सम्पादकीय
बुंदेलखण्ड के हृदय स्थल कुण्डलपुर में संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का सम्पूर्ण संघ इकट्ठा हुआ था। मैं भी बड़े बाबा एवं आचार्य श्री के दर्शनार्थ कुण्डलपुर पहुंचा, जहाँ आचार्य श्री के ही शिष्य अभीक्षण ज्ञानोपयोगी अनेक ग्रंथों के रचयिता संस्कृत, प्राकृत, हिन्दी, अंग्रेजी आदि अनेक भाषाओं पर अधिकार रखने वाले अर्हम् ध्यान-योग प्रणेता मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज के चरणों में बैठने का अवसर मिला। चर्चा के दौरान विचार किया गया कि आचार्य श्री द्वारा रचित षट्शती ग्रंथ में छः शतकों के माध्यम से गागर में सागर भरा है।
आचार्य श्री की काव्यात्मक शैली छन्द विधा अतुलनीय है। यह ग्रंथ जितना महत्वपूर्ण है, उस हिसाब से प्रकाश में नहीं आया। हालांकि कुछ विश्वविद्यालयों में षट्शती ग्रंथ का सुनीतिशतक अध्ययन हेतु पाठ्यक्रम में भी लागू हो चुका है। विचार किया इस पर एक संगोष्ठी करायी जाय, जिसमें मुख्य रूप से आचार्य श्री के गुरुजी आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज की शिक्षा स्थली एवं सर्व विद्या की राजधानी काशी से विद्वानों को बुलाया जाये और षट्वती ग्रंथ पर व्याख्यान कराया जाए। समस्या थी स्थान एवं तिथि निश्चित करने की, क्योंकि दिगम्बर साधु अनियत विहारी होते हैं। हमारा सौभाग्य था कि पूज्य मुनि श्री प्रणम्य सागर जी महाराज को ग्रीष्मकालीन वाचना हेतु शहपुरा भिटौनी जिला- जबलपुर के लिए आचार्य श्री का निर्देश मिल गया। मैं मुनिश्री के पास पहुंचा और संगोष्ठी की तिथि 15-16 अप्रैल 2023 निश्चित हो गयी। काशी के साथ-साथ पूरे देश से विद्वानों को आमंत्रित किया गया।
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