लेखक परिचय
डॉ. कौशलनाथ उपाध्याय 20 अक्टूबर 1959 ई. को मीरजापुर उ.प्र.) के एक गाँव-छटहाँ-में जन्म। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से बी.ए. (ऑनर्स, हिन्दी), एम.ए., पीएच.डी. (हिन्दी)। 02 नवम्बर 1984 को हिन्दी विभाग, जोधपुर वि.वि. (अब 'जयनारायण व्यास वि.वि.') में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति; यहीं से एसोशिएट प्रोफेसर तथा प्रोफेसर एवं अध्यक्ष के रूप में कार्य करते हुए सेवानिवृत्त, यहीं पर पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यक्ष; कला, शिक्षा एवं समाज विज्ञान संकाय के अधिष्ठाता; सिंडीकेट, सीनेट, एकेडमिक काउंसिल के सदस्य रहे। केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय, नई दिल्ली; साहित्य अकादमी, नई दिल्ली की जनरल काउंसिल एवं परामर्श मंडल; भारतीय हिन्दी परिषद्, प्रयागराज की कार्यकारिणी; राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर की 'सरस्वती सभा' के सदस्य रह चुके हैं। राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर द्वारा 'विशिष्ट साहित्यकार सम्मान'; साहित्य शिरोमणि सम्मान; लक्ष्मीनारायण दुबे स्मृति सम्मान; सुभद्रा कुमारी चौहान जन्मशताब्दी सम्मान; सहस्राब्दी हिन्दी सेवी सम्मान प्राप्त। दो काव्य-संग्रह एवं दस आलोचना की पुस्तकें प्रकाशित । सम्प्रति 'शब्द सेतु संस्थान' जोधपुर के अध्यक्ष एवं अंतरप्रांतीय कुमार साहित्य परिषद्, जोधपुर के उपाध्यक्ष ।
पुस्तक परिचय
हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के पूर्व आचार्य, आलोचक, भाषा-वैज्ञानिक, साहित्येतिहास के विद्वान डॉ. राजमणि शर्मा के व्यक्तित्व की आभा और उनके रचना-कर्म के वैभव को जानने-समझने का एक प्रयास है यह ग्रंथ। इसमें उनके व्यक्तित्व-पक्ष के साथ-ही-साथ उनकी आत्मकथा एवं संस्मरण के पक्ष को; उनकी साहित्येतिहास विषयक चिन्तन और दृष्टि को; उनके हिन्दी भाषा एवं भाषा-विज्ञान विषयक चिन्तन के पक्ष को; उनके साहित्य-चिन्तन और समीक्षा-दृष्टि को; हिन्दी कविता एवं काव्यभाषा से जुड़े उनके चिन्तन के पक्ष को और उनके अनुवाद-विज्ञान संबंधी दृष्टिकोण को विस्तारपूर्वक देखा-दिखाया गया है। प्रो. राजमणि शर्मा के विपुल आलोचना-कर्म को देखें तो हम पाते हैं कि कभी वे 'साहित्येतिहास विषयक चिंतन' करते दिखाई देते हैं तो कभी 'हिन्दी भाषा एवं भाषा-विज्ञान' विषयक चिन्तन को लेकर सामने आते हैं; कभी वे 'हिन्दी कविता' पर विचार करते हुए उसके 'इतिहास एवं सिद्धांत' का विवेचन-विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं तो वहीं पर 'काव्यभाषा' के महत्त्व का भी विस्तारपूर्वक रेखांकन करते हैं। उनका साहित्य चिन्तन और समीक्षा से जुड़ा पक्ष तो अपने आप में अद्भुत है, उसमें हम आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के मूल मंत्र "सत्य के लिए किसी से न डरना, गुरु से भी नहीं, मंत्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं, वेद से भी नहीं" को भी प्रतिफलित होते देखते हैं और उनकी मानवतावादी सोच और दृष्टि को भी बखूबी देख सकते हैं। प्रो. शर्मा का अनुवाद-विज्ञान विषयक चिन्तन तो अपने आप में उल्लेखनीय है वहाँ हम केवल उसके सिद्धांतों को ही नहीं देखते हैं बल्कि उसके इतिहास और उसके व्यावहारिक पक्ष पर भी सार्थक विवेचन-विश्लेषण पाते हैं। हर रचनाकार, आलोचक, चिन्तक, विचारक की अपने समय एवं समाज के प्रति कुछ अपनी धारणाएँ होती हैं, उन धारणाओं के बनने-बनाने में उसके समय, समाज, उसके समय के व्यक्तियों-व्यवस्थाओं की भूमिकाएँ होती हैं। जिसे उनकी आत्मकथा एवं संस्मरण की पुस्तक 'यादों के झरोखे' में देखा जा सकता है।
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