'दादा' अर्थात् डा० सुधीर कुमार मुखर्जी साहब से जो भी मिले वे उनकी भाव विभोरता व बाबा के चले जाने के उपरांत पैदा हुयी आंतरिक विकलता के कायल हुये बिना नहीं रह सके। वे कुछ इस तरह बर्ताव करते कि लगता जैसे वे हाथ पकड़ कर एक ऐसे पथ के गामी हैं जहाँ केवल आत्मीयता, आत्मोत्सर्ग और बाबा की कृपा के बरसते आनंद के अलावा और कुछ भी नहीं है। वैसे भी इसके अलावा और क्या खोजें हम। मानव हैं न, ईश्वर तो है नहीं। बस भगवदीय कृपा की आतुरता के अलावा और हम क्या चाहें।
जब उनकी पुस्तक (By His Grace) अर्थात "उन्हीं की कृपा से" मुझे १९९१ में मुझे प्राप्त हुयी तो उसका अनुवाद करना मेरा स्वभाव सा बन गया। अनुवाद करने की इस प्रक्रिया से मुझे बाबा की कृपा को कुछ गंभीरता से समझने का अवसर मिला और मैंने 'दादा' व 'दीदी' के साथ उसे बाँटा भी, उन्हें बहुत अच्छा लगा और उन्होंने बढ़ावा दिया कि "पूरा कर डालो।" वक्त गुजरता गया और सन् ९५ या ९६ में दादा का पत्र भी मिला कि मुझे अफसोस के साथ लिखना पड़ रहा है कि तुम इस अनुवाद को मत करो क्योंकि यहाँ कुछ अन्य लोग इस बात के लिये मुझ पर जोर डाल रहे हैं। मेरी प्रतिक्रिया बहुत सीधी सादी व सपाट थी कि 'दादा! मैं आपके लिये अनुवाद नहीं करता मैं तो आपकी बात को समझने के लिये और बाबा के नमन हेतु ऐसा करता हूँ। बात आई गई हो गई और तब सन् १९९७ में एक दिन ४ चर्च लेन के बाहरी बरामदे में वे मुझसे बोले- देखो तुम अपना अनुवाद छपावा देना और देखो इन्दरबाबू को भी ये बता देना। मैंने प्रत्युत्तर में कहा- "दादा जैसी महाराज जी की इच्छा।"
सो आज वो वक्त आ गया है कि ये अनुवाद छपकर भक्तों तक पहुँचे और कुछ भी कहना अन्यथा का अहंकार होगा। अब तो न 'दादा' रहे न 'दीदी' केवल अशोका दी ही बची हैं। मूल पुस्तक में ८४ चित्र है यहाँ वो असंभव है पर पुस्तक में बाबा व दादाकी है इस कारण कतिपय चित्र ही दिये गये है। ये पुस्तक भक्तों के लिये है मेरी ओर से निःशुल्क ही।
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