हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेकासीत ।
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥
ऋग्वेद X.121.1
वे सभी तेजस्वी पदार्थ जो इस जगत् में हैं अथवा होने वाले हैं, उनका आधार-परमात्मा जगत् की उत्पत्ति के पूर्व से ही विद्यमान रहा है। जिन्होंने पृथ्वी, सूर्य और तारों का सृजन किया है, उस देव को हवि के रूप में यह पुस्तक सादर समर्पित है।
भारतीय ज्योतिष का गणितीय आधार वेदांग ज्योतिष से प्रारम्भ होता है। ईसा पूर्व 1200 में विकसित लगध के वेदांग ज्योतिष में अयनान्त पर ग्रहों के बीच सूर्य की स्थिति दी गई है। वेदांग ज्योतिष के बाद आर्यभट्ट प्रथम (जन्म 498) ने आर्यभटीय के गोलपाद में ग्रहों की गति की विवेचना की है। उन्होंने एक महायुग में शनि, गुरु, मंगल, शुक्र और बुध के परिभ्रमण की संख्या दी है। सर्वप्रथम आर्यभट्ट ने ही स्पष्ट किया कि पृथ्वी अपनी धुरी पर परिभ्रमण करती है तथा सूर्य पृथ्वी का परिभ्रमण करता है। आर्यभट्ट के शिष्य लाटदेव ने पौलिश और रोमक सिद्धान्तों की व्याख्या प्रस्तुत की। तात्पर्य यह है कि आर्यभट्ट के समय भारत और यूनान के मध्य ज्ञान का आदान-प्रदान हो रहा था। यह धारणा है कि पौलिश और रोमक सिद्धान्त यवन और यूनान का योगदान है लेकिन इनके मूल प्रणेता के बारे में कोई स्पष्टता नहीं है। आर्यभट्ट के पश्चात् वराहमिहिर की पञ्चसिद्धान्तिका छठी शताब्दी का प्रमुख सैद्धान्तिक ज्योतिषीय ग्रन्थ है। खगोल वैज्ञानिक और बहुश्रुत वराहमिहिर का जन्म अवन्तिपुर में हुआ था। उनके पिता आदित्यदास थे जिनसे उन्हें ज्योतिष की प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त हुई। वराहमिहिर ने उज्जैन में अपना कार्यक्षेत्र बनाया।
उनकी प्रमुख कृति बृहद् संहिता है। वराहमिहिर पौलिश एवम् रोमक सिद्धान्तों से भी प्रभावित थे। अनुमानतः ईशा पश्चात् 575 में पञ्चसिद्धान्तिका की रचना हुई थी।
वराहमिहिरकृत पञ्चसिद्धान्तिका भारतीय खगोलशास्त्र का एक प्रमुख सैद्धान्तिक ग्रन्थ है। वराहमिहिर अपने समय के लब्ध प्रतिष्ठित ज्योतिषविद् थे, पर उन्होंने अपनी स्वयं की रचना प्रस्तुत न करके उस समय के उपलब्ध प्रमुख 5 ज्योतिष सिद्धान्तों को संकलित पञ्चसिद्धान्तिका को प्रस्तुत किया। उस समय के पाँच प्रमुख सिद्धान्त पौलिश, रोमक, वासिष्ठ, सूर्य और पितामह रहे हैं। आज ये सभी ग्रन्थ और उनकी टीकाएं लुप्त हो चुकी हैं। वराहमिहिर के समय का सूर्यसिद्धान्त आज के प्रचलित सूर्यसिद्धान्त' से भिन्न है। पञ्चसिद्धान्तिका में वर्णित कुछ विषय वराहमिहिर के समकालीन थे पर उनमें से कुछ काफी पहले के हैं। बहुत समय तक यह पुस्तक लोगों की स्मृति से दूर रही। ब्रिटिश इण्डिया के बॉम्बे प्रेसिडेन्सी के तत्त्वावधान में प्राचीन संस्कृत साहित्य के संकलन में प्रो०जी० बुहलर को 1873-74 में पञ्चसिद्धान्तिका की दो अलग-अलग हस्तलिखित पाण्डुलिपियां प्राप्त हुई थीं जिन्हें उन्होंने बनारस (वाराणसी) के भारत-विद् प्रो० थीबाउट को 1879-80 में गहन अध्ययन एवम् व्याख्या के लिए भेजा था। प्रो० थीबाउट ने महामहोपाध्याय पं० सुधाकर द्विवेदी के सहयोग से इस पुस्तक की संस्कृत टीका के साथ 1884 में अंग्रेज़ी अनुवाद प्रस्तुत किया। उपलब्ध दोनों प्रतियों में प्रो० थीबाउट को किञ्चित अशुद्धियाँ मिली तथा कुछ श्लोक अपूर्ण थे, लेकिन पं० सुधाकर द्विवेदी द्वारा उनमें सुधार का प्रयास नहीं किया गया। ऐतिहासिक दृष्टिकोण से मूल श्लोकों को यथावत् उद्धृत करना ही उचित है इससे उस समय की भाषा पद्धति एवम् गणना का स्तर स्पष्ट होता है। अशुद्धियों का निराकरण भावी शोध का विषय हो सकता है।
Hindu (हिंदू धर्म) (13645)
Tantra (तन्त्र) (1007)
Vedas (वेद) (730)
Ayurveda (आयुर्वेद) (2087)
Chaukhamba | चौखंबा (3184)
Jyotish (ज्योतिष) (1563)
Yoga (योग) (1166)
Ramayana (रामायण) (1336)
Gita Press (गीता प्रेस) (724)
Sahitya (साहित्य) (24710)
History (इतिहास) (9024)
Philosophy (दर्शन) (3633)
Santvani (सन्त वाणी) (2623)
Vedanta (वेदांत) (116)
Send as free online greeting card
Email a Friend
Visual Search
Manage Wishlist