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दीक्षा की भारतीय परंपराएँ- Indian Traditions of Initiation (Set of 2 Volumes)

$34
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Specifications
Publisher: Prabhat Prakashan, Delhi
Language: Hindi
Pages: 419
Cover: HARDCOVER
9x5.5 inch
Weight 770 gm
Edition: 2009
ISBN: Vol-1: 9788173156670
HCD088
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Book Description
पुस्तक परिचय
प्रस्तुत ग्रंथ में दीक्षा के विविध स्वरूपों पर प्रकाश डालने का प्रयास किया गया है। वैदिक दीक्षा के साथ-साथ तांत्रिक दीक्षा की प्राचीन परंपराएँ अध्ययन के लिए प्रस्तुत की गई हैं, इनका परस्पर संबंध भी विचार का विषय रहा है। यद्यपि वैदिक परंपरा और तांत्रिक परंपरा दोनों एक-दूसरे की विरोधी मानी जाती हैं, परंतु दोनों परंपराओं के गंभीरतापूर्वक विश्लेषण से ज्ञात होता है कि न केवल दोनों का मूल एक है अपितु आचार-व्यवहार से भी उनमें निकटता है। इसमें मध्यकालीन संत-परंपरा में प्रचलित दीक्षा-विधियों के अध्ययन के साथ-साथ यह लक्ष्य किया गया है कि इन समस्त दीक्षा विधियों के सिद्धांत और व्यवहार परस्पर गुँथे हुए हैं। मध्यकालीन संत परंपराओं में संत कबीर व उनसे संबंधित अनेक समुदायों व संप्रदायों की दीक्षा-विधियाँ प्रमुख रही हैं। इसमें नाथ, अघोर, कबीर, बावरी पंथ एवं सरभंगी संप्रदाय आदि विभिन्न दीक्षा विधियों में कर्मकांडीय भेद होते हुए भी दीक्षा की अवधारणा और व्यवहार प्रक्रिया का मूल रूप एकता पर आधारित है। ये दीक्षा परंपराएँ स्वामी रामानुजाचार्य प्रभृति आचार्यों एवं संपूर्ण भक्ति आंदोलन से जुड़ी हैं। वस्तुतः संपूर्ण भारतीय चिंतन में दीक्षा, साधना व अध्यात्म चिंतन एवं कर्मकांड आदि के गहन ज्ञान से संपन्न यह ग्रंथ सुधी पाठकों के लिए अत्यंत ज्ञानपरक एवं संग्रहणीय है।

भारत की उदार और समन्वयवादी दृष्टि के कारण यहाँ अनेक ऐसे धर्म दीर्घकाल से फलीभूत हुए, जिनका उद्गम भारतीय नहीं है, फिर भी इनमें भारतीय दीक्षा पंरपरा का प्रत्यक्ष प्रभाव स्पष्ट दिखाई पड़ता है। सूफी साधना और चर्या अधिकांशतः भारतीय साधना और चर्या के तत्त्वों को पुनर्योजित करके बनी है। बौद्ध व जैन धर्म की दीक्षा परंपराओं के साथ-साथ पारसी, यहूदी, ईसाई और इसलाम धर्म में सूफी संप्रदाय की अनेक धार्मिक परंपराएँ प्रचलित हैं। इनके उद्गम क्षेत्र और सांस्कृतिक स्रोत भौगोलिक दृष्टि से भारत के बाहर तक विस्तृत हैं, अतएव हिंदू धर्म के समावेशी स्वरूप में इनकी गणना है। वर्तमान समय में धर्मांतरण के फलस्वरूप यद्यपि ये परंपराएँ अपने मूल स्वरूप को खोती जा रही हैं, फिर भी जो कुछ शेष हैं, उसमें दीक्षा विधि और सिद्धांत के अनेक पहलू सामने आएँगे। भारतीय अध्यात्म परंपरा का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्वरूप बौद्ध व जैन परंपराओं में विकसित हुआ है। इनकी अपनी जीवन-पद्धति, दर्शन, ईश्वर व जगत् के बारे में अपने विचार, मनुष्य और मनुष्य के शरीर व आत्मा, मन, प्रतिभा, चिंतन और कर्म के बारे में अपना विश्लेषण है। विद्वान् लेखक का विश्वास है कि इस पुस्तक में जिस एकता की बात कही गई है, वह इन परंपराओं के शोध से ही प्रमाणित होती है। यह ग्रंथ सुधी पाठकों की ज्ञान-पिपासा शांत करने में समर्थ होगा।

लेखक परिचय
जन्म : 1 जनवरी, 1962 को उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले के कटवन नामक गाँव में। शिक्षा : गोरखपुर विश्वविद्यालय से प्राचीन इतिहास, पुरातत्त्व व संस्कृति विषय में स्नातकोत्तर तथा पी-एच.डी. उपाधि। कृतित्व : भोपाल विश्वविद्यालय और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, नई दिल्ली से रिसर्च इन्वेस्टिगेटर के रूप में जुड़े रहे और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय (भोपाल) की दो शोध परियोजनाओं 'दीक्षा की वैदिक परंपराएँ' व 'दीक्षा की वैदिकेतर परंपराएँ : एक ऐतिहासिक विवेचन' के परियोजना निदेशक के रूप में महत्त्वपूर्ण कार्य। इंडियन हैरिटेज फाउंडेशन (पीटर्सबर्ग, अमेरिका) के 'इनसाइक्लोपीडिया ऑफ हिंदूइज्म' में शोध अध्येता के रूप में भी जुड़े रहे। संप्रति : जन शिक्षण संस्थान, बस्ती (उ.प्र.) (स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, भारत सरकार) में निदेशक के रूप में कार्यरत।

आभार
दीक्षा की भारतीय परंपराएँ लेखन का श्रेय स्व. प्रो. विद्यानिवास मिश्र (वाराणसी), व प्रो. वागीश शुक्ल (दिल्ली) को है, जिन्होंने दीक्षा' जैसे दुरूह विषय पर न केवल काम करने की प्रेरणा दी अपितु उस पर काम करने की शोध दृष्टि भी दी जिसके फलस्वरूप दीक्षा के उत्स प्रायः सभी धर्म-परंपराओं में मिले और यह ग्रंथ इतना विशद हो गया कि इसे दो खंडों में रखना पड़ा 'वैदिक परंपरा में दीक्षा' और 'अन्य परंपरा में दीक्षा'। प्रस्तुत पुस्तक 'दीक्षा की भारतीय परंपराएँ' इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, शामला हिल्स, भोपाल की शोध परियोजना के अंतर्गत प्रस्तुत शोध प्रबंध है, जिसे संग्रहालय के तत्कालीन निदेशक डॉ. कल्याण कुमार चक्रवर्ती ने स्वीकृत किया और इसके प्रकाशन का श्रेय प्रो. किशोर के वाशा, निदेशक, इंदिरा गांधी, राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, भोपाल, को है। साथ ही मैं संग्रहालय के श्री अशोक कुमार तिवारी व श्री सुधीर श्रीवास्तव का हृदय से आभारी हूँ। लेखन कार्य के लिए दीक्षा से जुड़े विभिन्न धर्म-संप्रदायों के अनेक मठों, मंदिरों के आचार्यों तथा विद्वानों का उदार सहयोग रहा है। उनमें श्री अभिलाष दास (इलाहाबाद), संत विचारदास (मगहर), महंत अवैद्यनाथ (गोरखनाथ पीठ), श्री खुदीराम साहब (गोरखपुर), बाबा सिद्धार्थगौतम (क्रीं कुंड काशी), योगी कौशलेंद्रनाथ (देवीपाटन पीठ), श्री विंदेश्वरी शुक्ल (अयोध्या), प्रो. कैलाश नाथ त्रिपाठी (भोपाल), प्रो. रविनाथ मिश्र (गोरखपुर), डॉ. गणेश शुक्ल (कुशीनगर), डॉ. ईश्वर शरण विश्वकर्मा (गोरखपुर), डॉ. रविकेश मिश्र (बगहा), श्री सरस्वती प्रसाद शुक्ल चंचल आदि मुख्य हैं।

भूमिका
भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में व्यक्ति, संस्था, धर्म व समाज के अंतर्संबंधों के विकास की प्रक्रियाओं की स्थापना हेतु प्राचीन ऋषियों, मनीषियों, आचार्य प्रवरों ने दीक्षा परंपरा का प्रणयन किया। वैदिक परंपरा में यज्ञ को अधिक महत्त्व दिया जाता था। जिसके विभिन्न विधानों में भाग लेने के लिए पहले यजमान को दीक्षा देकर उसे उसके अनुकूल व योग्य बनाया जाता था, जिससे वह यज्ञ कर्म में सुचारू रूप से प्रवृत्त हो सके। इसी प्रकार बौद्ध परंपराओं एवं तांत्रिक संप्रदायों में भी जिस प्रक्रिया का अनुपालन किया जाता था, उसे दीक्षा कहा गया है। मध्ययुगीन तथा संत संप्रदाय एवं अन्य संप्रदायों की अपनी परंपरा में सम्मिलित होने की प्रक्रिया दीक्षा के अंतर्गत आती है। प्राचीन शास्त्रीय परंपरा में आध्यात्मिक जीवन-पथ को आलोकित करने के लिए 'दीक्षा' ग्रहण करना अनिवार्य बताया गया है। जिस प्रक्रिया द्वारा समर्थ गुरु अपने शिष्य को आध्यात्मिक ज्ञान-मार्ग की ओर प्रवृत्त करता है, उसे दीक्षा कहते हैं। कुलार्णव तंत्र में कहा गया है-विमल ज्ञान प्राप्ति और कर्मवासना का क्षय, जब तक दोनों संपन्न नहीं होते, तब तक दीक्षा की वास्तविक सार्थकता सिद्ध नहीं होती। दीक्षा वह साधन है जिससे मनुष्य की वासनाओं का क्षय होता है और शिवत्व की प्राप्ति होती है। शास्त्रों के अनुसार-जीव दीक्षेतर किसी अन्य उपाय से अपने पौरुष अज्ञान से मुक्त नहीं हो सकता एवं यह भी सत्य है कि बिना पौरुष अज्ञान निवृत्त हुए शिव रूपी जीव की शिवत्व में प्रतिष्ठा असंभव है।

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