भूमिका
मनुष्य का समस्त जीवन एक प्रश्न है और साहित्य उसका उत्तर खोजने का विनम्र प्रयास।
यह पुस्तक भी किसी घटना, पात्र या कथा का मात्र संकलन नहीं है, बल्कि मानव-चेतना की यात्रा है- जहाँ अनुभव शब्द बनते हैं, शब्द विचार बनते हैं और विचार अंततः दर्शन में रूपांतरित हो जाते हैं।
साहित्य तब जन्म लेता है जब मनुष्य अपने भीतर झाँकने का साहस करता है। जब वह बाहरी संसार से अधिक आंतरिक सत्य को समझने की आकांक्षा रखता है। यही आकांक्षा इस कृति की मूल प्रेरणा है।
यह भूमिका पाठक को यह स्मरण कराने के लिए है कि-पुस्तक केवल पढ़ी नहीं जाती, वह जी जाती है।
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