लेखक परिचय
डॉ. सीमा मुङ्गिल जन्मः 17 जनवरी 1983 ई. बास, हिसार (हरियाणा) शिक्षाः एम.ए. (हिन्दी), एम.फिल., बी.एड. तथा पी-एच.ड़ी. । लेखनः शोध-पत्रः प्रकाशनः- समीचीन, शोध-दिशा, Indian Journal of Social Concerns पत्रिकाओं में शोध पत्रों का प्रकाशन ।
प्राक्कथन
नवगीत हिन्दी साहित्य जगत की कोई घटना या आन्दोलन नहीं है बल्कि यह तो भारतीय संस्कृति की लहलहाती हुई नई फसल है जो नये युग में मानव को ऊर्जावान बनाती है तथा जन-जन की पीड़ा को सुखद मनोभूमि प्रदान करके भविष्य के प्रति आश्वस्त करती है। इसमें नवता के प्रति आग्रह है और सामाजिक संवेदना के प्रति जागरूकता है। यह अपने लय एवं राग की धार से आधुनिक मन की पीड़ा के भंवर को शांत करती है और विपरित स्थितियों का मुकाबला करते हुए रक्षित एवं सुखद परिवेश का निर्माण करती है। गीत परम्परा के साथ जुड़कर नवगीत ने आंचलिकता से लेकर विश्वग्राम की कल्पना को साकार करने और उसकी संवेदना को व्यापक फलक देने का भरसक प्रयास किया है। समकालीन नवगीत अपने संघर्ष के साथ लयात्मक और रागात्मक सौन्दर्य-बोध के कारण एक शाश्वत विधा के रूप में लोकप्रिय हुआ है। नवगीत में वह क्षमता है जिसके कारण यह जन-जन की संवेदना बन सकता है। नवगीत वर्तमान पूँजीवादी व्यवस्था के विरूद्ध शोषित एवं दलित का पक्षधर बना है। इसमें रूढ़िगत परम्पराओं और आडम्बरों को जड़ से उखाड़ फेंकने की क्षमता है। इसने भारतीय मूल्यों और संस्कृति को सहेजने का काम किया है। नवगीत परम्परा हिन्दी जगत की सशक्त परम्परा है। आकलन की सुविधा हेतु विषयानुशीलन को पांच अध्यायों में विभक्त कर विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है। 'नवगीत' का प्रादुर्भाव वस्तुत स्वतन्त्रता के उपरान्त सन् 1950 में 'नवगीत के बीज विद्यमान थे। उनकी नवगति, नवलय तालछन्द, जैसी गीत पंक्ति इसका प्रमाण है। ठाकुर प्रसाद सिंह के वंशी और मादल ने उसे हवा और पानी दिया था तथा डॉ. शम्भूनाथ सिंह की विलक्षण सर्जना ने नवगीत को एक मुकाम तक पहुंचा दिया है। रिश्तों का महत्य, जीवन-मूल्यों का हनन, जन-जीवन की दशा का वर्णन, दलित-शोषित एवं संघर्ष चेतना तथा राष्ट्र के प्रति चेतना का वर्णन किया गया है। समाज में व्यक्ति के संघर्षपूर्ण जीवन का चित्रण किया गया है। इसमें आर्थिक संघर्ष के कारण परिवारों में चढ़ते संघर्ष की स्थिति का वर्णन भी किया गया है। समाज में स्त्री-पुरुष के बीच की टूटन तथा परिवारों के विघटन का वर्णन इस में किया गया है। डॉ. ओम प्रकाश सिंह के नवगीतों में राजनीतिक संघर्ष का वर्णन भी इस पुस्तक में किया है। इसमें वर्तमान राजनीति के स्वरूप का चित्रण, राजनीतिक भ्रष्टाचार का वर्णन किया गया है। इस अध्याय में शासक-शासित सम्बन्धों का चित्रण वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था, भ्रष्ट राजनीति एवं राजनीतिज्ञों पर प्रहार, राजनीतिक मूल्यों का अवमूल्यन, राजनेताओं के दोहरे चेहरे का वर्णन किया गया है। जब साहित्यकार किसी क्षेत्र में रचना कार्य आरम्भ करता है तो उसके कार्य में स्वतः ही देश की समकालीन राजनीति का प्रभाव आ जाता है। गीतकार ने समकालीन राजनीति की कमियों तथा उनसे बचने के उपायों का वर्णन भी अपने गीतों में किया है। इसमें कवि ने देश की भ्रष्ट राजनीति तथा खराब चुनाव प्रणाली पर भी तीक्ष्ण प्रहार किये हैं।इस पुस्तक में डॉ. ओम प्रकाश सिंह के नवगीतों में आर्थिक संघर्ष का वर्णन किया गया है। इस अध्याय में साहित्य तथा अर्थ का सम्बन्ध, वर्तमान आर्थिक स्थिति तथा डॉ. ओम प्रकाश सिंह के नवगीतों में विभिन्न आर्थिक सरोकारों का विवेचन किया गया है। जिसके अन्र्तगत वर्ग-भेद एवं वर्ग-संघर्ष, बेरोजगारी, आर्थिक शोषण तथा निर्धनता का वर्णन किया गया है। समाज में फैली आर्थिक संघर्ष की स्थिति का चित्रण इसके गीतों में स्पष्ट देखा जा सकता है। मजदूर, किसान तथा अन्य शोषित वर्ग के संघर्ष का चित्रण इन नवगीतों में हुआ है। धन के अभाव में आम जनता किस प्रकार की समस्याओं का सामना करती है यह भी यहाँ प्रस्तुत किया गया है। वर्ग-भेद एवं वर्ग संघर्ष के कारण उत्पन्न समस्याओं से भी इस भाग में अवगत करवाया गया है। उपसंहार के अन्तर्गत उपर्युक्त सभी अध्यायों का निष्कर्ष है। प्रत्येक अध्याय के शीर्षक का अपना उचित वर्णन व महत्त्व है। इसमें डॉ. ओम प्रकाश सिंह के सभी नवगीतों का उल्लेख किया गया है। मैं अपनी माता श्रीमती सतोष देवी एवं पिता श्री जय कृष्ण शर्मा और अपनी सास श्रीमती बिमला देवी, ससुर श्री रामेहर का आभार व्यक्त करती हूँ।
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