This is a historical research book. The author has cited dozens of examples to illustrate how the Yavanas perpetrated atrocities on Hindus. Thousands of temples were looted, but Hindus remained unconvinced. This book should be widely distributed to help awaken the public.
पुस्तक परिचय
इस पुस्तक में क्या है ? मंदिरों की लूट पुस्तक में लेखक ने गत् 1200 वर्षों में मज़हब के नाम पर किये गए मंदिरों के विनाश के प्रमाणों का संकलन किया है। इस पुस्तक के प्रमाणों से 'गंगा जमुनी तहजीब' के भ्रामक नारे का भी स्वयंमेव खंडन हो जाता है। जो ऐसा सोचते हैं कि इस्लाम का प्रचार-प्रसार शांतिपूर्वक हुआ, इस्लामिक आक्रांताओं के बर्बर इतिहास विषयक उनके संदेह का निवारण पूर्णतः हो जाना चाहिए। वर्तमान में कश्मीर, बांग्लादेश और पाकिस्तान आदि स्थानों पर इसी मनोवृत्ति के साक्षात् दर्शन हो रहे हैं। हिन्दू संगठन की भावना को इस पुस्तक के स्वाध्याय से बल मिलेगा। यही इस पुस्तक का उद्देश्य है। स्वर्गीय लेखक का जन्म एक मुस्लिम परिवार में हुआ था। लेखक ने जब निष्पक्ष होकर वैदिक धर्म और इस्लामिक मज़हब की मान्यताओं का अध्ययन किया तब उन्होंने स्वयं की प्रेरणा से इस्लाम त्यागकर वैदिक धर्म स्वीकार किया और आजीवन आर्यसमाज के प्रचारक के रूप में कार्य किया। इस पुस्तक से हमें लेखक के गंभीर स्वाध्याय एवं शोध के दर्शन होते हैं। लेखक से प्रेरणा लेकर अनेक सत्य के प्रति आग्रही आत्माएं धर्म मार्ग के पथिक बनें। यही ईश्वर से प्रार्थना है!
लेखक परिचय
लेखक एक मुस्लिम परिवार के थे। इनके पिता उर्दू फारसी के बड़े विद्वान थे। धर्मकोट, जिला गुरुदासपुर में मुख्य अध्यापक होकर सपरिवार वहीं रहते थे। देवप्रकाश जी का जन्म सम्वत् 1946 में हुआ। देवप्रकाश जी ने उर्दू-फारसी की शिक्षा अपने पिता से प्राप्त की। धर्मकोट में उचित शिक्षा का प्रबंध न होने के कारण देवप्रकाश जी को चित्तौड़गढ़ ननिहाल में भेज दिया। वहां उर्दू-फारसी की शिक्षा बराबर प्राप्त करते रहे। चित्तौड़गढ़ के निकट फतेहगढ़ में मिडिल स्कूल में प्रवेश करवा दिया, वहां उनका प्रेम मुन्शीराम नामक बालक से विशेष था। देवप्रकाश जी को मुंशीराम से धर्म सम्बन्धी सिद्धान्त पर अक्सर बात होती रहती थी तथा आर्य सिद्धान्तों पर भी चर्चा होती रहती तथा स्वामी दर्शनानन्द के ट्रेक्ट अक्सर पढ़ते रहते थे। एक दिवस ग्राम की गली में रहने वाली एक महिला छुरी से मछली छोल रही थी और मछली तड़फ रही थी। इस दृश्य को देखकर उनको माँस से घृणा हो गई तथा प्रतिज्ञा की कि जिन्दगी भर माँस का सेवन नहीं करूंगा तथा इसके विरुद्ध प्रचार करूंगा। देवप्रकाश जी के पिता की मृत्यु जब वह 15 वर्ष के थे, हो गई। तब उन्होंने परिवार के पालन के लिए स्वर्णकारी का कार्य आरम्भ कर दिया। यह कार्य करते हुए स्वाध्याय बराबर करते रहे। बहुत कुछ अरबी- फारसी का ज्ञान हो गया था। मगर पीछे फतेहगढ़ में मौलवी मोहम्मद अशरफ से फारसी की विशेष योग्यता प्राप्त कर ली। अमृतसर में देवप्रकाश की एक बहन रहती थी। वह अक्सर बहन से मिलने अमृतसर जाया करते थे। अमृतसर में ही आर्यसमाजियों के सम्पर्क हुआ तथा अमृतसर में निवास का प्रबन्ध कर लिया। अमृतसर में रहकर मौलवियों से अरबी सरफ-नहब को पढ़कर अरबी मन्तक और फिलसफा भी पढ़ा। इनकी अरबी की योग्यता इतनी हो गई कि मौलवी फाजिल तक के विद्यार्थियों को पढ़ा सकते थे। अब मौलवी देवप्रकाश जी की रुचि आर्यसिद्धान्तों की तरफ काफी झुक गई थी। फतेहगढ़ में भी आर्यसमाज की स्थापना हो गई थी।
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