लेखक परिचय
श्री रघुनाथसिंह भाटी के घर में 10 दिसम्बर, 1952, नोख, जैसलमेर (राजस्थान) में जन्मे आईदानसिंह भाटी राजस्थानी के लब्ध प्रतिष्ठित कवि, आलोचक और कथाकार हैं। जोधपुर विश्वविद्यालय में स्नातक स्तर पर ही उन्हें हिन्दी के मूर्धन्य विद्वानों से पढ़ने का अवसर मिला जिनमें आचार्य नामवर सिंह, प्रो. मैनेजर पाण्डेय, प्रो. विमलचन्द्र सिंह प्रमुख हैं। हिन्दी (सौन्दर्यशास्त्र) में एम.ए. करने के बाद आपने जोधपुर विश्वविद्यालय से ही प्रो. विमलचन्द्र सिंह के निर्देशन में 'नई कविता के प्रबन्ध : वस्तु और शिल्प' विषय पर पीएच.डी. प्राप्त की। पिछले 30 वर्षों से राजस्थान के विभिन्न कॉलेजों में अध्यापन का कार्य करने वाले डॉ. भाटी की रचनाएँ श्रुति परम्परा में उनकी प्रतिष्ठा का आधार रही हैं। 'थार की गौरवगाथाएँ' और 'राजस्थान की सांस्कृतिक कथाएँ' उनकी हिन्दी की ऐतिहासिक कथा पुस्तकें हैं तो 'शौर्य-पथ' हिन्दी का सांस्कृतिक-ऐतिहासिक उपन्यास। 'समकालीन साहित्य और आलोचना', उनकी आलोचना कृति है। डॉ. भाटी ने गांधीजी री आत्मकथा (साहित्य अकादेमी नई दिल्ली से पुरस्कृत) रवीन्द्रनाथ री कवितावां तथा युजिन ऑईनेस्को की नाट्यकृति राइनोसोर्स का राजस्थानी में 'गैंडों' शीर्षक से अनुवाद भी किये हैं। इन्होंने साक्षरता के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया है और राष्ट्रीय साक्षरता कार्यक्रम के वे संदर्भ व्यक्ति हैं। 'बैरंग लिफाफा' नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित उनकी लोकप्रिय साक्षरता कृति है। उनकी कृति 'आँख हींयै रा हरियल सपना' साहित्य अकादमी, नई दिल्ली और राजस्थानी भाषा, साहित्य अर संस्कृति अकादमी के सर्वोच्च पुरस्कार से सम्मानित हो चुकी है।
पुस्तक परिचय
आईदानसिंह भाटी की कविताएँ अपने लोकधर्मी चरित्र के कारण अपनी निजी पहचान बनाती हैं। उनके कविता संग्रह 'आँख हींयै रा हरियल सपना' के पचमढ़ी में लोकार्पित समारोह में सुप्रसिद्ध आलोचक डॉ. नामवरसिंह जी ने मेरी इसी बात का जैसे समर्थन किया था- 'भाषा हमारी आत्मा है, हमारा हथियार है, माध्यम है, इसलिए भाषा से ही परम्परा बोध मिलता है और भाषा ही प्रतिरोध को जन्म देती है। हमारी लोक भाषाओं ने इस सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण कार्य किया है..... आईदानसिंह भाटी की कविताओं में मुझे लोकभाषा के इसी सार्थक व प्रतिरोधी रूप की झलक मिलती है। वे स्थानिकता परम्परा और प्रतिरोध के सौन्दर्य बोध के कवि हैं।' डॉ. भाटी की कविताएँ अपने जनवादी तेवर और देशजता के कारण अलग से पहचानी जा सकती है। स्वप्न और सच्चाई का टकराव इनकी कविताओं में पग-पग पर प्रत्यक्ष है- "मेरी कविता / खाटी खोदे / रेत उलीचे जूंणें भुगते / सुबह शाम की डांडी नापे जै जैकारों और प्रचारों की आंधी में सपने बोए रंग सावणिया।" 'जलते मरुथल में दाझे पाँवों से' की कविताओं में कवि ने वैश्वीकरण और बाजारवाद के विरुद्ध स्थानीयता और आंचलिकता को खड़ा किया है। पूँजी और तकनीक के दो पाटों के बीच पिसते मनुष्य को बचाना ही इन कविताओं का मुख्य सरोकार है। ऐसे कठिन समय में जबकि कविता लिखना एक मुश्किल काम है
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