पुस्तक परिचय
नीति अनीति का विषय ऐसा नहीं जो रुपए आने-पाई में आँका जा सके, बल्कि जीवन का शाश्वत धर्म है। जो व्यक्ति या राष्ट्र विवेक पूर्वक इसका निर्णय करके नीति-मार्ग पर चलता और अनीति के रास्ते से बचता है, वही सच्चा ज्ञानी है और वही खुद ऊँचा उठता तथा दुनिया को ऊँचा उठाता है। इसके विपरीत, अपने अज्ञान से, या जानते हुए भी अमल करने का आलस्य करके, अथवा अपने अहंकार में सत्यमार्ग की उपेक्षा करके, अनीति या असंयम का रास्ता पकड़ता है, वह आगे-पीछे खुद तो गड्ढे में गिरता ही है, साथ ही सृष्टि को भी पीछे की ओर ढकेलता है। नीति-अनीति का या ज्यादा व्यापक रूप में कहें तो सत्-असत् का संघर्ष सदा ही चलता रहता है। इसमें जो जितना ऊँचा उठता है वह उतना ही पहुँचा हुआ है, वही श्रेष्ठ पुरुष या महात्मा है। इसके विपरीत जो जितना नीचे जाता है, वह उतना ही 'साधारण' है; और जो ज्यादा नीचा चला जाए उसे दुनिया पापी कहती है। इसीलिए हरेक का फ़र्ज है कि वह नीति के महत्त्व को समझे और अपने से आगे बढ़े हुओं के अनुभव से प्रोत्साहन पाकर अपने प्रयत्न से उसके मार्ग पर अग्रसर हो। इसके लिए इस संबंधी प्रामाणिक पुस्तकों का अध्ययन और मनन बहुत बड़ा सहारा है। कहना नहीं होगा कि' अनीति की राह पर' एक ऐसा ही सहारा है। आधुनिक युग के सबसे बड़े नीतिवादी महात्मा गांधी के लेखों के इस संग्रह की लोकप्रियता इसी से सिद्ध है कि इसका पुनः पुनः पुनर्मुद्रण होता रहा है। जिस उत्साह से पाठकों ने इसे अपनाया, उससे प्रेरित होकर इसे लगातार परिवर्द्धित एवं संशोधित करके और ज्यादा व्यापक एवं उपयोगी बनाने का प्रयत्न उनके जीवन काल में ही किया गया। इसके गुजराती व अंग्रेजी के नए-से-नए संस्करणों में जो-जो नए अध्याय व परिशिष्ट मिले प्रायः वे सब भी इसमें जोड़े जाते रहे। काफी समय तक अप्राप्य रहने के पश्चात इसे पुनर्मुद्रित किया जा रहा है। आशा है पाठक समाज में इसका स्वागत होगा।
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