लेखक परिचय
प्रोफेसर रामस्वरूप (1942) प्रोफेसर रामस्वरूप मध्यप्रदेश शासन के उच्चशिक्षा विभाग में भूगोल के प्राध्यापक रहे। प्रोफेसर रामस्वरूप की अध्यात्म और साहित्य में गहरी रूची है। उन्होंने इन विषयों पर अनेक महत्वपूर्ण रचनायें लिखी हैं। उन्होंने इन विषयों के अनेक ग्रन्थों का संपादन भी किया है। प्रोफेसर रामस्वरूप इस ग्रन्थ के लेखक डॉ. शिवकुमार तिवारी के कॉलेज के दिनों के कक्षामित्र भी हैं। उन्होंने डॉ. शिवकुमार तिवारी के स्फुट साहित्य को संकलित कर 'अनुभव के अर्थ' शीर्षक से एक ग्रन्थ संपादित और प्रकाशित किया है। उसी कड़ी में यह तीसरा ग्रंथ है। इन दिनों प्रोफेसर रामस्वरूप भारतीय धर्म दर्शन पर महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। सेवा निवृत्ति के पश्चात् वे अपना पूरा समय अध्यात्म आधारित गतिविधियों में व्यतीत करते हैं।
शिवकुमार तिवारी (1941) जबलपुर में विश्वविद्यालयीन परीक्षायें (बी.ए., एम.ए.) विशेष योग्यता के साथ प्रथम श्रेणी में उत्र्तीण, नेशनल मैरिट स्कालरशिप, जैवभूगोल में शोधकार्य एवं डाक्टरेट की उपाधि। 25 वर्षों तक (1964 से 1990 तक) मध्यप्रदेश की महाविद्यालयीन सेवा में भूगोल विषय के सहायक प्राध्यापक एवं प्राध्यापक बदों पर रहकर शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालयों में अध्यापन कार्य। भूगोल, मानव विज्ञान, पर्यावरण, जनजातीय संस्कृति एवं चिकित्सा भूगोल पर अनेक ग्रन्य तथा अनेक शोध पत्र प्रकाशित। 13 वर्षों (1990 से 2003) तक रानीदुर्गावती विश्वविद्यालय में जनजाति अध्य्यन विभाग में अध्यक्ष के रूप में कार्यरत विश्वविद्यालय में कार्य करते हुये 12 पीएच.डी. शोध कार्यों का सफल निर्देशन। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, भारतीय सामाजिक विज्ञान परिषद् तथा मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी परिषद जैसी संस्थाओं के द्वारा प्रायोजित क्षेत्रीय शोध प्रोजेक्ट्स के निदेशक। भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा अनुदान प्राप्त क्षेत्रीय शीघ प्रोजेक्ट्स के निदेशक। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की शाखा जनजातीय आयुर्विज्ञान शोध संस्थान के मानद सदस्य। उन्होंने तीन विश्वकोशों की भी रचना की जिनमें से दो पर्यावरण विषय पर तथा एक भारतीय जनजातियों से संबंधित है। उनके द्वारा लिखा 'भारतीय वन्य प्राणियों के संरक्षित क्षेत्रों का विश्वकोश हिन्दी भाषा का पहला एवं अनूठा विश्वकोश है। उनके द्वारा रचित साठ ग्रंथ प्रकाशित हैं। डा. शिवकुमार तिवारी, मध्यप्रदेश शासन के द्वारा शोध परक साहित्य सृजन के लिये 'डा. शंकर दयाल शर्मा सृजन सम्मान- 2006' से सम्मानित है
भूमिका
अनुभव के अर्थ' और 'अनुभव की संकरी गली में' के पश्चात् 'सखा कहउँ में अनुभव अपना' डॉ. शिवकुमार तिवारी के संस्मरणात्मक निबंधों की तीसरी पुस्तक है, जिसमें उन्होंने ऐसी घटनाओं का वर्णन किया है जो कि उनके सम्पर्क में आये व्यक्तियों के साथ घटित हुई हैं। इन घटनाओं के परिणाम हमें स्पष्ट रूप से दिखायी देते हैं परन्तु इनके घटित होने की प्रक्रिया के संबंध में किसी भी प्रकार की प्रत्यक्ष जानकारी नहीं मिलती हैं। अपने अध्ययन, जानकारी और समझ से हम केवल यह कह सकते हैं कि अदृश्य और अदृश्य की पृष्ठभूमि में घटने वाली इन घटनाओं पर उनके प्रभावों की तार्किक और सटीक व्याख्या नहीं की जा सकती है। सभी कुछ एक कुहासे या धुंध में लिपटा रहा आता है। घटनाओं के परे की जो पृष्ठभूमि है, जहाँ सब कुछ घटित हुआ है या होता रहता है वहाँ तक हमारी बुद्धि की गति नहीं है। इसका मात्र सतही विश्लेषण करके हम स्पष्ट परिणामों को स्वीकार कर लेते हैं। इस निबंध संग्रह में संग्रहीत अघोरी संत, अपरिचित त्राता, दुर्गति आदि कुछ ऐसी रचनायें हैं जो हमारे मानस पटल पर स्थायी रूप से चित्रित हो जाती हैं जिनके प्रभाव से मुक्त हो पाना न सहज है और न सरल ही। डॉ. शिवकुमार तिवारी के लेखन में ऐसे सत्य का उद्घाटन हुआ है जो अपनी स्वीकृति स्वयं करा लेता है। डॉ. शिवकुमार तिवारी की ये रचनायें उनकी डायरियों में लिखी हुई थीं, जिनके प्रकाशन के संबंध में उन्होंने कोई निर्णय नहीं लिया था। उनकी इन्हीं डायरियों में से एक पन्ने में लिखी इबारत को मैं यहाँ 'डायरी का एक पन्ना' शीर्षक से प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसमें मुझे इस पुस्तक में दर्ज की जाने वाली घटनाओं के बीज-विचार दिखलाई दिए किसी भी रचना को शब्दों में उतारने और फिर उसे प्रकाशित होने में स्वाभाविक रूप से वक्त लगता है। तब अनेक बार इस बीत्त बहुत कुछ हार जाता है। कभी-कभी वह उल्लेखनीय भी होता है पर रचनाकार उसे अपनी रचना में नहीं जोड़ता क्योंकि रचना पहले ही पूरी हो चुकी होती है। पुस्तक के सातवें अध्याय 'बागेश्वरधाम' में ऐसा ही हुआ। सन् 2025 में लिखे गये इस अध्याय में लगभग दो वर्ष बाद एक महत्वपूर्ण घटना घटी। यहाँ की जनकल्याण योजनाओं में एक स्वर्णिम पृष्ठ जुड़ा। यहाँ बुन्देलखण्ड क्षेत्र के सबसे बड़े शासकीय कैंसर अस्पताल की नींव रखी गई। भारत की महामहिम राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री यहां पधारे। आठ दशक पार की उम्र में सब कुछ कठिन हो रहा है, पर हमारे लिखने पड़ने को सुचारू बनाया है अनुभव स्वरूप ने और हमारी पुत्रवधू रेखा ने। हम कुछ लिख पढ़ पा रहे हैं, यह एक सुकून भरा काम है। इस कृक्ति के कलेवर और उसे रूप देने में श्री योगेश्वर दुबे जी द्वारा दिए गए समय और श्रम के लिए वे साधुवाद के अधिकारी है। उन्हें आभार। आशा है यह कृति सम्माननीय पाठकों को आनंदित करेगी।
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