प्रस्तावना
"कोई भी समाज शून्य में जीवित नहीं रह सकता। उसे अपने आसपास की छोटी-बड़ी सभी चीजों को साथ लेकर चलना होता है। उसे अपने लोगों, अपने पशुओं, अपने पारंपरिक खान-पान, अपने जलाशयों, अपने खेतों के लिए कोई-न कोई ऐसी व्यवस्था बनानी ही पड़ती है, जो समयसिद्ध और स्वयंसिद्ध हो। समय के किसी विशेष खंड में समाज के सभी सदस्य मिल-जुलकर उसे पाल पोसकर बड़ा करते हैं और उसे मजबूती प्रदान करते हैं। स्वयं पर लगाया हुआ अनुशासन एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को उपहारस्वरूप सौंपा जाता है। एक पीढ़ी अपनी उम्र पूरी करे, उससे पहले वैसी ही परिपक्व पीढ़ी फिर से सामने आ जाती है। इस धरोहर की रखवाली की वजह से ही समाज का जीवन बिना रुके, अबाध गति से चलता रहता है।" पिछले कुछ दशकों से भगदड़ में उलझी सभ्यता ने अपनी समयसिद्ध परंपराओं को जर्जर अवस्था में पहुँचा दिया है। विश्वास की जो परंपराएँ समाज को टिकाए रखती थीं और संचालित करती थीं, उनकी प्रतिष्ठा को गैर जरूरी विकास की आपाधापी ने छिन्न-भिन्न कर दिया है। नए विकल्प ढूंढे बिना पुरानी व्यवस्थाएँ तोड़ दीं गई। परिणाम यह हुआ कि न नया बचा, न पुराना। विडंबना यह रही कि नए-पुराने की जांच के बगैर नई योजनाएँ और एक ही प्रकार के नियम भिन्न-भिन्न भौगोलिक स्थितियों को नजरअंदाज कर पूरे देश में लागू कर दिए। परिणाम यह हुआ कि जो व्यवस्थाएँ सदियों से अनेक आक्रांताओं के प्रहारों में भी सिर उठाए खड़ी रहीं थीं, वे आधुनिकता को सर्वेसर्वा मानने वालों की नासमझी की भेंट चढ़ गईं। पिछले कुछ सालों में हमने अपनी जड़ों को पहचानने और इन खोई पगडंडियों पर फिर से चलने और गैर जरूरी विकास के कचरे से अटे रास्तों को बुहारने का प्रण लिया और निकल पड़े देश के विभिन्न राज्यों में। यात्राओं का हमारा यह काफिला हरियाणा और राजस्थान की सांस्कृतिक प्रयाओं में जल संरचनाओं पर अनुसंधान के साथ-साथ दक्षिण एवं उत्तर पूर्वी राज्यों तक पहुंचा। इस दौरान संबंधित तथ्यों को एकत्रित कर उन्हें यथासंभव शब्दों में सहेजने का प्रयास किया। देश की विभिन्न सामाजिक-सांस्कृतिक प्रयाओं में पानी, कृषि, स्थानीय व्यवसाय और पारंपरिक पोषण पर कार्यशालाओं के माध्यम से भी यह संयोजन हुआ। अलिखित ज्ञान के भंडार गाँव-देहात के किसानों, मछुआरों एवं वृद्धजनों से विषय का गहराई से अध्ययन करने के लिए विभिन्न साक्षात्कार किए गए और इसके माध्यम से संस्कृति के लुप्तप्रायः तथ्यों का दस्तावेजीकरण किया गया। इस संदर्भ में अनेक पुस्तकालयों, अभिलेखागारों, संग्रहालयों से विषय संबंधित ग्रंथों का संग्रह किया गया। सरकारी संस्थाओं के साथ मिलकर स्थानीय संस्थाओं द्वारा समाज को उनके सुनहरे अतीत की याद दिलाकर उसे व्यवहार में शामिल करने के प्रयास भी किए जा रहे हैं। इन शोध यात्राओं में सबसे प्रमुख सर्वेक्षण प्राचीन मंदिरों की कार्यप्रणालियों का किया गया। जिसमें खीर भवानी मंदिर, आदि शंकराचार्य जी तपोस्थली कश्मीर, गुप्त गंगा के किनारे स्थित अनेक मंदिर-मठ, माता वैष्णो देवी, स्वर्ण मंदिर अमृतसर, रणकपुर जैन मंदिर, श्रीनाथ मंदिर नाथद्वारा, गणेश मंदिर मोती डूंगरी, जयपुर, श्री बालाजी मंदिर, सालासर, राजस्थान, ठाकुर बिहारी जी, राधारमण मंदिर, इस्कान मंदिर वृंदावन, द्वारिकाधीश मंदिर, द्वारिका, रुक्मणि मंदिर, स्वामीनारायण मंदिर, गुजरात, बाबा विश्वनाथ मंदिर, अन्नपूर्णा मंदिर, खिचड़ी बाबा मंदिर, कालभैरव मंदिर वाराणसी, गोरखधाम गोरखपुर, गुरुद्वारा बंगला साहिब, रकाबगंज गुरुद्वारा दिल्ली, महाकालमंदिर उज्जैन, मध्यप्रदेश, श्री गोविन्द देव मंदिर इम्फाल, श्री जगन्नाथ मंदिर, जगन्नाथ पुरी, लिंगराज मंदिर भुवनेश्वर, मंजूनाथ मंदिर धर्मस्थल, उडूपी का कृष्णमठ, गणपति मंदिर, महालिंगेश्वर मंदिर उडुप्पी, कर्नाटक, तिरुपति बालाजी, आंध्र प्रदेश को विशेष रूप से शामिल किया गया। इनके अतिरिक्त राष्ट्र निर्माण में विभिन्न राज्यों के गाँवों में बने छोटे-छोटे मठ-मंदिरों, गुरुद्वारों की सामाजिक-सांस्कृतिक, वैज्ञानिक एवं आर्थिक भूमिकाओं के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन भी किया गया है
पुस्तक परिचय
कोई भी समाज सून्य में जीवित नहीं रह सकता। उसे अपने आसपास के परिवेश के संदर्भ में ही व्यवस्था बनानी पड़ती है, जो समयत्तिब्द और स्वयंसिद्ध हो। समय के किसी विशेष खंड में समाज के सभी सदस्य उसे मिल-जुलकर, पाल पोसकर बडा करते हैं और उसे मजबूती प्रदान करते है। इन शोध यात्राओं में बहुत से शाश्वत और कालजयी रोचक तथ्य सामने आए। लोकज्ञान और लोक परंपराओं का एक बहुत विशाल संसार हमें यूँ ही संचालित किए हुए है। हमारे प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण और संवर्धन कर रही हैं। पूरे अध्ययन का एक निचोड निकला है कि समग्र विकास का रास्ता भावनाओं से होकर ही गुजरता है। राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले की मादरा तहसील के डाबड़ी गाँव में जन्मी डॉ. मीना कुमारी की इतिहास में गहरी रुचि रही है। आपने 'चूरू मंडल का पारम्परिक जल प्रबंधन' विषय पर शोध किया है। पहली पुस्तक 'थार मरुस्थल का परंपरागत जल प्रबंधन के तीन संस्करण आ चुके हैं। राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं। केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय द्वारा 'जल प्रहरी राष्ट्रीय अवार्ड', व 'गंगा के लाल अवार्ड सोसायटी फॉर कम्यूनिटी मोबिलाइजेशन फॉर सस्टॅबल डेव. लपमेंट, नई दिल्ली द्वारा 'यंग वुमन साइंटिस्ट अवार्ड से पुरस्कृत हैं। वर्तमान में आप राष्ट्रीय दैनिक राजस्थान पत्रिका में विशेष संवाददाता हैं।
Hindu (हिंदू धर्म) (13645)
Tantra (तन्त्र) (1007)
Vedas (वेद) (730)
Ayurveda (आयुर्वेद) (2087)
Chaukhamba | चौखंबा (3184)
Jyotish (ज्योतिष) (1563)
Yoga (योग) (1166)
Ramayana (रामायण) (1336)
Gita Press (गीता प्रेस) (724)
Sahitya (साहित्य) (24710)
History (इतिहास) (9024)
Philosophy (दर्शन) (3633)
Santvani (सन्त वाणी) (2623)
Vedanta (वेदांत) (116)
Send as free online greeting card
Email a Friend
Visual Search
Manage Wishlist