई) नटराज (खंडवा) नेहरू काव्य संग्रह (दिल्ली) वन्दना गीत (दिल्ली) नयानारा (भोपाल) राष्ट्रभारती, सम्मेलन पत्रिका (प्रयाग) रौद्ररूप सैनिक मस्ताने, रस गागर छलके, अंग अंग में अनंग, जय जवान जय किसान, युगधर्म, नवभारत, दैनिक भास्कर, नवीन दुनिया, साहित्य सरोवर, (जबलपुर) मध्यप्रदेश हूँ इज हूँ में रचनायें संग्रहीत एवं प्रकाशित प्रकाशितः 1. चिनगारी (काव्य संग्रह) 1965, 2. मंडला जिले का साहित्यिक विकास (शोधग्रंथ) 1973, 3. प्राचीन नगर माहिष्मती मंडला (शोधग्रंथ) 1981, 4. माहिष्मती के साहित्येतिहासिक संदर्भ (शोधपुस्तिका) 1984, 5. जमदग्नि आश्रम (शोध पुस्तिका) 1984, 6. माहिष्मती नगरी का अमरशहीद-उदयचंद 1996, 7. एक स्वाधीनता संग्राम सेनानी पं. सूरजप्रसाद बड़गैयां 1999, 8. मण्डला एवं डिण्डौरी जिला का पुरातत्व (शोध ग्रंथ) 2006, 9. रामगढ़ राज्य अभ्युदय और विकास (शोधग्रंथ) 2007, 10. माहिष्मती का पुरा वैभव- (शोधग्रंथ) 2016 11. राम काव्य के परिप्रेक्ष्य में राजेन्द्र-विलास एक समालोचनात्मक अध्ययन संकलन संपादन: प्रियदर्शिनी, शिरीष, परिचय, मेकलसुता, दीपशिखा, अभिव्यत्ति पत्रिका डिण्डौरी जिला- हमारी धरोहर, हमारी विरासत, शिलालेख। अभिलेख, संदर्शिका, दादाधनीराम, माहिष्मती एवं ब्राम्हण सभा स्मारिका, मंडला जिले के साहित्य, पुरातत्व, इतिहास, लोकसाहित्य और संस्कृति के मूर्धण्य प्रस्तोत.
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