भूमिका
भारतवर्ष जिसे वर्तमान में भारत, हिन्दुस्तान तथा इण्डिया कहा जाता है। संखार के उन प्राचीनतम भू-भागों में से एक है, जिनमें मानव सृष्टि, मानव सभ्यता तथा मानव संस्कृति का प्रारम्भ सर्वप्रथम हुआ है। संगीत के विकास की चर्चा करने के लिये हमें विश्व के सबसे प्राचीनतम संगीत को जानना भी आवश्यक हो जाता है। चाहे गायन के विकास के बारे में चर्चा करें अथवा वाथ एवं वादन के बारे में। तन्त्री वाद्यों की विकास की यात्रा कहाँ से प्रारंभ हुई एवं इतिहास के अनुसार कब एवं क्या परिवर्तन हुए उसकी चर्चा करना भी आवश्यक है। इतिहास पुरातत्व और भाषा विज्ञान के विद्वानों का विचार है, कि भारतीय वैदिक वाङ्ङ्गमय संसार का सबसे प्राचीन लिखित साहित्य है। इसमें ऋग्वेद को सबसे प्राचीन माना गया है। संगीत भारतीय सभ्यता का एक प्रमुख अंग है। संगीत का प्राचीनतम नाम 'साम' है। पुरातनकाल में जब वैदिक धर्म सर्वोपरि था और वैदिक यज्ञ या धर्मानुष्ठान हुआ करते थे, तब यज्ञ के समय ऋग्वेद के कुछ मन्त्रों की गाया जाता था। इस गान को 'साम' कहते थे। संगीत शास्त्रों की परिभाषा के अनुसार संगीत गायन, वादनत था नृत्य का समुच्चय है। वादन क्रिया के अन्तर्गत विभिन्न वाद्यों का वादन किया जाता है। वाद्य चार प्रकार के हैं, तत्, अवनद्ध, घन और सुषिर। इन्हें क्रमशः नखज, चर्मज, लोहज तथा वायुज भी कहा जाता है। इन चारों वाद्य प्रकारों की अपनी-अपनी भूमिका है। प्रारंभ में तत् वाद्य गायक के कण्ठ स्वर की संगति करते थे। किंतु वर्तमान में यह स्वतंत्र वादन के रूप में प्रस्तुत होने लगे। चर्तुविध वाद्यों की संगीत में भूमिका उपरंजन करना है। इन चतुर्विध वाद्यों में तत् वाद्यों की प्रमुख भूमिका है। तत् वाद्य अर्थात् ताँत या धातु के पतले मोटे तारों वाले वाद्य 'तत् वाद्य' कहलाते हैं। वीणा, सितार, सारंगी, तम्बूरा, सुरबहार, स्वर मंडल, एकतारा, वॉयलिन और गिटार आदि वाचतंत्र उत् वायों की श्रेणी में राहते हैं। यहाँ में सितार वादन की महाविद्यालयीन शिक्षा पर प्रकाश। डॉ. जयप्रकाश सिंह के अनुसार इन समस्त वायों के बादन हेतु क्रमिक रुप से विशेष प्रशिक्षण लिया जाता है। बिना प्रशिक्षण के तो गायक में और न स्वतंत्र वादन में वादक सिद्धहस्त हो सकता। संगीत शिक्षा के हर युग में परिवर्तन होते रहे हैं। जो अति प्राचीन, प्राचीन, पूर्व मध्ययुग, मध्ययुग, पूर्व आधुनिक युग एवं आधुनिक युग से वर्तमान युग तक शिक्षा प्रदान करने के माध्यम है। यहाँ मैं सर्वप्रथम सितार एवं वॉचत्तिन का ऐतिहासिक वर्णन करूंगा। सितार - सितार वर्तमान काल का सवर्वाधिक लोकप्रिय वाघ है। सितार के अविष्कार के रूप में कुछ दशक पूर्व एक यह धारणा प्रचलित थी, कि इसका अविष्कार तेरहवीं शताब्दी के प्रसिद्ध संगीतकार हजरत अमीर खुसरो (देहलवी) ने किया था। लेकिन तात्कालीन ग्रन्थों, तारीखों और समकालीन विदेशी यात्रियों के यात्रा विवरणों को सूक्ष्मतः अध्ययन किया गया तो यह निष्कर्ष सामने आया, कि अमीर खुसरो ने सितार तो क्या किसी भी तन्त्री वाद्य का विकास नहीं किया था एवं प्राचीन एकतन्त्री अथवा घोषवती वीणा ही कालान्तर में जितन्त्री वीणा के रूप में परिवतर्तित हुई और बाद में 'सहतार अथवा सितार के रूप में विकसित हुई। भारत में यह वीणा त्रितन्त्री वीणा बनी रही, किन्तु जब महाराज विक्रमादित्य ने अपने संगीतकार अरब और ईराक में भेजे तो वहाँ पहुँच कर यह वीणा 'सहतार' के नाम से प्रचलित हो गई। मुसलमानों के साथ यह फिर भारत लौटी और मुगल बादशाह मुहम्मद शाह रंगीले के शासन काल (1719-1748) में खुसरी खाँ ठाटी के द्वारा सितार के नाम से पुनः प्रचलित हुई। इसका रंग-रूप आकार-प्रकार सब कुछ बदल गया एवं आधुनिक काल में सर्वाधिक लोकप्रिय वाघ बन गया है। अपनी विकलित वादन शैली के कारण सितार ने भारत ही नहीं बल्कि पूरे संसार में अपना स्थान बना लिया है। भारतीय संगीत को विदेशों में लोकप्रिय बनाने और उसका प्रचार करने में सितार का बहुत बड़ा हाथ है। लेकिन सितार की उत्पत्ति और उसके अविष्कार के सम्बन्ध में आज तक मतैक्य स्थापित नहीं हो पाया है। लगभग एक-डेढ़ शताब्दी से विद्वजन केवल एक ही बात को लेकर चिंतित हैं, कि सितार कब से प्रचलित है और इसका सर्वप्रथम अविष्कार किसने किया था। आधुनिक काल में आते-आते तक
लेखक परिचय
डॉ. अतुल कुमार गुप्ता शिक्षा: एम.ए., पी-एच.डी. सम्प्रति : सहायक प्राध्यापक (संगीत वादन), शास. कमलाराजा कन्या स्नातकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय, ग्वालियर (म.प्र.) शोध पत्र प्रस्तुतिकरण : 1 बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी 2 ठाकुर रणमत सिंह महाविद्यालय, रीवा (म.प्र.) 3. म.प्र. इतिहास परिषद, शास. कमलाराजा कन्या महाविद्यालय, ग्वालियर कार्यशाला : । सरोजिनी नायडू कन्या महाविद्यालय, ग्वालियर 2 दयाल बाग विश्वविद्यालय, आगरा (उ.प्र.) 3 शास. कमलाराजा कन्या महाविद्यालय, ग्वालियर, (म.प्र.)
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