भूमिका
दर्शन ग्रंथावली प्रथम खण्ड एवं द्वितीय खण्ड को अंगिका और हिन्दी साहित्य के प्रांगण में प्रस्तुत करते हुए अपार हर्ष का अनुभव हो रहा है। पूज्य पिताजी पं. याला प्रसाद दुबे ने मृत्यु के कुछ समय पूर्व उनके पास उपलब्ध दुवे की रचनाओं की पांडुलिपियों को मेरे संरक्षण में दिया। उन्होंने कहा "इन्हें छपवाने का प्रयास करना, अन्यथा काका की प्रतिमा गुमनामी में खो जायेगी।" जैसा कि दर्शन दुवे-एक परिचय में बताया गया है, मेरे और पूज्य अग्रज श्री गंगाधर दुवे जी के प्रयास से "कृष्ण लीला" का प्रकाशन 1997 में सम्भव हुआ। निकालने का हम लोगों का कोई इरादा नहीं था, अतएव भेंटरूप में पुस्तक की प्रतियों को साहित्यकारों, विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों, सगे-सम्बन्धियों एवं मित्रों के बीच बाँटी गई। एकमात्र उद्देश्य था कि स्व. दर्शन दुवे के कृतित्व को पहचान मिले। प्रकाशन-व्यय शेष कृतियों के प्रकाशन में तीन प्रमुख बाधायें थीं: 1. प्रकाशन के लिये भारी-भरकम खर्च की व्यवस्था। 2. लगभग 100 साल पुराने पांडुलिपियों को बिना किसी विशेष सुरक्षा उपाय के संजोया गया है। बिना किसी नुकसान के इन्हें कम्पोज कराना बहुत ही दुष्कर लग रहा था। 3. कम्पोज होने के बाद प्रूफ संशोधन भी समय और एकाग्रता की मांग करने वाला अत्यंत कठिन कार्य था। अपनी सेवाव निवृत्ति और कनिष्ठ पुत्री के विवाह के बाद मुझे विचार आया कि अब यदि दर्शन दुवे की रचनाओं को नहीं छपाया गया तो बहुत देर हो जायेगी। मैंने पूज्य अग्रज श्री गंगाधर दुवे के साथ इस विषय पर चर्चा की। प्रकाशन का खर्च अपनी ही जेब से वहन करने के लिये हम दोनों मानसिक रूप से तैयार हो गये। मैंने दिल्ली के प्रकाशक 'आयुष्मान पब्लिकेशन हाउस' से अपनी कविता की पुस्तक 'अनुभूति' का प्रकाशन कराया था। उसी के मालिक श्री आशीष सिंह को मैंने पांडुलिपियों का अवलोकन करने का अनुरोध किया। वे हजारीबाग आये और पांडुलिपियों को देखने के बाद कम्पोज कराने और प्रकाशन के लिये तैयार हो गये। हम दोनों के पास उपलब्ध मूल पांडुलिपि और हस्तलिखित छाया प्रतियों में से 12 रचनाओं को उन्हें उपलब्ध कराया गया, हम दोनों ने तीन-तीन बार प्रूफ संशोधन का काम किया। इस बीच पूज्य अग्रज श्री अविनाश चन्द्र दुवे अमेरिका से घर परिवार से मिलने आये। उन्होंने प्रूफ को देखा और उन्हें भी भरोसा हुआ कि दादाजी की रचनाओं का प्रकाशन अब हो जायेगा, और प्रकाशन व्यय में उदारतापूर्वक सहयोग के लिये वे भी तैयार हुए। यह अनुभव किया गया कि एक ही खण्ड में सभी रचनाओं को रखने से पुस्तक का आकार बहुत बड़ा हो जायेगा। अतः दर्शन-ग्रन्थावली को तीन भागों में प्रकाशित कराने का निर्णय लिया गया। दर्शन-ग्रन्थावली भाग-1 और भाग-2 का प्रकाशन साथ-साथ किया जा रहा है। कुछ रचनायें हमलोगों के पास उपलब्ध नहीं है, परिवार के किन्हीं अन्य सदस्यों के पास हो सकती हैं। शेष अन्य रचनाओं के उपलब्ध होने पर उन्हें भाग-3 के रूप में प्रकाशित किया जायेगा। स्व. दर्शन दुवे की मूल पांडुलिपियों से पाठकों को परिचित कराने के उद्देश्य से कुछ पांडुलिपियों के प्रथम दो पृष्ठों को कम्प्यूटर से स्कैन करके 'पिक्चर मैनेजर' से पृष्ठभूमि साफ करके प्रिंटर से निकाला गया है और कुछ पांडुलिपियों की छाया प्रति ली गई है। इन्हें सम्बन्धित ग्रंथ के अंत में संलग्न किया गया है। उनकी बहुत रचनाओं में शब्दों को लिखने की शैली आधुनिक शैली से भिन्न दिखाई पड़ती है और कम्प्यूटर में उपलब्ध नहीं है। ऐसी स्थितियों में सम्पादक द्वारा आवश्यक संशोधन किया गया है। पुनः उन्होंने 'ब' का प्रयोग न करके 'व' का प्रयोग अधिक किया है। ऐसी स्थितियों में भी आवश्यक संशोधन किया गया है। जैसे-मूल में जगदम्वा, अम्वा, विलम्व, अव आदि को जगदम्बा, अम्बा, विलम्ब, अब कर दिया गया है। फिर भी उस समय की भाषा शैली और कागज के जीर्ण होने के कारण कई जगह शब्दों/अक्षरों की अस्पष्टता के कारण अवश्य ही त्रुटियाँ रह गईहोंगी। मर्मज्ञ साहित्यकारों और सुधी पाठकों से सुझाव प्राप्त होने पर एवं उचित होने पर भविष्य के संस्करणों में सुधार किया जा सकेगा। मैं अपने पूज्य अग्रज श्री गंगाधर दुवे का विशेष आभार प्रकट करता हैं जिन्होने श्री दर्शन दुवे के काव्यों के संकलन में महत्वपूर्ण सहयोग दिया एवं टंकण के त्रुटियो के सुधार में कीमती समय दिया। हमलोग आयुष्मान पब्लिकेशन का आभार प्रकट करते हैं जिन्होंने 100 साल से भी अधिक पुराने पांडुलिपियों को अत्यंत लगन और ध्यान से कम्पोज कराया और प्रकाशन के योग्य बनाया। आशा है साहित्य जगत इस प्राचीन धरोहर को पाकर अधिक समृद्ध हो पायेगा।
पुस्तक परिचय
यह दैव दुसौग ही कहा जायेगा कि महाराज दुबे और दर्शन दुबे के जिस परिवार में बुद्धिजीवियों और कलाकारी की भरमार रही, वहीं एक महान कवि और रचनाकार दर्शन दुबे जी (1876 1912 ई) की अदभुत काव्य रचनाओं का विशाल भंडार 1997 ई. तक अप्रकाशित और इसीलिए लगभग अनजान ही रहा। महाराज दुबे के पौत्रों गंगाधर दुबे और डा. जटाधर दुबे (संपादक) के प्रयास से एक काव्य कृष्ण लीला का प्रकाशन 1997 ई. में हुआ। इस पुस्तक में दर्शन दुबेजी के अन्य अप्रकाशित लगभग 20 रचनाओं का भी जिक्र किया गया था। कृष्ण लीला के माध्यम से साहित्य जगत को दर्शन दुबेजी की प्रतिभा और योगदान की झलक मिली। उस प्रकाशन के 22 वर्ष बाद पुनः हमदोनों के प्रयास से दर्शन दुबेजी के 12 (बारह) काव्यों का प्रकाशन सफल हो रहा है। दर्शन ग्रंथावली के नाम से इन 12 काव्यों को दो भागों के सेट में प्रकाशित किया जा रहा है। 100 वर्ष से भी अधिक पुराने पांडुलिपियों का टंकण सही सही हुआ है, इसका दावा हम नहीं कर सकते। पुराने कागज पर कहीं अक्षर तो कहीं वर्तनी विलोपित हो जाने के कारण अपने स्वल्प बुद्धि से हमलोगों ने उसे सुधारने का प्रयास किया है। अतः सुधी पाठकों से अनुरोध है कि जहाँ भी उन्हें त्रुटियों का अंदेशा लगे, मुझे अवश्य सूचित करें। मैंने दर्शन दुबेजी की सभी रचनाओं को काव्य ही कहा है, सूक्ष्म वर्गीकरण (काव्य / खण्ड काव्य आदि) विद्वान समीक्षक करें। दर्शन दुबेजी की रचनाओं की चर्चा विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में होती रही है।
लेखक परिचय
डॉ. जटाधर दुवे स्व. बाला प्रसाद दुवे के कनिष्ठ पुत्र। एम. एस. सी. (भौतिकी). पी.एचडी.। विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग, से भौतिकी विभागाध्यक्ष के पद से 2011 में सेवानिवृत्त। भौतिकी में कई शोधार्थियों का सफल निर्देशन, अनेकों शोध पत्र प्रकाशित, कई पुस्तकों का प्रकाशन। हिन्दी एवं अंगिका साहित्य में विशेष अभिरुचि। हिन्दी में एक कविता संग्रह 'अनुभूति' प्रकाशित। हिन्दी एवं अंगिका में अनेक पत्र-पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन। अखिल भारतीय अंगिका साहित्य कला मंच, झारखण्ड प्रदेश द्वारा "अंग विभूति" उपाधि से सम्मानित।
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