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ज्ञानगंज: Jnanaganj

पुस्तक के विषय में

अनादिकाल से हिमालय का सम्पूर्ण क्षेत्र भारतीय सन्तों के लिए तपोभूमि रहा है। प्राचीनकाल के ऋषिमुनि से लेकर आधुनिक काल के अनेक संत-योगी हिमालय के विभिन्न क्षेत्रों में तपस्या करते रहे । आधुनिक काल के संतों में महात्मा तैलंग स्वामी लोकनाथ ब्रह्मचारी, हितलाल मिश्र, राम ठाकुर, सदानन्द सरस्वती, प्रभुपाद विजयकृष्ण गोस्वामी, स्वामी विशुद्धानन्द, श्यामाचरण लाहिड़ी, कुलदानन्द आदि हिमालय के विभिन्न क्षेत्रों में आध्यात्मिक साधना करते रहे।

श्रद्धेय कविराजजी ने अपने एक लेख में लिखा है कि सिद्ध पुरुष जिस स्थान पर बैठकर योग-साधना करते हैं वह स्थान सिद्धभूमि बन जाता है । सिद्धभूमि सिद्ध पुरुष के नाम के अनुसार अथवा अन्य किसी प्रकार के नियम के अधीन विभिन्न नाम और रूप लेकर श्री भगवान् की विश्वलीला में अपना- अपना काम करती हैं । प्रसिद्ध है दत्तात्रेय, अगस्ति, वशिष्ठ, विश्वामित्र आदि ऋषिवर्ग अपने अपने सिद्धाश्रम स्थापित करके ज्ञान-विज्ञान का प्रचार करते रहे । जो महापुरुष सिद्धि प्राप्त कर आधिकारिक अवस्था-लाभ करते हैं, वे ही इन सभी सिद्धभूमियों के अधिष्ठाता होते हैं । जिनमें अधिकार-वासना नहीं है, वे सिद्धभूमि में रहते हुए भी न रहने के समान हैं अथवा वे सिद्धभूमि के ऊर्ध्व में रहते हैं । जिस प्रकार सिद्धपुरुष चित् और अचित् कार्य और कारण, शुद्ध और अशुद्ध एवं स्थूल और सूक्ष्म सभी अवस्था में अव्याहत रहते हैं तथा अपने वैशिष्ट्य का संरक्षण कर सकते हैं, उसी प्रकार ये बातें सिद्धभूमि पर भी लागू होती हैं । देह सिद्ध करने के पश्चात् भूमि को सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती। क्योंकि देह-सिद्धि होने पर उसी प्रकार भूमि-सिद्धि हो जाती है। इससे स्पष्ट है कि सिद्ध आत्मा की इच्छानुसार तथाकथित सिद्धभूमि का आविर्भाव होता है।

कविराजजी के कथनानुसार न केवल हिमालय में, बल्कि भारत के अनेक प्रान्तों में ऐसी सिद्ध भूमियाँ हैं, जहाँ साधक योग-साधना करते रहे। हिमालय में सिद्ध भूमियों की संख्या अधिक अवश्य है।

इसी हिमालय में तिब्बत नामक एक रहस्यमय प्रदेश है । कविराजजी के कथनानुसार यहाँ अनेक ऐसे मठ और आश्रम हैं जिनके बारे में सभ्य जगत् को जानकारी नहीं है। वे सामान्य पर्यटकों के निकट अलक्ष्य रहते हैं। इन आश्रमों में योग कै साथ-साथ विज्ञान की शिक्षा दी जाती है। केवल उच्चकोटि के लोग इन मठों में प्रवेश पाते हैं।

अप्रैल1959 के दिनों परमपावन दलाई लामा जब तिब्बत से पलायन कर भारत आ रहे थे, उन दिनों डन पंक्तियों के लेखक से कविराजजी इसी विषय पर चर्चा करते रहे। चर्चा के दौरान ज्ञानगंज के अलावा एक घटना का जिक्र किया था।

द्वितीय महायुद्ध के समय दो जर्मन पर्यटक गिरफ्तारी के भय से नेपाल के रास्ते तिब्बत की ओर भाग गये थे । वहाँ वे एक ऐसे मठ में थे जहाँ सभ्य जगत् की सारी सुविधाएँ उपलब्ध थीं। युद्ध समाप्त होने के काफी दिनों बाद वे पैदल भारत की ओर रवाना हुए । मार्ग भूलकर बर्मा जा पहुँचे। इनकी रामकहानी सुनकर लोग चकित रह गये । हिमालय जैसे क्षेत्र में विज्ञान ने इतनी उन्नति की है इसकी जानकारी संसार को नहीं है । लोगों ने उनकी बातों पर विश्वास नहीं किया।

जब दोनों पर्यटकों ने यह कहा कि अगर आप लोग मेरे साथ चलें तो मैं वहाँ ले जाकर यह सब दिखा सकता हूँ । तब कई लोग राजी हो गये । दोनों जर्मन ठीक उसी स्थान पर आये जहाँ वे कई वर्षो तक थे । लेकिन उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि मठ वहाँ नहीं है । वही पर्वत-शिखर है, वही वृक्ष-समूह है जहाँ वे बैठकर घण्टों बातें करते रहे । वही झरना है जहाँ वे स्नान करते थे, पर वह विशाल मठ नहीं है, जहाँ वे सभ्य जगत् की सारी सुविधाओं का भोग करते रहे।

काफी दिनों बाद इस घटना का विवरण मैंने किसी पत्र या पत्रिका में पढ़ा था । कर्नल आलकट के साथ भी इसी प्रकार की एक घटना बम्बई में हुई थी जिसका जिक्र उन्होंने अपनी पुस्तक ' ओल्ड डायरी लेवेस'में किया है।

कर्नल आलकट थियोसाफिस्ट संस्था की संस्थापिका मादाम ब्लावाट्स्की के साथ एक फिटन पर घूमने निकले थे। अचानक एक स्थान पर मादाम ब्लावाट्स्की ने गाड़ी रोकने की आज्ञा दी । कर्नल से उन्होंने कहा-''आप गाड़ी पर इन्तजार करें । मैं मठ से तुरन्त आ रही हूँ ।''

आलकट ने देखा-सामने एक बड़ा मठ है । मादाम ब्लावाट्स्की मठ के फाटक के रास्ते से भीतर चली गयीं । थोड़ी देर बाद मालाएँ लेकर बाहर निकलीं । एक माला उन्होंने कर्नल को दी ।

दूसरे दिन आलकट घूमने के लिए अकेले निकल पड़े । कुछ दूर आने के बाद उन्होंने देखा कि कल का फिटनवाला कोचवान चला आ रहा है । उससे आलकट ने कहा' ' कल हमें जहाँ ले गये थे, क्या वहाँ चल सकते हो?''

गाड़ीवान राजी हो गया । निश्चित स्थान पर आकर आलकट ने देखा-वहाँ मठ नहीं था । सामने एक बाग है जहाँ दो माली घास खोद रहे थे । पास जाकर उन्होंने प्रश्न किया । भाषा न समझ पाने के कारण मालियों ने कोई जवाब नहीं दिया । वापस लौटकर उन्होंने गाड़ीवान से पूछा कि क्या कल तुम यहीं हमें लाये थे? आखिर वह मठ कहाँ गायब हो गया?

गाड़ीवान ने कहा-'' यहाँ मठ कहाँ था? मैं इधर अक्सर गाड़ी लेकर आता हूँ । सामने के बाग के अलावा यहाँ कुछ भी नहीं है । आपको भ्रम हो गया है ।''

इसी प्रकार की एक घटना का जिक्र केदार नामक एक अद्भुत बालक' ने कविराजजी से किया था।

''एक दिन शाम के पहले एक दिव्य पुरुष केदार के निकट आये और कहा कि कल अपरह्राण में चार बजे अमुक स्थान में आकर भेंट करना। आगन्तुक एक महापुरुष का सन्देश-वाहक था । मार्ग के बारे में पूछने पर आगन्तुक ने कहा-चौक के रास्ते तुम विश्वेश्वरगंज तक चले आना। आगे का रास्ता वहीं से मालूम हो जायगा। पूछने की जरूरत नहीं पड़ेगी।''

''दूसरे दिन केदार चार बजे एक साइकिल लेकर रवाना हुआ। साथ में और कोई नहीं था । विश्वेश्वरगंज तक रास्ता पकड़कर आया । यहाँ आने पर उसने देखा- सामने एक बड़ा मैदान है । इस मैदान को उसने कभी देखा नहीं था, किन्तु इस वक्त उसके मन में यह बात उत्पन्न नहीं हुई। उसने देखा-विश्वश्वरगंज से एक रास्ता मैदान की ओर बीचोबीच गया है। रास्ते के दोनों ओर जोते हुए खेत और विविध प्रकार के दृश्य सुशोभित हैं। मैदान के बीच में एक विशाल पत्थर था । उस पत्थर पर एक महापुरुष बैठे थे । केदार उनके दर्शन से समझ गया कि इन्होंने बुलाया है। इन्हीं के निकट मुझे जाना है। साइकिल से उतरकर वह पैदल यथास्थान पहुँचा । जूता-साइकिल रखने के बाद उक्त महापुरुष के पास पहुँचा। कुछ देर तक गोपनीय बात कहने के बाद महापुरुष ने कहा-' केदार, अब तुम अपने घर जाओ। तुम्हारे लिए तुम्हारी माँ चिन्तित हो रही हैं। 'इतना कहकर उन्होंने सामने की ओर थोड़ा हाथ बढ़ा दिया। साथ ही साथ दूरत्व दूर हो गया। केदार ने स्पष्ट रूप से अपना घर, माँ, बहन आदि को देखा। उनकी बातचीत सुनी । केदार ने पूछा कि इस वक्त हम लोग कहाँ हैं? महापुरुष ने कहा-' इस वक्त हम ऐसे स्थान पर हैं जहाँ से विश्व का प्रत्येक स्थान अत्यन्त सन्निकट दिखाई देता हें ।' यह कहकर उन्होंने हाथ हिलाया और सारा दृश्य गायब हो गया ।

केदार ने महात्माजी को प्रणाम किया और इसके बाद साइकिल उठाकर पहले वाले रास्ते पर चलने लगा। उसे विश्वास था कि इस मैदान को पार करते ही वह विश्वरगंज पहुँच जायगा । किन्तु ऐसा नहीं हुआ। रास्ता समाप्त होने के साथ ही उसने रखा कि वह इलाहाबाद रोड पर खड़ा है। पास ही सन्त कबीर का जन्मस्थान लहरतारा मैं और मठ है । विश्वेश्वरगंज से यह स्थान तीन मील दूर है । यह कैसे हुआ, वह समझ प्र यका । वह गया था पूर्व की ओर, मगर लौटा पश्चिम की ओर ।''

इस घटना का वर्णन केदार ने कविराजजी से दूसरे ही दिन किया था । इसके बाद केदार कई बार उक्त महापुरुष से मिला। मिलने का स्थान वही था, पर लौटने का भिन्न-भिन्न था।

''सिद्धभूमि की यही विशेषता है कि वह सदा और सर्वत्र ही अपने रूप में स्थित रहती है । वह जागतिक विचार से लौकिक प्रतीत होने पर भी वास्तव में अत्यन्त अलौकिक है । वह अखण्ड और अविभाज्य है । उसके अंश नहीं होते एवं सिद्ध पुरुष की इच्छानुसार अंशरूप में प्रतीत होने पर भी वह समग्र अखण्ड ही रहती है। यदि उस भूमि के अधिष्ठाता पुरुष किसी को आकृष्ट करने की इच्छा करें अथवा दर्शन देने के लिए उत्सुक हों तो लौकिक जगत् में जिस किसी स्थान से वह प्राप्त हो जाती है वह स्थूल नहीं है, सूक्ष्म भी नहीं है जबकि एक साथ ही स्थूल और सूक्ष्म दोनों ही है।'' उपर्युक्त तीनों घटनाओं के विवरण और बाद में सिद्धभूमि की व्याख्या देने का उद्देश्य यह है कि दोनों जर्मन पर्यटकों पर मठ के सन्तों ने कृपा की और उन्हें कई वर्षो तक रखा, उनका पालन-पोषण किया; किन्तु जब वे बर्मा से अन्य पर्यटकों को लेकर वापस आये तो उन सभी को दर्शन देने की इच्छा नहीं हुई तब वे अलक्ष्य हो गये। यही स्थिति कर्नल आलकट के साथ हुई।

केदार अलौकिक शक्ति लेकर पृथ्वी पर आया था। उसे मार्ग-दर्शन की आवश्यकता थी। महापुरुष उसे अपने पास बार-बार इसीलिए बुलाते रहै, परन्तु वे यह नहीं चाहते थे कि केदार अपने साथ अन्य लोगों को लाये। यही कारण है कि वह हर बार वापस लौटते समय अपने को भिन्न स्थानों में पाता था। इसी प्रकार ज्ञानगंज स्थूल भी है और सूक्ष्म भी है।

इस पुस्तक के प्रथम अध्याय में कविराजजी ने ज्ञानगंज के बारे में विस्तार से स्थूल परिचय दिया है। अपने गुरुदेव की जीवनी में उन्होंने यह बताया है कि वर्धमान में रहते समय जब कुत्ते ने उन्हें काटा तब परमहंस नीमानन्द ने उनकी जीवन-रक्षा की थी । बाद में ढाका से उन्हें तथा उनके सहपाठी हरिपद को अपने साथ लेकर ज्ञानगंज ले आये थे । उन दिनों विशुद्धानन्दजी की उम्र14 वर्ष की थी । ज्ञानगंज में विशुद्धानन्दजी लगभग20 वर्ष तक योग और विज्ञान की शिक्षा ग्रहण करते रहे । महर्षि महातपा ने उन्हें शिष्य बनाकर शक्ति-संचार किया था । परमहंस श्यामानन्द सूर्य-विज्ञान और परमहंस भृंगुराम योग की शिक्षा देते रहे ।'

ज्ञानगंज में प्रथम बार पहुँचने पर विशुद्धानन्दजी ने जो दृश्य देखा, उसका वर्णन विस्तार से इस पुस्तक में है। प्राकृतिक परिवेश, आश्रम के निवासियों का परिचय, परमगुरु महातपा के निवास-स्थान के बोर में, दीक्षा की घटना आदि। इन बातों से यह स्पष्ट है कि ज्ञानगंज नामक स्थान स्थूल रूप से तिब्बत के किसी विशेष स्थान पर है। यहाँ साधारण व्यक्ति नहीं पहुँच पाते । केवल योगैश्वर्यसम्पन्न योगी या उच्चकोटि के साधक ही जा सकते हैं।

कविराजजी जो कि स्वयं ज्ञानगंज के चमत्कारों को प्रत्यक्ष रूप से देख चुके थे, फिर भी इस पुस्तक में उन्होंने उसका परिचय सर्वत्र सूक्ष्म रूप से दिया है । एक जगह आप लिखते हैं-' ' कहा जाता है कि ज्ञानगंज हमारी इस परिचित पृथिवी पर एक विशेष गुप्त स्थान है । किन्तु वह इतना गुप्त है कि विशिष्ट शक्ति के विकास न होने से तथा उस स्थान के अधिष्ठाता की आज्ञा न होने से मर्त्यलोक के जीव को दिखाई नहीं देता । प्रत्येक सिद्धभूमि की यही विशेषता है म् पारमार्थिक ज्ञानगंज का पता जानना सभी के लिए सम्भव नहीं है । कुछ लोगों को ज्ञानगंज का पता चल गया है, ऐसा सुनने में आता है। वह व्यावहारिक ज्ञानगंज से संश्लिष्ट समझना चाहिए ।''

पूज्यपाद विशुद्धानन्दजी कविराजजी तथा अपने अनेक शिष्यों के सामने ज्ञानगंज के बारे में चर्चा करते थे । शिष्यों के प्रश्नों के उत्तर भी देते थे । यहाँ तक कि काशी के मलदहिया मुहल्ले में स्थित विशुद्धानन्द कानन में कई चमत्कारों का प्रदर्शन कर चुके थे जिसे कविराजजी के अलावा अन्य अनेक शिष्यों ने देखा था । इन घटनाओं का जिक्र करते हुए कविराजजी ने लिखा है-

'बाबा कहा करते थे कि ज्ञानगंज के साथ कहीं से भी सम्पर्क स्थापित किया जा सकता है। यह सूर्य-विज्ञान से सम्भव है । दवा या किसी प्रकार का यंत्रादि वहाँ से मँगाया जा सकता है। यहाँ तक कि कुमारी या माताओं के लिए कपड़ा और अन्य सामग्रियाँ उपयोग के लिए ज्ञानगंज से आश्रमवासी उनकी इच्छानुसार भेज देते हैं।''

इस बारे में बाबा के घनिष्ट शिष्य और भक्त सभी बातें जानते हैं । लेकिन उसका रहस्य जानने में अक्षम थे । एक दिन मेरे सामने एक घटना हुई थी । मेरे एक गुरुभाई श्री सुरेन्द्रनाथ मुखर्जी ज्ञानगंज की कुमारियों के लिए ५० रंगीन साड़ियाँ लाये । छोटी-बड़ी साड़ियों का पार्सल बनाकर ज्ञानगंज भेजने के लिए पूजाघर में रख आये ।

मैंने बाबा से पूछा-' क्या आप इन साड़ियों को ज्ञानगंज भेजेंगे?'

बाबा ने कहा-' हों।'

मुझे अपार कौतूहल हुआ । मैंने पूछा-' कैसे भेजेंगे?'

उन्होंने कहा-' इसी रूप में भेज दूँगा । तुम लोग जरा बैठो तब समझ पाओगे ।' इतना कहने के बाद उन्होंने पूजाघर का दरवाजा बन्द कर दिया ।

आधा घण्टा बाद दरवाजा खुलने पर हम लोगों ने भीतर प्रवेश किया । उन्होंने कहा-' देखो, कपड़ों के सभी बण्डलों को ज्ञानगंज भेज दिया ।'

हमलोगों ने साश्चर्य देखा-घर के भीतर कपड़ों के सभी बण्डल गायब थे ।

काशी में मलदहिया स्थित विशुद्धानन्द कानन आश्रम में विज्ञान मन्दिर या सूर्य मन्दिर है । वहाँ दो तल्ले पर बैठे किसी उत्सव के उपलक्ष्य में उपस्थित शिष्यों को समझा रहे थे । ठीक इसी समय मेरे एक गुरुभाई, कलकत्ता निवासी श्री अक्षयकुमार दत्तगुप्त आये । इन्हें सूर्य विज्ञान सीखने की इच्छा बहुत दिनों से है। उन्होंने बाबा से एक लेन्स देने की प्रार्थना की ।

बाबा ने कहा-' लेन्स के लिए ज्ञानगंज से प्रार्थना करूँगा, शायद मिल भी जाय । अगर तुम्हारी तीव्र इच्छा हो तो अभी लेन्स के लिए प्रार्थना करूँ?'

दत्तगुप्त ने कहा-' अगर इस समय मिल जाय तो अच्छा हो । सब आपकी कृपा है।'

बाबा कुछ देर चुप रहे, फिर एक झटका दिया । उनके हाथ में एक लेन्स आ गया। उन्होंने कहा-'तुमने यही लेन्स माँगा था ।' कहकर उन्होंने लेन्स दे दिया ।

सन्1931 ई० में मलदहिया स्थित आश्रम में' नवमुण्डी माँ' की प्रतिष्ठा हुई । इस नवमुण्डी की सजावट की जिम्मेदारी कई भक्तों को दी गयी थी । मेरे गुरुभाई डॉक्टर शोभाराम के जिम्मे सारी जिम्मेदारी दे दी गयी थी । फर्श पर बिछाने के लिए सिल्क की चार चादरों की जिम्मेदारी मुझे दी गयी थी जिसकी कीमत80 रुपये थी । डॉक्टर शोभाराम के जिम्मे को दस-दस रुपये के आठ नोट देने के लिए मैं आश्रम में गया । उस समय तीसरा पहर था । कई गुरुभाई वहां बैठे थे । डॉक्टर शोभाराम भी थे । मेरी इच्छा हुई कि रुपयों का लिफाफा बाबा के हाथ में दे दूं । बाद में बाबा इस लिफाफे को डॉक्टर शोभाराम को दे देंगे। यह सोचकर मैंने लिफाफा बाबा को दिया।

मेरी बगल में डॉक्टर शोभाराम बैठे थे। मैंने कहा-'नवमुण्डी आसन के फर्श पर बिछाने के लिए चादरों के अस्सी रुपये हैं ।'

बाबा ने कहा-' एक चादर की कीमत अस्सी रुपये? इतनी महँगी?'

डॉक्टर शोभाराम ने कहा-' बीस रुपये की दर से चार चादरों का अस्सी रुपये भाव तय कर आया हूँ ।'

बाबा ने कहा-' बड़े महँगे हैं । इतने चादर क्या होंगे? एक काफी है ।' इतना कहने के बाद दस-दस रुपये के दो नोट निकालकर उन्होंने शोभाराम को दिये । शेष रकम मुझे वापस करते हुए बोले-' रुपयों का अपव्यय नहीं करना चाहिए ।'

मैंने कहा-' ये रुपये सत्कार्य के लिए ले आया था, अतएव वापस ले जाने की इच्छा नहीं है । अन्य किसी धार्मिक कार्य में लगा दीजिएगा ।'

बाबा ने कहा-' ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि ज्ञानगंज से प्रतिवाद किया जायगा । अतएव ज्ञानगंज से आदेश और राय लेनी होगी ।' इतना कहकर वे भीतर गये और कुछ देर बाद वापस आकर बोले-' ठीक है, ये रुपये उमा भैरवी ज्ञानगंज के लिए ले जायेंगी।'

मैंने कहा-' तब इन रुपयों को आप ही दे दीजिएगा।'

बाबा ने कहा-' ना-ना । मैं क्यों देने जाऊँगा? स्वयं भैरवी माँ तुम्हारे हाथ से ले जायँगी ।'

जाड़े के दिन थे । चादर ओढ़कर बैठा था । बाबा के आदेशानुसार रुपये के लिफाफे को मुट्ठी में कसकर पकड़े, चादर के नीचे छिपाये बैठा उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा करने लगा । इसके बाद मैंने बाबा से पूछा-' ये रुपये कितनी देर में भैरवी माता ले जायेंगी।'

बाबा ने कहा-' अभी-तुरत ।' इसके बाद बाबा ने मुझसे पूछा-' कुछ अनुभव हुआ।'

मैंने कहा-' स्पन्दन के अलावा कुछ भी अनुभव नहीं हुआ।'

उन्होंने कहा-' जरा लिफाफा खोलकर देखो ।'

मैंने चादर के नीचे से लिफाफा बाहर निकाला । देखा-जैसा बन्द था, वैसा ही है; पर उसके भीतर रुपये नहीं हैं । लिफाफे से सुगन्ध आ रही थी । इस लिफाफे को काफी दिनों तक सुरक्षित रख छोड़ा था ।

कविराजजी के इन अनुभवों से यह स्पष्ट हो जाता है कि वस्तुत: ज्ञानगंज स्थूल रूप में है, पर उसे विशिष्ट व्यक्ति देख सकते हैं । इस पुस्तक में जगह-जगह ज्ञानगंज का स्थूल रूप में वर्णन करने पर भी उन्होंने सूक्ष्म ही सिद्ध किया है ।

पूज्यपाद विशुद्धानन्दजी से उनके शिष्य यदाकदा अपने कौतूहल को मिटाने के लिए ज्ञानगंज के बारे में सवाल करते थे । बातचीत के सिलसिले में उन्होंने बताया था- ' जालंधर से गोगा तक जाने के लिए तरह-तरह की सवारियाँ मिलती हैं । इसके आगे पैदल जाना पड़ता है । लगभग दो माह पैदल चलना पड़ता है। मार्ग में कहीं-कहीं चट्टी (विश्रामस्थल) है जहाँ केवल चिउड़ा और दही मिलता है । रास्ते में बरफ पर चलना पड़ता है । कहीं-कहीं बरफ कीचड़ की तरह नरम है जिसमें पैर धँस जाते हैं । बरफ परचलने लायक एक खास किस्म के जूते मिलते हैं । बहुत कम कीमत है, साढ़े तीन आने । ज्ञानगंज में अनेक ब्रह्मचारी, दण्डी, संन्यासी, तीर्थस्वामी, परम-प्रस, भैरवी ब्रह्मचारिणी और कुमारियाँ हैं । आश्रम में सभी को जाने दिया जाता है, पर किसी बाहरी व्यक्ति को रहने नहीं दिया जाता । वहाँ दिन-रात योग-चर्चा, विज्ञान-चर्चा होती है । विज्ञान का अर्थ है-सूर्य विज्ञान, चन्द्र विज्ञान, वायु विज्ञान आदि । परमहंसगण सर्वदा विज्ञान में लगे रहते हैं । वैज्ञानिक यन्त्रों की सहायता से कठिन रोगों का इलाज किया जाता है ।'

ज्ञानगंज में निवास करने वाले लोगों के बारे में बाबा ने कहा है-' ज्ञानगंज के परमहंसों तथा भैरवी माताओं में से अधिकतर लोगों की उम्र चार-पाँच सौ वर्ष से लेकर आठ-नौ सौ वर्ष तक की है । जिन दिनों मैं वहाँ था, पूज्यपाद परमाराध्य गुरुदेव महातपा के आविर्भाव का त्रयोदश शत वार्षिक उत्सव मनाया गया । उनसे भी अधिक उम्रवाली गुरुमाता(जिन्हें वहाँ क्षेपा माता कहा जाता है) जीवित हैं । उनके सिर के बाल इतने लम्बे, काले और प्रचुर हैं कि उनका सारा बदन ढक जाता है । कपड़े की आवश्यकता नहीं होती । महातपाजी स्वयं स्थूलदेह के हैं, पर आज तक यातायात में पूर्ण समर्थ हैं । आपके एक हमउम्र भाई हैं । वे वैष्णव हैं, नाम है- भवदेव गोस्वामी । वे ज्ञानगंज या मनोहर तीर्थ में नहीं रहते । तिब्बत में अन्यत्र रहते हैं । महर्षि महातपा के शिष्यों में सबसे अधिक शक्तिशाली हैं- श्री श्री भृंगुराम परमहंस । उनकी उम्र पाँच सौ वर्ष है । वे ही मुझे योग की शिक्षा देते रहे । सूर्य विज्ञान की शिक्षा परमहंस श्री श्यामानन्द देते थे । ज्ञानगंज में विज्ञान सम्बन्धी सभी विषयों के अधिकारी हैं । ज्ञानगंज में विज्ञान द्वारा प्रस्तुत आकाशयान है जो प्रत्येक रात्रि को पूर्ण चन्द्रमा की तरह प्रकाशमान रहता है । इस ग्रह अन्य घटनाएँ हैं ।'

बाबा के अनन्य शिष्य श्री अक्षयकुमार दत्तगुप्त ने(जिन्हें बाबा ने लेन्स दिया था) लिखा है-' बचपन में एक दुर्घटना के कारण बाबा के दाहिने पैर का अँगूठा कट गया था । ज्ञानगंज में उनकी उस अँगुली को यंत्र की सहायता से ठीक कर दिया गया था। एक बार बाबा ने एक धनी मारवाड़ी तथा उसकी कन्या को ज्ञानगंज भेजा था। कन्या जवान हो गयी थी, पर उसकी छाती पर यौवन के चिह्न प्रकट नहीं हुए थे। ज्ञानगंज से वह न केवल यौवन के चिह्न लेकर आयी, बल्कि भगवती की तरह रूपवती बनकर-लौटी थी । ज्ञानगंज में बधिरता दूर करने का यंत्र है । उसे यहाँ मँगाने में दो हजार का खर्चा पड़ता है । बाबा ने एक बार कहा था कि अगर कोई धनी दानी मिल जाता तो उस यन्त्र को यहाँ मँगा लेता और अमूल्य की बधिरता दूर कर देता ।'

आगे आप लिखते हैं-' ज्ञानगंज के परमहंसों में श्री अभयानन्द स्वामी को एक बार लोगों ने वर्धमानऔर एक बार कलकत्ते के गंगा-तट पर देखा था । वर्धमान में

उनके आगमन का वर्णन वर्धमान के पुलिस इंस्पेक्टर तथा हमारे गुरुभाई उपेन्द्र चौधरी ने दिया है। विशुद्धानन्द प्रसंग' के तीसरे खण्ड में प्रकाशित है । उनका एक चित्र'योगिराजधिराज' में प्रकाशित है जैसे साक्षात् महेश्वर की मूर्ति है । सर्वश्री नीमानन्द और उपानन्द स्वामी कभी-कभी आते हैं । नीमानन्दजी वही स्वामी हैं जिन्होंने गुरुदेव को कुत्ते के काटने पर दवा दी थी और अपने साथ ज्ञानगंज ले गये थे।'

'ज्ञानगंज में एक और परमहंस हैं-स्वामी ज्ञानानन्द । इनका एक और नाम है- कुतुपानन्द । आप थियोसाफिस्ट-समाज में कुथुमी बाबा के नाम से परिचित हैं । हमारे गुरुदेव ने हमें यही बताया था । गुरुदेव के पास इनका एक पत्र है जिसमें इनके म्लेच्छ शिष्य हैं, इसका उल्लेख है। कुतुपानन्द की शिष्या मादाम ब्लावाट्स्की उन्हें कुथुमी बाबा के नाम से सम्बोधित करती थीं । शायद रूसी भाषा के कारण कुतुपानन्द बाबा कुथुमी बाबा बन गये । श्रीविशुद्धानन्द की राय में कुतुपानन्द स्वामी की उम्र लगभग पाँच-छ: सौ वर्ष होगी । ज्ञातव्य है कि स्वामी कुतुपानन्दजी को मादाम ब्लावाट्स्की तथा कर्नल आलकट देख चुके हैं ।'

'परमहंस भृंगुरामजी को श्रीयुक्त गोपीनाथ कविराज की पत्नी ने एक दिन शाम के वक्त गोपीनाथजी के पूजावाले कमरे में देखा था । उन्हें देखते ही वे बेहोश हो गयी थीं । उनके शरीर की ज्योति प्रात-सूर्य की तरह थी । बाबा का कहना था कि योग-क्रिया के कारण उनके देह के उपादान परिवर्तन क्रम के कारण इस तरह का वर्ण हो गया है । रक्तवर्ण ज्योति पिण्ड के रूप में काशी के विशुद्धानन्द कानन में, श्री परमहंस भृंगुराम को खिड़की के रास्ते बाबा के कमरे में, रात साढ़े-तीन बजे प्रवेश करते हुए हमारे गुरुभ्राता स्व० रमेश मैत्र, स्व० देवेन्द्र बनर्जी और इन दोनों की पत्नियों ने देखा था । इस घटना का विवरण मैं रमेश दादा की जबानी सुन चुका हूँ । एक बार भोर के समय स्व० विधुभूषण चटर्जी दादा को श्री भृंगुराम का दर्शन और कुछ आदेश प्राप्त हुए थे । भैरवी माताओं में से कुछ बण्डुल(वर्धमान) आश्रम तथा काशी आश्रम में आतीं थी । एक बार सन्1930 ई० में, प्रयाग के कुंभ मेला में श्री बाबा के साथ केदार भौमिक तथा अन्य कुछ लोग टहल रहे थे । इन लोगों ने दो युवतियों को देखा । इन्हें देखकर बाबा मुस्कराये। आँखों- आँखों में बातें हुई । बाद में बाबा ने बताया कि वे दोनों ज्ञानगंज की भैरवियाँ थीं ।'

' ज्ञानगंज के रहस्य को महिमा-मण्डित किया है वहाँ के परमहंस महात्माओं तथा भैरवी माताओं ने । परमहंसों में श्री श्री भृंगुराम, नीमानन्द, श्यामानन्द, ज्ञानानन्द, अभयानन्द, उमानन्द, धवलानन्द एवं परमानन्द(गोस्वामी) के नाम मुझे ज्ञात हैं । रामानन्दजी का भी नाम सुनने में आता है, पर वे परमहंस हैं या नहीं, पता नहीं । भवदेव गोस्वामी ज्ञानगंज में नहीं रहते । भैरवी माताओं में श्री श्री उमा भैरवी, श्यामा भैरवी, त्रिपुरा भैरवी, ज्ञान भैरवी, आनन्द भैरवी आदि के नाम हमने सुने हैं । इनके अलावा अन्य अनेक परमहंस और भैरवियाँ हैं । बाबा के साथ सभी परमहंसों और भैरवियों का सम्पर्क नहीं था । भृंगुराम के शिष्य उमानन्द हैं और श्यामानन्द के शिष्य हैं धवलानन्द। परमानन्द के बारे में जानकारी नहीं है । शेष लोग महर्षि महातपा के शिष्य हैं। भैरवी माताओं के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली ।'

'मनुष्य का रक्त-मांसवाला शरीर वय: क्रम के अनुसार सौ वर्ष तक पहुँच नहीं पाता । उसके पहले ही जीर्ण हो जाता है । ज्ञानगंज के परमहंस और भैरवी माताएँ इस नियम के व्यतिक्रम हैं। योग-क्रिया के कारण उनके शरीर में परिवर्तन हुए हैं । उन्हेंभोजन की आवश्यकता नहीं होती और न मलत्याग का झंझट है । जब कि शरीर में अमित शक्ति, ऋद्धि-सिद्धि अतुलनीय, .ज्ञान अप्रतिहत है । उनकी गति अबाध है । वे बिना श्रम के घर की प्राचीर को कौन कहे, उच्च पर्वत को निमिषमात्र में पार कर जाते हैं । अति दूर या निकट की कोई वस्तु उन्हें बाधा नहीं दे पाती। देश, काल उनकी गति, चिन्ता या ज्ञान के नियामक नहीं हैं ।

श्री अमूल्य बाबू के कथन से यह स्पष्ट हो जाता है कि ज्ञानगंज स्थूल रूप से तिब्बत प्रदेश में स्थित है । कविराजजी ने' ब्रह्माण्डोनो भेद' नामक गुजराती पुस्तक से उद्धरण देते हुए यह बताया है कि वहाँ विभिन्न प्रान्तों के लोग गये थे । इस पुस्तक में श्री राम ठाकुर से हुई बातचीत का पूर्ण विवरण प्रकाशित है । श्री ठाकुर हिमालय स्थित कौशिक आश्रम में एक अर्से तक थे। इस आश्रम के बारे में कविराजजी का अनुमान है कि वह ज्ञानगंज जैसा एक आश्रम है। विशुद्धानन्दजी के पास ज्ञानगंज से अक्सर पत्र आते थे । उन सभी पत्रों को कविराजजी ने प्रकाशित कराया है जिससे साफ जाहिर होता है कि स्थूल रूप से ज्ञानगंज है जहाँ से कई परग्ग्हंस बराबर विशुद्धानन्दजी को पत्र भेजते हुए महर्षि महातपा तथा भृंगुराम परमहंस का आदेश लिखते रहे।

फिर भी कविराजजी लिखते हैं-' सिद्धाश्रम साधारण लौकिक आश्रमों की तरह नहीं है । यह सामान्य लोगों को दिखाई नहीं देता । तिब्बती लोग, परिव्राजक या पर्यटकों को इसका पता नहीं चलता । इस वजह से कोई संन्यासी(भारतीय) या पर्यटक (विदेशी) इस ज्ञानगंज की सिद्धभूमि से परिचित नहीं है और उसके बारे में विवरण पाना सम्भव नहीं है । स्थूल भूमि में अवस्थित रहने पर भी वह भौतिक स्थान नहीं है । वास्तव में वह जिस प्रकार स्थूल नहीं है, ठीक उसी प्रकार सूक्ष्म भी नहीं है । दूसरी ओर स्थूल और सूक्ष्म दोनों ही है । सिद्ध महापुरुषों के दर्शन कर लेने के बाद वह अदृश्य हो जाता है, ऐसी है सिद्धाश्रम की स्थिति । स्थूल दृष्टि से स्थूल है तो सूक्ष्म दृष्टि से सूक्ष्म । इसीलिए समन्वययुक्त है । अनेक लोग या व्यक्ति स्थूल दृष्टि से इसकी खोज में जाते हैं और व्यर्थ का चक्कर काटकर वापस आते हैं । आश्रम के अधिकारियों की झाडा बिना वहाँ जाना असम्भव है, दर्शन करना दूर की बात है ।'

अन्त में कविराजजी ने भी ज्ञानगंज के स्थूल रूप को स्वीकार किया है । इसमें कोई संदेह नहीं कि ज्ञानगंज एक रहस्यमय आश्रम है जो सचराचर पर्यटकों को दिखाई नहीं देता । यहाँ तक कि स्वयं तिब्बत के लोग भी इस स्थान से अपरिचित हैं । अगर तिब्बत के निवासियों को इस स्थान की जानकारी होती तो इसका कोई तिब्बती नाम अवश्य होता । जिस प्रकार मानस-सरोवर का नाम' त्सो मावाङ' या' त्सो माफाम' है, रावण-ह्रद का नाम' लांगाक त्सो' है, गौरीकुण्ड का नाम' थुक्की जिग बू' और कैलास का नाम' डेम छोक' रखा है, उसी प्रकार ज्ञानगंज का कोई तिब्बती नाम अवश्य होता । इससे यह स्पष्ट है कि ज्ञानगंज स्थूल होते हुए भी सूक्ष्म है ।

कविराजजी इसी पुस्तक में एक जगह लिखते हैं-' यह सिद्धस्थान तिब्बतीय

गुप्त योगियोंकी भाषा में'ज्ञानगंज' के नाम से प्रसिद्ध है।'

'ज्ञानगंज की चर्चा करते समय यह स्मरण रखना चाहिए कि यह स्थान साधारण भौगोलिक स्थान नहीं है । यद्यपि यह गुप्त रूप से भूपृष्ठ पर विद्यमान है तथापि इसका वास्तविक स्वरूप काफी दूर है । भीम(भूमि-सम्बन्धी) ज्ञानगंज कैलास के आगे ऊर्ध्व में स्थित है । फिर भी वह साधारण पर्यटकों की गति-विधि से अतीत है ।'

ज्ञानगंज के बारे में काफी उत्सुकता और कौतूहल शिष्यों में था । काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जीवनशंकर याज्ञिक पुस्तकालय से तिब्बत का वृहद् मानचित्र मँगाकर' ज्ञानगंज' की तलाश करते रहे । लेकिन इसका पता उन्हें नहीं लगा । यह विस्मय की बात नहीं है । मानचित्रों में राजनीति और भौगोलिक विवरण नहीं रहता । ज्ञानगंज इस श्रेणी में नहीं आता ।

अन्त में श्री अक्षयकुमार दत्तगुप्त के विचार को पड़ लेना आवश्यक है जिसकी पूर्ति कविराजजी ने इस पुस्तक के माध्यम से की है। दत्तगुप्तजी लिखते हैं-' ज्ञानगंज की आध्यात्मिक सत्ता के विषय में हम लोग बाबा की जबानी सुनते रहे। कहीं हम गलत समझ न बैठें, इसलिए विस्तार से नहीं कहते थे। इस विषय पर हृदयंगम करने के अधिकारी के रूप में उन्हें श्रीयुक्त गोपीनाथ कविराज प्राप्त हुए थे। वे जितने गम्भीर विद्वान् हैं, उतनी ही उनमें मनीषा है और साथ ही उनमें क्रिया-बल है। इसलिए उनके निकट ही तत्त्वकथा प्रकट करते रहे, अन्य किसी के आगे नहीं । भविष्य में उनके द्वारा हम बहुत कुछ प्राप्त कर सकेंगे ।'

दत्तगुप्तजी की इस आकांक्षा की पूर्ति इस पुस्तक के माध्यम से श्रद्धेय कविराजजी ने की है । इसमें ज्ञानगंज की आध्यात्मिक व्याख्या विस्तार से की गयी है । यद्यपि वे ज्ञानगंज के बारे में सारी बातें जानते थे, पर उसका स्थूल परिचय उन्होंने इसलिए नहीं दिया ताकि लोग उत्सुकतावश उस स्थान तक जाकर निराश न लौटें।

ज्ञानगंज के बारे में अनेक पाठकों को उत्सुकता है, उसकी निवृत्ति इस पुस्तक से अवश्य हो जायगी। इस संकलन में कविराजजी के दो अलभ्य लेख प्रकाशित किये जा रहे हैं जो' सिद्धभूमि' तथा'सिद्धों की भूमि तिब्बत' के नाम से प्रकाशित हैं । दोनों ही लेख ज्ञानगंज की महत्ता पर प्रकाश डालते हैं।

 

अनुक्रम

1

ज्ञानगंज और श्री श्रीविशुद्धानन्द

1

2

ज्ञानगंज-रहस्य

30

3

देह और कर्म एवं ज्ञानगंज की सारकथा

56

4

ज्ञानगंज की पत्रावली

74

5

राम ठाकुर की कहानी और कौशिक आश्रम सहित ज्ञानगंज का विवरण

95

6

सिद्धभूमि

108

7

सिद्धों की भूमि तिब्बत

117

Sample Pages









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