प्राक्कथन
हिंदी सिनेमा न केवल भारत के सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक यथार्थ का प्रतिनिधि माध्यम है, बल्कि यह उपनिवेशोत्तर भारतीय पहचान के निर्माण में भी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता आया है। यह पुस्तक सिनेमा के अर्थ, स्वरूप, निर्माण प्रक्रिया एवं सौंदर्यबोध को स्पष्ट करते हुए हिंदी सिनेमा की व्यावसायिक संरचना, ऐतिहासिक विकास एवं क्षेत्रीय सिनेमा की विविधताओं की व्याख्या करती है। साथ ही इसमें चयनित फ़िल्मों की विभिन्न दृष्टिकोणों से समीक्षा प्रस्तुत की गई है। इसका उद्देश्य सिनेमा को मनोरंजन के एक लोकप्रिय माध्यम से इतर सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित करना है। हिंदी सिनेमा न केवल भारत के सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक यथार्थ का प्रतिनिधि माध्यम है, बल्कि यह उपनिवेशोत्तर भारतीय पहचान के निर्माण में भी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता आया है। यह पुस्तक सिनेमा के अर्थ, स्वरूप, निर्माण प्रक्रिया एवं सौंदर्यबोध को स्पष्ट करते हुए हिंदी सिनेमा की व्यावसायिक संरचना, ऐतिहासिक विकास एवं क्षेत्रीय सिनेमा की विविधताओं की व्याख्या करती है। साथ ही इसमें चयनित फ़िल्मों की विभिन्न दृष्टिकोणों से समीक्षा प्रस्तुत की गई है। इसका उद्देश्य सिनेमा को मनोरंजन के एक लोकप्रिय माध्यम से इतर सामाजिक-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में विश्लेषित करना है। सिनेमा एक बहुआयामी कला विधा है, जिसमें कहानी, दृश्य, संवाद, संगीत, नृत्य और अभिनय सभी रचनात्मक घटकों के समन्वय से अर्थ की प्रभावी अभिव्यक्ति होती है। सिनेमा में चित्रित व्यक्तिगत संबंध, सामाजिक परिवेश, आर्थिक संरचना और राष्ट्रवाद-सभी अपने निहितार्थों के साथ एक सांस्कृतिक परिवेश रचते हैं। कला के साथ व्यवसाय का समन्वय सिनेमा में उस अंतर्विरोध को जन्म देता है जहाँ सर्जनात्मकता और आर्थिक हितों का टकराव स्वाभाविक है। इस प्रकार सिनेमा जहाँ एक ओर जन-संवाद और सामाजिक हस्तक्षेप का माध्यम है, वहीं दूसरी ओर मुनाफे और बाज़ार की शर्तों का अनुगामी भी है। आज की मल्टीप्लेक्स संस्कृति में यह द्वंद्व 'स्टार सिस्टम', 'फ़ॉर्मूला फिल्म्स' और ओटीटी प्लेटफॉर्मूस की सामग्री में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। प्रस्तुत पुस्तक में सिनेमा की आर्थिक संरचना के साथ-साथ इसकी कलात्मक स्वायत्तता और उपभोक्तावादी दबाव का विश्लेषण आलोचनात्मक ढंग से किया गया है। का स्वर बुलंद किया। साठोत्तरी काल में जहाँ इसने युवा आक्रोश को वाणी दी, वहीं नब्बे के दशक के वैश्वीकरण और नवउदारवादी दौर में यह बाज़ार के सौंदर्यशास्त्र के अनुसार ढलने लगा। समानांतर तिनेमा भी मुख्य धारा के सिनेमा के साथ चलते हुए सिनेमा को यथार्थ के समीप लाता रहा। भारत में 'राष्ट्रीय सिनेमा' के रूप में हिंदी सिनेमा को प्रस्तुत किया जाता है तो क्षेत्रीय सिनेमा भारत के भौगोलिक एवं सांस्कृतिक वैविध्य का प्रतिबिंब है। क्षेत्रीय सिनेमा में मराठी सिनेमा का यथार्थवाद, बंगाली सिनेमा की बौद्धिकता, तमिल-तेलुगू सिनेमा का राजनीतिक आग्रह, मलयालम सिनेमा की संवेदनशीलता और पंजाबी सिनेमा का सांस्कृतिक जुड़ाव हिंदी सिनेमा के लिए चुनौती भी रहा है और प्रेरणा भी। प्रस्तुत पुस्तक में 'राष्ट्रीय सिनेमा' की एकरेखीय अवधारणा को क्षेत्रीय सिनेमा की समृद्ध विरासत के साथ जोड़कर देखने का प्रयास किया गया है। पुस्तक के अंतिम भाग में कुछ चयनित फ़िल्मों- 'पूरब और पश्चिम' 'मेरा नाम जोकर' 'जंजीर' 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे' 'दंगल' और 'बॉर्डर' की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण से समीक्षा की गई है। ये फ़िल्में अपने समाज एवं समय की वैचारिक अभिव्यक्ति तो हैं ही, साथ ही भावनात्मक राष्ट्रवाद एवं नारी-मुक्ति विमर्श को भी सशक्त ढंग से उठाती हैं। इस पुस्तक का उद्देश्य केवल सिनेमा का अध्ययन करना नहीं है, बल्कि यह समझना है कि सिनेमा क्या है, क्या कहता है, कैसे कहता है और क्यों कहता है। मेरा यह प्रयास पाठको एवं विद्यार्थियों को हिंदी सिनेमा की विचारधारात्मक गहराइयों तक पहुँचाकर सिनेमा को एक जीवंत सामाजिक प्रक्रिया के रूप में देखने और समझने की दृष्टि के विस्तार में सहायक होगा, ऐसा मुझे विश्वास है। मैं गूगल एवं विकिपीडिया का विशेष रूप से आभार व्यक्त करता हूँ जहाँ उपलब्ध सूचनाओं एवं आंकड़ों का उपयोग पुस्तक में यत्र-तत्र किया गया है।
लेखक परिचय
डॉ. राजेश कुमार शिक्षा: एम.ए., एलएल.बी., नेट, पीएच.डी. (हिंदी) लेखन: 1. हिंदी वर्तनी समस्या और समाधान । 2. मनोज कुमार का सिनेमा भारत की बात सुनाता हूँ। 3. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख एवं शोध-पत्र प्रकाशित । सम्प्रति : एसोसिएट प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग, राजकीय स्नातकोत्तर महिला महाविद्यालय, रोहतक
पुस्तक परिचय
स्वातंत्र्योत्तर काल में अनेक फिल्मकार भले ही व्यावसायिक लाभ के लिए फिल्में बना रहे थे परंतु उन्होंने अपनी फिल्मों में सामाजिक सरोकारों, पारिवारिक मर्यादाओं, नैतिक आदशों एवं राष्ट्रीय भावनाओं को कथानक में अनुस्यूत किया। इसी काल में हिंदी सिनेमा ने अपना स्वर्णिम समय देखा तथा यह बहुसंख्यक लोगों के मन, वचन व कर्म का नियामक बना। इसने जनमानस में आत्मसम्मान की भावना, बुराई के प्रति घृणा, शोषण व अन्याय के प्रति आक्रोश तथा अपने अधिकार एवं लोकमर्यादा की रक्षा हेतु संघर्ष का माद्दा उत्पन्न किया है। आज जब पूंजीवादी शक्तियाँ और कॉर्पोरेट साम्राज्य कल्याणकारी राज्य के अस्तित्व पर छा रहे हैं तथा एक नया राजनीतिक-आर्थिक विकास भारतीय संस्कृति को संक्रमित कर रहा है तो हिंदी फिल्मों में सामाजिकता की प्रवृत्ति का अभाव हो गया है। व्यावसायिकता ने सार्थकता को कुचल दिया है। ऐसे में फिल्मकारों के समक्ष बहुत बड़ी चुनौती है कि वे मानवीय संवेदनाओं, मुच्यों एवं संस्कारों के साथ समकालीन तनाव एवं संत्रास को प्रभावी ढंग से किस प्रकार चित्रित करें।.... (इसी पुस्तक से)
Hindu (हिंदू धर्म) (13755)
Tantra (तन्त्र) (1013)
Vedas (वेद) (728)
Ayurveda (आयुर्वेद) (2104)
Chaukhamba | चौखंबा (3186)
Jyotish (ज्योतिष) (1569)
Yoga (योग) (1176)
Ramayana (रामायण) (1327)
Gita Press (गीता प्रेस) (720)
Sahitya (साहित्य) (24870)
History (इतिहास) (9097)
Philosophy (दर्शन) (3639)
Santvani (सन्त वाणी) (2593)
Vedanta (वेदांत) (116)
Send as free online greeting card
Email a Friend
Visual Search
Manage Wishlist