किसी भी रंगमंच के लिए उसका निकटतम अतीत और उसकी समझ तथा उससे साक्षात्कार बहुत ही अनिवार्य है। बिना निकट अतीत को जाने और बिना उसके हर पहलू से साक्षात्कार किए अपने वर्तमान की रचना नहीं की जा सकती । इसी सत्य ने वास्तव में मुझे 'पारसी थियेटर' (ठेठर, या थियेटर इसी नाम से जाना-पुकारा जाता था) के बीच 'पारसी-हिन्दी थियेटर' के प्रति आकर्षित किया और जैसे-जैसे मैं इस अध्ययन में लगा तो मैं इसकी विशालता, इसके फैलाव और इसकी गहराई से आश्चर्यचकित रह गया। पारसी नाटकों को प्रकाशित-अप्रकाशित रूप में पाना और उन्हें पढ़ना इतना आसान न था। इससे अधिक संकट यह था कि उस काल के महत्त्वपूर्ण रंगकर्मी अब इस संसार में नहीं हैं। वे ऐसे रंगकर्मी थे जिन्होंने न अपने बारे में कुछ लिखा और न उनके बारे में किसी ने कुछ लिखा। वे लोग बस अपनी कला में मस्त थे और पूरा पारसी थियेटर-काल उनके प्रति विमोहित था। हिन्दी में तो इस प्रसंग में कुछ भी संतोषपूर्ण सामग्री मुझे नहीं मिली। कुछ सामग्री उर्दू, गुजराती में अवश्य मिली, लेकिन उस रंगमंच के अध्ययन की सामग्री को रंगमंचीय मुहावरे में प्रकट करना और उस पूरी सामग्री को नाट्य-शिल्प की भाषा और परिप्रेक्ष्य में अभिव्यक्त होना, ऐसा मुझे कहीं नहीं मिला। पिछले कितने वर्षों के अध्ययन और परिश्रम के बाद जो कुछ मैंने पाया, उसे विनम्र रूप से प्रस्तुत कर रहा हूं। इस 'थियेटर' को इसकी समग्रता में देखने और इसके नाट्य-मूल्यों को तलाशने का यह एक संकल्प-फल है। मैंने अनुभव किया कि यह प्राप्ति हमारी परम्परा की है और यह पारसी नाट्य-परम्परा जिस तरह से भी शुरू हुई हो, अंततः हमारी निजी परम्परा और हमारी संस्कृति की है। इसका प्रभाव अब तक हमारी हिन्दी फिल्मों पर है, हमारे साहित्यिक नाटकों और हमारे जनमानस पर है और यही वह सत्य है जिसे जाने बिना हम आज आधुनिक रंगमंच की कल्पना नहीं कर सकते । पारसी-हिन्दी थियेटर का यह अध्ययन मेरे लिए इतना कष्टकर और साथ ही आनन्दकर था कि जब मैं घूमकर इस काल के लेखकों और कलाकारों तथा उस विशाल दर्शक समाज को याद करता हूं तो मेरा मन कृतज्ञता से भर जाता है। अपनी अनेक सीमाओं के बावजूद, आशा है हिन्दी रंगमंच और इसकी नाट्य-परम्परा को समझने में यह कार्य मदद देगा। और पाठकों को इससे हिन्दी रंगमंच और इसकी संश्लिष्ट परम्परा के प्रति एक नई समझ और दृष्टि मिलेगी।
लक्ष्मीनारायण लाल जन्म : 4 मार्च, 1927, वस्ती (उत्तर प्रदेश) शिक्षा: एम.ए., पीएच.डी. । प्रकाशित कृतियाँ : नाटक 'अन्धा कुआँ, श्मादा कैक्टस', 'सुन्दर रस', 'सूखा सरोवर', 'नाटक तोता मैना', 'रातरानी', 'दर्पण', 'सूर्यमुख', 'कलंकी', 'मिस्टर अभिमन्यु', 'कर्फ्यू', 'दूसरा दरवाज़ा', 'अब्दुल्ला दीवाना', 'यक्ष प्रश्न', 'व्यक्तिगत', 'एक सत्य हरिश्चन्द्र', 'सगुन पंछी', 'सब रंग मोहभंग', 'राम की लड़ाई', 'पंच पुरुष', 'लं कांड', 'गंगा माटी', 'नरसिंह कथा', 'चन्द्रमा' । एकांकी संग्रह: 'पर्वत के पीछे', 'नाटक बहुरूपी', 'ताजमहल के आँसू', 'मेरे श्रेष्ठ एकांकी' । उपन्यास : 'धरती की आँखें', 'बया का घोंसला और साँप', 'काले फूल का पौधा', 'रूपाजीवा', 'बड़ी चम्पा छोटी चम्पा', 'मन वृन्दावन', 'प्रेम एक अपवित्र नदी', 'अपना-अपना राक्षस', 'बड़के भैया', 'हरा समन्दर गोपी चन्दर', 'वसंत की प्रतीक्षा', 'श्रृंगार', 'देवीना', 'पुरुषोत्तम' । कहानी-संग्रह: 'आनेवाला कल', 'लेडी डॉक्टर', 'सूने आँगन रस बरसै', 'नए स्वर नई रेखाएँ', 'एक और कहानी', 'एक बूँद जल', 'डाकू आए थे', 'मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ' । शोष एवं समीक्षा : 'हिन्दी कहानियों की शिल्प-विधि का विकास', 'आधुनिक हिन्दी कहानी', 'रंगमंच और नाटक की भूमिका', 'पारसी हिन्दी रंगमंच', 'आधुनिक हिन्दी नाटक और रंगमंच', 'रंगमंच देखना और जानना' । सम्मान : सन् 1977 में संगीत नाटक अकादमी द्वारा श्रेष्ठ नाटककार के रूप में सम्मानित । सन् 1979 में साहित्य कला परिषद् तथा सन् 1987 में हिन्दी अकादमी द्वारा साहित्यिक योगदान के लिए पुरस्कृत हुए। निधन : 20 नवम्बर, 1987
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