'ब्रह्म विज्ञान' का द्वितीय संस्करण प्रस्तुत करते हुए मुझे अपार हर्ष होता है। वेदविद्या वाचस्पति पं. मधुसूदन ओझा का यह एकमात्र ग्रन्थ है जो उन्होंने बोल-बोल कर हिन्दी में लिखवाया था। प्रथम बार ओझा जी महाराज के सुपुत्र पं. प्रद्युम्न कुमार ओझा ने वि.संवत् 2000 में इसे संपादित कर प्रकाशित किया था। इसके बाद ग्रन्थ अप्राप्य हो गया। विद्यावाचस्पतिजी के ग्रन्थों की खोजबीन के दौरान जब मै उनकी पौत्री श्रीमती शान्ता देवी और पौत्र श्री पद्मलोचन से मिला तो मुझे उन्होंने बताया कि हिन्दी में लिखा हुआ उनके पूज्य दादाजी का एक ग्रन्थ "ब्रह्म विज्ञान" रतनगढ़ के राजकीय पुस्तकालय में उपलब्ध है। उन्होंने सुझाव दिया कि इस ग्रन्थ का नियमित प्रकाशन हिन्दी पाठकों के लिए किया जाए। मुझे यह सुझाव शिक्षाप्रद मालूम हुआ। इस बीच श्री किशोर कल्पनाकान्त को पत्र लिखकर रतनगढ़ के पुस्तकालय से यह ग्रन्थ मंगवाया और फोटोस्टेट कापी करके वापस लौटा दिया।
ग्रन्थ उपलब्ध होते ही पहला कदम तो यह उठाया कि 'राजस्थान पत्रिका' ने इसे धारावाहिक रूप में 'विज्ञान वार्ता' स्तम्भ में प्रकाशित करना शुरू कर दिया। बाद में समूचे ग्रन्थ का दूसरा संस्करण भी प्रकाशित करने का निर्णय किया गया। 'मानवाश्रम' में ही अन्यान्य ग्रन्थों के साथ इसे भी छपने के लिए दे दिया गया। प्रूफ देखने का काम श्री कैलाश चतुर्वेदी ने संभाला। प्रूफ देखने में सबसे बड़ा काम यह था कि बोली हुई भाषा का स्वरूप यथावत् रखा जाए। निश्चय ही ओझा जी की बोली हुई भाषा उनकी लिखित भाषा से सर्वथा भिन्न है। हमने उसके 'श्रुति' रूप को यथेष्ट महत्त्व दिया है। ग्रन्थ मुद्रण की देखभाल का दायित्व श्री प्रद्युम्नकुमार शर्मा ने लिया।
'ब्रह्म विज्ञान' वेद शास्त्र की कुञ्जी है। इसको पढ़ कर विश्व की रचना का स्वरूप अवश्य ही समझ में आएगा और यह भी समझ में आ जाएगा कि वेद का वास्तविक स्वरूप क्या है? मुझे आशा ही नहीं, अपितु पूर्ण विश्वास है कि पाठक अवश्य ही इस ग्रन्थ को पढ़कर लाभान्वित होंगे। जो लोग वेद को सीधे नहीं पढ़ सकते उनके लिए तो यह वरदान ही सिद्ध होगा।
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