मध्यप्रदेश के सुदूर पश्चिमी तथा मालवा के दक्षिण-पश्चिमी सीमांत पर चंबल एवं माही नदी घाटी में अवस्थित रतलाम जिला ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। भौगोलिक एवं ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो रतलाम जिले की पृष्ठभूमि सदा से ही मालवा क्षेत्र (प्राचीन अवंति) से अभिन्न रही है। सूर्यवंशी राठौर राजा रतन सिंह के नामाधार पर 'रतलाम' नामकरण माना जाता है। आधुनिक रतलाम जिला मुख्यतः पूर्व रतलाम, सैलाना एवं जावरा रियासतों के भूभाग से ही बना हुआ है और धार्मिक, सांस्कृतिक एवं कलात्मक दृष्टि से संपदा सम्पन्न रहा है। यह क्षेत्र अनेक ऐतिहासिक एवं राजनैतिक घटनाओं का साक्षी रहा है। दशपुर के औलीकरों एवं धारा के परमारों के समय रतलाम जिले का अधिकांश हिस्सा राजनैतिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से उल्लेखनीय रहा था।
मध्यप्रदेश के विस्तृत भूभाग में बिखरी पुरासंपदा, स्थल, स्मारक आदि को प्रकाश में लाने के उद्देश्य से संचालनालय पुरातत्त्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय द्वारा प्रत्येक जिले का तहसीलवार ग्राम से ग्राम सर्वेक्षण कार्य करवाया जाता है। इसी तारतम्य में रतलाम जिले की 9 तहसीलों का ग्राम से ग्राम पुरातात्त्विक सर्वेक्षण कार्य सम्पन्न होकर सर्वेक्षण-प्रतिवेदनों के रूप में प्रस्तुत किया जा चुका है। इन तहसीलों का सर्वेक्षण डॉ. डी. पी. पाण्डेय (तकनीकी सहायक), डॉ. अहमद अली (तकनीकी सहायक), श्री जे. पी. शर्मा (सहायक संग्रहाध्यक्ष), श्री योगेश पाल (पर्यवेक्षक), श्री आशुतोष महाशब्दे (वरिष्ठ मार्गदर्शक) एवं श्री सुल्तान सिंह अनंत (तकनीकी सहायक) द्वारा संपादित किया गया था। इन्हीं सर्वेक्षण प्रतिवेदनों के आधार पर डॉ. रमेश यादव (पुरातत्त्वीय अधिकारी) के निर्देशन में डॉ. नवनीत कुमार जैन द्वारा प्रस्तुत पुस्तक "रतलाम जिले का पुरातत्त्व" का संकलन किया गया है। संकलन के दौरान अन्य संबंधित यथावश्यक सूचनाओं का समावेश भी पुस्तक में किया गया है।
ग्रामवार-सर्वेक्षणों पर आधारित रतलाम जिले की इस पुस्तक के माध्यम से अनेकानेक नवीनतम् पुरासंपदा एवं जानकारियाँ प्रकाश में आई हैं जो निश्चित रूप से रतलाम के साथ ही मालवा के इतिहास एवं पुरातत्त्व पुनर्लेखन में सहयोगी होंगी। इनमें प्रागैतिहासिक काल से लेकर लगभग 20वीं शती ईस्वी तक के अश्मोपकरण, प्राचीन टीले, मृद्भाण्डावशेष, मंदिर, मूर्तियाँ, स्मारक स्तंभ, छत्री, किला, गढ़ी, हवेली, महल, जलाशय, बांध, बावड़ी, कुंआ, बगीचा, मकबरा, धर्मशाला, सराय, कोल्हू, अभिलेख आदि उल्लेखनीय हैं। रतलाम जिले के इसमाईलपुरा, धरोला, सुजापुर, कोटड़ा, गुणावद आदि से पाषाणकालीन प्रस्तर उपकरणों की उपलब्धि विशेष है। थडोदा, मिण्डाखेड़ा, सिपावरा, आसिंदा, गुणावद आक्याबैनी, बन्डवा, उपलाई, केरवासा, ऊणी, खोखरा, बानीखेड़ी, नागदी, जोयन, पालनगर, मिठनगढ़ आदि ग्रामों के प्राचीन टीलों से सतह-सर्वेक्षण में ताम्राश्म युग से लेकर मध्यकाल तक की बस्तियों के प्रमाण मिले हैं। रतलाम जिले का सांस्कृतिक महत्त्व परमार काल में अधिक मुखर होता हुआ दिखाई देता है। इस जिले के धराड़, झर, बिलपांक, नेगरुन, राजापुर, गढ़ खंखाई, कुपड़ा चरपोटा, बारी, धरोला, कोटड़ा, बडौदा, पलसोड़ा, नंदलोई, जामथुन, आलमपुर ठीकरिया, गडगड़िया, बोरदा, बिलाखेड़ा, बिनोली, भैसाना, रिंगनोद, जोयन, सिपावरा, गुणावद, पंचेड आदि अनेक स्थलों से भारी संख्या में परमारकाल के मंदिरों एवं मूर्तियों के भग्नावशेष प्राप्त हुए हैं। धराड़ एवं बिलपांक के परमारकालीन शिव मंदिर राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित स्मारक भी हैं।
Hindu (हिंदू धर्म) (13523)
Tantra (तन्त्र) (1007)
Vedas (वेद) (716)
Ayurveda (आयुर्वेद) (2084)
Chaukhamba | चौखंबा (3186)
Jyotish (ज्योतिष) (1556)
Yoga (योग) (1161)
Ramayana (रामायण) (1337)
Gita Press (गीता प्रेस) (724)
Sahitya (साहित्य) (24657)
History (इतिहास) (8977)
Philosophy (दर्शन) (3615)
Santvani (सन्त वाणी) (2621)
Vedanta (वेदांत) (116)
Send as free online greeting card
Email a Friend
Visual Search
Manage Wishlist