Easy Returns
Easy Returns
Return within 7 days of
order delivery.See T&Cs
1M+ Customers
1M+ Customers
Serving more than a
million customers worldwide.
25+ Years in Business
25+ Years in Business
A trustworthy name in Indian
art, fashion and literature.

नागसेनचरितं- Nagasenacaritam

$28
Includes any tariffs and taxes
Express Shipping
Express Shipping
Express Shipping: Guaranteed Dispatch in 24 hours
Specifications
Publisher: Nava Nalanda Mahavihara, Bihar
Author Edited By Ramankshtra Prasad
Language: Pali Text with Hindi Translation
Pages: 88
Cover: HARDCOVER
8.5x6 inch
Weight 260 gm
Edition: 2022
ISBN: 9789383205059
HCC953
Delivery and Return Policies
Ships in 1-3 days
Returns and Exchanges accepted within 7 days
Free Delivery
Easy Returns
Easy Returns
Return within 7 days of
order delivery.See T&Cs
1M+ Customers
1M+ Customers
Serving more than a
million customers worldwide.
25+ Years in Business
25+ Years in Business
A trustworthy name in Indian
art, fashion and literature.
Book Description
पुस्तक परिचय
भिक्षु नागसेन पालि साहित्य के आकाश में एक देदीप्यमान नक्षत्र की भाँति लोकविश्रुत एवं सुविदित नाम है। बौद्ध दर्शन के अत्यंत गंभीर एवं दुर्बोध सिद्धांतों की परख जितनी इन्हें थी, सम्भवतः अन्यों को नहीं। यही कारण है कि ग्रीक सम्राट और दर्शन के मर्मज्ञ वितण्डावादी मिलिंद के प्रश्नों के समाधान में हमें इनकी अप्रतिम शास्त्रार्थ-प्रतिभा का दर्शन होता है। प्रस्तुत ग्रंथ भिक्षु नागसेन के प्रति एक कृतज्ञताज्ञापन है, जिनका पालि साहित्य एवं बौद्ध दर्शन के अध्येताओं पर बहुत बड़ा उपकार है। मिलिंद के जटिल से जटिल प्रश्नों का उत्तर इनके द्वारा उपमाओं एवं दृष्टान्तों से सज्जित भाषा में दिया गया है। इस ग्रंथ के रचनाकार ही इसके भाषानुवादक भी है। इसके पीछे इनके दो उद्देश्य हैं। 1- हिंदीभाषियों के लिए विषय को सरलतया समझ लेना तथा 2- ग्रंथ के कलेवर का विस्तार। कुल 511 पद्यों तथा ग्यारह सर्गों में निबद्ध यह रचना इक्कीसवीं सदी में लिखे जाने वाले पालि साहित्य में अपना महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त करेगी, ऐसी आशा है।

लेखक परिचय
प्रस्तुत ग्रंथ के प्रणेता एवं भाषान्तरकार डॉ रामनक्षत्र प्रसाद 'धम्मजीवी' पालि भाषा एवं साहित्य के सजग अध्येता के साथ-साथ नव नालन्दा महाविहार नालन्दा, बिहार के वरिष्ठ आचार्य एवं शैक्षिक अधिष्ठाता हैं। इन्होंने प्रारम्भिक शिक्षाग्रामीण संस्कृत पाठशाला से तथा उच्च शिक्षा सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी, गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर तथा अवध विश्वविद्यालय, फैजाबाद से पूरी की है। पालि भाषा एवं साहित्य के अध्ययन-अध्यापन के साथ पालि साहित्य की काव्य-विधा के क्षेत्र में इन्हें विशेषज्ञता प्राप्त है। विगत चालीस वर्षों से अनवरत अध्यापन एवं शोधनिर्देशन का कार्य कर रहे प्रो० रामनक्षत्र प्रसाद की साहित्यिक कृतियों में समन्तकूटवण्णना, जिनचरितं. वुत्तमालासन्दे ससतकं, पालिसल्लापसहस्सकं, धम्मपदपद्यावली, जिनवंसदीपं, गंधवंसो आदि ग्रंथ सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त इनके हिस्से में 32 रिसर्च पेपर तथा राष्ट्रिय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठियों में इनकी भागीदारी है। इनके द्वारा सिंहली से लिप्यंतरित तथा अनूदित ग्रंथ समन्तकूटवण्णना उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी से पुरस्कृत है।

प्रकाशकीय
सर्वविदित है कि पालि वाङ्मय की विविध विधाओं के अध्ययन की दिशा में अभी तक बहुत कम प्रयास हुए हैं। मूल पिटक साहित्य एवं अनुपिटक साहित्य को छोड़ दें, जिनमें न्यूनाधिक कार्य हुए हैं तथा हो रहे हैं, वो भी पिटकेतर साहित्य के क्षेत्र में इस तरह के प्रयास अभी प्रारम्भिक अवस्था में हैं। जहाँ तक पालि काव्यों की बात है, इस ओर अध्येताओं का ध्यान बहुत बाद में गया है और इसकी गति भी बहुत मन्द है। यह अहेतुक नहीं है। इसका कारण भी है। वाराणसी के पास सारनाथ में अपने प्रथम धर्मचक्रप्रवर्तन के उपरान्त बुद्ध ने भिक्षुओं को धर्मप्रचारार्थ आदिष्ट किया था और उन्हें यह ज्ञान कराया गया था कि अपनी वाक्नातुर्य या चमत्कारिक उक्ति से लोगों को अपनी ओर आकर्षित करना अथवा अपने प्रभाव में लेना विहित नहीं है। कविता अथवा विभिन्न प्रकार के पद्यबद्ध कथनों के माध्यम से यश एवं लाभ कमाना विनयविरुद्ध है। इसे बुद्ध ने अनागत भय कहा था। यही कारण है कि बुद्ध के उपदेशों में भी मनोरम कोमलकान्त पदावली का अभाव-सा दिखायी देता है। पालि त्रिपिटक साहित्य के संकलन में गाथाओं के आंशिक उपयोग अवश्य हुए हैं, किन्तु यहाँ उक्तिनैचित्र्य अथवा लाक्षणिक या आलंकारिक शब्दों के प्रयोग नहीं दिखायी देते हैं। यदि कुत्रचित् ऐसा दिखाई देता भी है तो वह अनायास बन पड़ा है। ऐसे पद्यबन्धों का उद्देश्य मात्र इतना है कि उसका कथ्य विषय अध्येताओं के लिए सरलतया ग्राह्य हो और चिरकाल तक मानव के मस्तिष्क पर अंकित रह सके।

Frequently Asked Questions
  • Q. What locations do you deliver to ?
    A. Exotic India delivers orders to all countries having diplomatic relations with India.
  • Q. Do you offer free shipping ?
    A. Exotic India offers free shipping on all orders of value of $30 USD or more.
  • Q. Can I return the book?
    A. All returns must be postmarked within seven (7) days of the delivery date. All returned items must be in new and unused condition, with all original tags and labels attached. To know more please view our return policy
  • Q. Do you offer express shipping ?
    A. Yes, we do have a chargeable express shipping facility available. You can select express shipping while checking out on the website.
  • Q. I accidentally entered wrong delivery address, can I change the address ?
    A. Delivery addresses can only be changed only incase the order has not been shipped yet. Incase of an address change, you can reach us at help@exoticindia.com
  • Q. How do I track my order ?
    A. You can track your orders simply entering your order number through here or through your past orders if you are signed in on the website.
  • Q. How can I cancel an order ?
    A. An order can only be cancelled if it has not been shipped. To cancel an order, kindly reach out to us through help@exoticindia.com.
Add a review
Have A Question
By continuing, I agree to the Terms of Use and Privacy Policy
Book Categories