प्रिय पाठक वृन्द !
यह ईश्वर की महान् कृपा है कि उसने संसार में जितने भी पदार्थ रचे हैं, उन सब में और सब से अद्भुत यदि कोई वस्तु रची है, तो वह है, हमारा मानव शरीर! इसी शरीर के द्वारा मनुष्य को इस लोक तथा परलोक के अनेक चमत्कारों का पता चलता है। इसीलिये हम इसे आश्चर्यों का आश्चर्य कहते हैं। निर्वाण, सुख, मोक्ष, निर्विकल्प समाधि अथवा भगवत्प्राप्ति भी जिन्हें हुई है, वह इसी शरीर के द्वारा हुई है। वर्तमान युग में भी जितने नये-नये आविष्कार दीख पड़ते हैं, वे सब इसी शरीर के पुरुषार्थ का फल हैं। योगिराज इसी के द्वारा आध्यात्मिक जगत् की अनेक ऋद्धि-सिद्धियों की प्राप्ति करते हुये मुक्ति को प्राप्त होते हैं। वे तो इस शरीर को आत्म-ज्ञान की खोज का युद्ध स्थल कहते हैं।
इस मानव शरीर की रचना ऐसी विचित्र है और इसके भीतर यन्त्र ऐसे ढङ्ग से लगे हुये हैं कि यदि उनसे प्रकृति के अनुकूल उचित काम लिया जाय, तो वे कई सौ वर्षों तक भली प्रकार कार्य करते रहें, परन्तु जिन्होंने शरीर के अवयवों की शक्ति और उनकी आवश्यकताओं को नहीं समझा, वे शीघ्र ही अपने भावी सुख और आनन्द से हाथ धो बैठते हैं।
स्वस्थ शरीर द्वारा ही मनुष्य संसार में अपना कार्य्य कुशलतापूर्वक कर सकता है। स्वस्थ मनुष्य के मन में ही उत्साह, हर्ष तथा उन्नति के भावों की तरंगे हिलोरें लिया करती हैं। किसी समाज तथा देश की उन्नति इस बात पर अधिक निर्भर है कि वहाँ की जनता स्वास्थ्यप्रद विषयों को कितना अपनाये हुए है। भारतवर्ष किसी समय इस विषय में अग्रसर था, किन्तु आज वे पूर्ववत् शिक्षायें और वे सारगर्भितभाव हमारे नवयुवकों और नवयुवतियों में नहीं भरे जाते। उन्हें इस प्रकार के ज्ञान से शून्य रखा जाता है, जिसके फलस्वरूप अनेक अबोध नवयुवक बचपन की अपनी अज्ञानता के कारण कुसंगति द्वारा प्राप्त हुये अनेक गुप्त रोगों से दुःखी होकर निराशा के समुद्र में श्वासें खीचा करते हैं। जब उन नवयुवकों को कुछ ज्ञान हो जाता है, तो वे अपने गुप्त रोगों को दूसरों पर प्रकट न करके, या तो लुक-छिप कर दवाखानों के द्वार खटखटाते रहते हैं या उस कष्टप्रद जीवन से ऊबकर आत्महत्या तक के लिये उद्यत हो जाते हैं।
अतः निराशायुक्त जीवन में पुनः आशा उत्पन्न करने के लिये, और उन्हें फिर से नीरोगी बनाने के लिये ही इस पुस्तक की रचना की है। जीवन की सब ही मौलिक आवश्यकताओं का इस प्रकार सरल तथा सरस वर्णन किया है कि यदि नवयुवकों ने एक बार भी इसे अध्ययन कर लिया, तो वे अपने जीवन को तदनुकूल बनाने में विवश होंगे और यह मेरा दृढ़ विश्वास है कि हमारे सकेंगे।
स्वास्थ्य का सारा भार खाद्य पदार्थों पर निर्भर है। शरीर में पहुँचने पर वहाँ के अवयव भोजन को दो भागों में बाँट देते हैं।
1. खाद्य पदार्थों में से कुछ तो शरीर को शक्ति देने वाला रस बन जाता है, जिससे रक्त, माँस, हड्डी मज्जा तथा ओज [वीर्य्य या रज] बनता है। यह ओज शरीर के अङ्ग प्रत्यङ्ग को सुचारू रूप से चलाता रहता है।
2. खाद्य पदार्थों का शेष भाग मल-मूत्र रूप धारण करता है। जिससे शरीर के अवयव स्वाभाविक चार भागों से बाहर फेंकते रहते हैं-
(1) फेफड़ों से-सांस के रूप में
(2) त्वचा से पसीने के रूप में
(3) गुदा से-टट्टी के रूप में
(4) मूत्रेन्द्रिय से मूत्र के रूप में
यह प्राकृतिक नियम है कि शरीर अपने को बराबर साफ रखना चाहता है। वह अपने अन्दर किसी प्रकार की गन्दगी नहीं रहने देता, क्योंकि गन्दगी अगर शरीर के अंदर किसी प्रकार से रह जाय, तो उसके कल-पुर्जे ठीक-2 काम करना छोड़ देते हैं। प्रकृति इस मल को साधारण ढंग [माँस, पसीना, मल, मूत्र रूप] से यदि बाहर न निकाल सके तो रोग के रूप में असाधारण प्रबन्ध करके अपने विकारों [मलों] को निकाल देती है, ताकि शरीर स्वच्छ हो पुनः अपना कार्य भली भाँति करने लगे।
खाद्य पदार्थों से रक्त और मल दो चीजें बनती हैं, परन्तु -
1. भोजन संबंधी अजानकारी
2. रहन-सहन की गड़बड़ी
3. ब्रह्मचर्य सेवन का अभाव
4. शारीरिक यंत्रों की दुर्बलता
के कारण शरीर में मलों का जमना स्वाभाविक है। इसे निकाल देना ही इसके दुष्प्रभाव से बचने की सबसे अच्छी रीति है। मनुष्य स्वयं तो इसे निकालते नहीं, बल्कि उसे निकालने वाली प्रकृति के मार्ग में भी अनाप-शनाप औषधि रूप रोड़े अटकाते रहते हैं, जिसके फलस्वरूप अनगिनत औषधियों और चिकित्सकों के होते हुए भी मानव जाति दुःख सागर में डूब रही है।
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