पुस्तक परिचय
प्रस्तुत ग्रंथ अरब में सात साल लेखक द्वारा अरब देशों में बिताए गए सात वर्षों के अनुभवों पर आधारित एक गंभीर, शोधपरक और दस्तावेज्ञात्मक अध्ययन है। यह पुस्तक केवल यात्रा-वृत्तांत नहीं है, बल्कि अरब समाज की सामाजिक संरचना, धार्मिक मानसिकता, सांस्कृतिक व्यवहार और वैचारिक प्रवृत्तियों का प्रत्यक्ष अनुभवों एवं तर्कसंगत विश्लेषण के माध्यम से किया गया अकादमिक विवेचन है। इस कृति की विशेषता यह है कि लेखक ने अरब जगत में आर्य समाज के वैदिक प्रचार प्रसार के अनुभवों को भी तथ्यात्मक रूप से प्रस्तुत किया है। पुस्तक में यह दर्शाया गया है कि एक पूर्णतः भिन्न धार्मिक सांस्कृतिक वातावरण में वैदिक के ईश्वर-एकत्व, तर्क, नैतिकता, मानव समानता और कर्म-सिद्धांत मूलभूत विचारों का प्रचार किस प्रकार किया गया, किन सामाजिक एवं वैचारिका चुनौतियों का सामना करना पड़ा, और संवाद के कौन-से मार्ग प्रभावी सिद्ध हुए। लेखक ने अपने प्रत्यक्ष संपकों, संवादों, सार्वजनिक व व्यक्तिगत चर्चाओं तथा सामाजिक अनुभवों के आधार पर यह स्पष्ट किया है कि अरब समाज में तर्कसंगत और सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों पर संवाद की संभावनाएँ विद्यमान हैं। लेखक ने आर्य समाज के प्रचार कार्य को केवल धार्मिक गतिविधि के रूप में नहीं, बल्कि सुधारवादी आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह ग्रंथ अरब समाज को रूढ़ धारणाओं से परे जाकर समझने में सहायक है तथा साथ ही यह भी प्रतिपादित करता है कि आर्य समाज का वैदिक संदेश किसी भूगोल या जाति तक सीमित नहीं, बल्कि वैश्विक मानवता के लिए प्रासंगिक है। अंतरराष्ट्रीय समाजशास्त्र, धार्मिक अध्ययन, वैदिक चिंतन, आर्य समाज आंदोलन तथा तुलनात्मक संस्कृति पर शोध करने वाले विद्यार्थियों, शोधार्थियों और विद्वानों के लिए यह पुस्तक एक महत्वपूर्ण संदर्भ ग्रंथ सिद्ध होगी।
लेखक परिचय
पं० रुचिराम आर्योपदेशक एक परिचय (सिंहल द्वीप), अफगानिस्तान (गांधार), नेपाल आदि से लेकर सुदूर महात्मा बुद्ध के पश्चात् बुद्ध मत की शिक्षाओं को श्रीलंका जावा, सुमात्रा आदि में पहुंचाने का श्रेय बुद्ध भिक्षुओं को जाता है। जिन्होंने नंगे पांव केवल पैदल चलकर, अनेकों प्राकृतिक द्वंदों, जंगली पशुओं, भीष्म वनों, भूख प्यास, व्याधि आदि को सहन करते हुए महात्मा बुद्ध के सन्देश को पहुंचाया था। स्वामी श्रद्धानन्द जी ने ऐसे पुरुषार्थियों को ग्लोबट्रॉटर अर्थात् 'पृथ्वी पदयात्री' की संज्ञा दी थी और गुरुकुल के विद्यार्थियों को भी इसी समान विश्व भर में वैदिक नाद सुनाने के लिए प्रेरित करते थे। आर्यसमाज के अमर बलिदानी पं० लेखराम जी ने कहा था- "मैं चाहता हूँ कि अरब देश में जाकर वैदिक धर्म का प्रचार करू तथा मक्का मदीना में आर्यसमाज स्थापित करके जो विचार भेद धर्म के नाम पर संसार में फैल रहे हैं, उनको दूर कर दूँ।" गुरुकुल कांगड़ी के वार्षिक उत्सव पर एक भजनोपदेशक ने एक भजन कभी गाया था कि "आवेंगे खत अरब से, जिनमें लिखा यह होगा गुरुकुल का ब्रह्मचारी, हलचल मचा रहा है।" यह हलचल भरे खत अरब से आये थे। इन्हें भेजने वाले आर्यसमाज के प्रचारक का नाम था पं० रुचिराम जी आर्योपदेशक। आप आचार्यवर स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी महाराज के आदेश पर केवल 24 वर्ष की आयु में अरब गाए। बिना किसी साधनों के अपनी जान हथेली पर रखकर, अपने चरित्र की रक्षा करते हुए धर्मनाद प्राचीन वैदिक धर्म को भूल चुके अरब वासियों को सात वर्षों तक सुनाया था। अरब में लोगों ने पूछा क्या तुम मुसलमान हो। तो आप उत्तर देते थे कि मैं मुसलमान नहीं हूँ। बल्कि मेरा धर्म आर्य है।
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